
अध्याय ३
अजामिल — एक नाम से बचा हुआ
मृत्यु की देहरी पर, बिगड़ी हुई पूरी ज़िंदगी के बाद, उसके मुँह से अनजाने में भगवान का नाम निकला
अजामिल — एक नाम से बचा हुआ — भागवत भक्त का अध्याय ३। स्रोत: भागवत पुराण। इसमें ४ दृश्य हैं — फिसलन; देहरी पर; दोनों पक्ष; दूसरी ज़िंदगी — और अंत में १० सवाल।
फिसलन
अजामिल कान्यकुब्ज — आज के कन्नौज — का ब्राह्मण था। माँ-बाप ने उसे वेद पढ़ाए और नियम सिखाए, और बरसों तक उसके दिन में कहीं कोई दरार नहीं दिखी। सुबह का स्नान, संध्या, पाठ — सब कुछ वैसा ही चलता रहा जैसा चलना चाहिए।
फिर एक दिन पिता के कहने पर वह वन से फल, फूल, समिधा और कुश लेकर लौट रहा था। रास्ते में उसने एक शराबी को एक वेश्या के साथ खुलेआम लिपटे देखा। और अजामिल का मन डोल गया।
जिस मन पर उसने बरसों नियमों का पहरा बिठाया था, वह एक क्षण में हाथ से फिसल गया। उसने पत्नी छोड़ दी, माँ-बाप छोड़ दिए, पढ़ाई छोड़ दी। उसी स्त्री को घर ले आया, और जिस घर में कभी वेदों का पाठ गूँजता था, वहाँ अब जुए, चोरी और ठगी की कमाई आने लगी।
उसके दस बेटे हुए। सबसे छोटे का नाम उसने रखा — नारायण।
बुढ़ापे में वह इसी सबसे छोटे बेटे पर जान छिड़कता था। खाते-पीते, उठते-बैठते घर में वही पुकार गूँजती रहती — "नारायण, इधर आ। नारायण, यह खा।"
देहरी पर
फिर अजामिल की मृत्यु का समय आ गया।
वह बिस्तर पर पड़ा था, और बेटा पास ही खेल रहा था। तभी उसने देखा कि तीन भयानक आकृतियाँ, हाथों में फंदे लिए, उसकी ओर बढ़ रही हैं। ये यमदूत थे। डर के मारे उसकी साँस अटक गई, और उसने ज़ोर से अपने बेटे को पुकारा — "नारायण!"
बुलाया उसने बेटे को था, पर नाम भगवान का था।
उसी क्षण चार और आकृतियाँ आ खड़ी हुईं, तेज से दमकती हुई, और उन्होंने यमदूतों का फंदा रोक दिया। ये विष्णुदूत थे।
दोनों पक्ष
यमदूतों ने विरोध किया। "यह आदमी जीवन भर पापी रहा। इसका हिसाब बाक़ी है। इसे ले जाने का हक़ हमारा है।"
विष्णुदूतों ने उत्तर दिया। "नाम का अपना बल है। कोई उसे संकेत में ले, या हँसी में, या पीड़ा में, या किसी और को पुकारने के लिए — फिर भी वह पाप को वैसे ही जला देता है जैसे आग ईंधन को, चाहे लेने वाला जानता हो या नहीं। इस आदमी ने जो भी सोचकर पुकारा हो, पुकारा उसी नाम को।"
फिर उन्होंने कहा कि यम भी अंतिम अधिकारी नहीं है। और आगे चलकर यम ने स्वयं अपने दूतों से कहा — "जो भगवान के शरणागत भक्त हैं, उनके पास मत जाना; वे मेरे दंड के अधिकार में नहीं हैं।" और उन्होंने आदेश दिया कि उन्हीं को लाया जाए जो न भगवान का नाम लेते हैं, न उन्हें याद करते हैं, न उनके आगे सिर झुकाते हैं।
दूसरी ज़िंदगी
अजामिल बच गया — और पूरी तरह जाग गया।
उसे अपना सारा जीवन एक साथ याद आया — छोड़ी हुई पत्नी, छोड़े हुए माँ-बाप, वह घर जो उसने ख़ुद उजाड़ा — और उस पर उसे घिन आई। उसी वक़्त वह हरिद्वार, गंगाद्वार की ओर निकल पड़ा।
वहाँ उसने सच्ची भक्ति की। कुछ समय बाद विष्णुदूत उसके लिए फिर आए, इस बार विधिपूर्वक, उसे लेने के लिए।
कृपा ने दरवाज़ा खोला था। भीतर उसे ख़ुद चलकर जाना पड़ा।
टिप्पणी: अजामिल की पूरी कथा भागवत पुराण के छठे स्कंध (अध्याय १–२) में है, और परवर्ती वैष्णव साहित्य इसे "नाम-महिमा" के प्रमाण के रूप में बार-बार उद्धृत करता है। इस अध्याय की ख़ास बात यह है कि विवाद एक ही ग्रंथ के भीतर है — यमदूत साधारण नैतिक हिसाब की बात कहते हैं (पाप का दंड मिलना चाहिए), विष्णुदूत उसके विरुद्ध कुछ कहते हैं जो सचमुच उस हिसाब को चुभता है। पाठ विष्णुदूतों के पक्ष में है, और यह टिप्पणी भी वही कहती है — पर बाद के कई नीति-विचारक और स्वयं यम के दूत इसे सहज नहीं मानते। कथा में शराबी को "शूद्र" कहा गया है; प्रसंग में बात खुलेआम मद्यपान और छूट की है, और गिरता अजामिल ख़ुद है, अपनी आँखों से।
स्रोत: भागवत पुराण से, अजामिल — एक नाम से बचा हुआ