यह क्या है?
इंडिकसागा भारतीय महाकाव्यों को शुरू से आख़िर तक पढ़ने का एक तरीका है — खेलते हुए।
हर महाकाव्य कुछ पड़ावों में बँटा है, और हर पड़ाव कुछ प्रसंगों में। पहले कहानी आती है, फिर सवाल। ग़लत जवाब पर भी कुछ न कुछ पता चलता है — हर विकल्प के नीचे लिखा है कि असल में क्या हुआ था।
और हर सही जवाब के साथ एक कथा खुलती है — उस बात के पीछे की पूरी कहानी।
क्यों?
ज़्यादातर लोग ये कथाएँ टुकड़ों में जानते हैं — टीवी से, दादी-नानी से, त्योहारों से। राम और रावण सब जानते हैं। पर किष्किंधाकांड में क्या होता है, यह कम लोग बता पाएँगे। यह साइट उसी बीच की ख़ाली जगह के लिए है।
स्रोत
जिन महाकाव्यों का एक मान्य मूल पाठ है, उनके लिए वही चुना गया है — रामायण के लिए वाल्मीकि रामायण, महाभारत के लिए व्यास रचित महाभारत।
पर हर कथा ऐसी नहीं है। कृष्ण-लीला, हनुमान-गाथा और विष्णु-पुराण किसी एक ग्रंथ में पूरी नहीं मिलतीं — वे भागवत पुराण, हरिवंश, विष्णु पुराण और बाद के ग्रंथों में बँटी हैं, और ये आपस में सहमत नहीं हैं। ऐसी जगहों पर हर प्रसंग के साथ बताया गया है कि वह कहाँ से आता है।
इन कथाओं के कई रूप हैं — तुलसीदास का रामचरितमानस, कंबन की तमिल रामायण, जैन और दक्षिण-पूर्व एशियाई संस्करण — और वे कई जगह एक-दूसरे से अलग हैं।
पर "मूल पाठ में है या नहीं" — इतना कहना काफ़ी नहीं होता। हम तीन तरह की बातों में फ़र्क़ करते हैं:
एक — जो प्रचलित मूल पाठ में सीधे मौजूद है। जैसे संपाति का अपने पंख जलाकर जटायु को बचाना।
दो — जो पाठ में है, पर जिस पर पाठ-परंपरा में मतभेद है। जैसे लक्ष्मण का सिर्फ़ सीता की पायल पहचानना — वह श्लोक कुछ प्राचीन पांडुलिपियों और बड़ौदा के आलोचनात्मक संस्करण में नहीं मिलता।
तीन — जो बाद की परंपराओं से आया है। जैसे लक्ष्मण रेखा, अहल्या का पत्थर बन जाना, या शबरी के चखे हुए बेर।
जहाँ ऐसा कोई फ़र्क़ पड़ता है, हमने कथा के साथ ही लिख दिया है। छिपाया नहीं।
किसने बनाई?
यह साइट मैंने बनाई है। मैं संस्कृत का विद्वान नहीं हूँ — पाठक हूँ। ये कथाएँ मुझ तक भी टुकड़ों में ही पहुँची थीं, और जो पूरा पढ़ना चाहा वह कहीं एक जगह नहीं मिला। यही इस साइट की वजह है।
हर पंक्ति पढ़ी और जाँची गई है। जहाँ पाठ पढ़कर तय नहीं हो पाया, वहाँ लिख दिया गया है कि तय नहीं हो पाया।
ग़लती दिखे तो
बताइए — katha@indicsaga.com पर लिखिए, सुधार दी जाएगी। स्रोत के प्रति ईमानदारी ही इस साइट का एकमात्र दावा है।
— संजय