
अध्याय ४
चित्रकेतु — जिसका बेटा चला गया
एक हँसी की क़ीमत एक राजा ने राक्षस-जन्म से चुकाई — और उसे इससे कोई शिकायत नहीं थी
चित्रकेतु — जिसका बेटा चला गया — भागवत भक्त का अध्याय ४। स्रोत: भागवत पुराण। इसमें ४ दृश्य हैं — जिसके पास सब था, एक चीज़ छोड़कर; विष; आकाश में; शाप — और अंत में १० सवाल।
जिसके पास सब था, एक चीज़ छोड़कर
चित्रकेतु शूरसेन का सम्राट था। उसकी एक करोड़ रानियाँ थीं, धन-धान्य से भरा राज्य था, और एक भी संतान नहीं थी। महलों की उस भीड़ में सबसे ख़ाली जगह वही थी जहाँ किलकारी होनी चाहिए थी।
एक दिन अंगिरा ऋषि आए। उन्होंने बड़ी रानी कृतद्युति को एक पुत्र दिलाया — पर चलते-चलते कह गए, "यह बेटा हर्ष भी देगा और शोक भी।"
राजा को तब इस बात का अर्थ समझ नहीं आया। वह बस बेटे को देखता रहा।
विष
बाक़ी रानियाँ ईर्ष्या से जल उठीं। राजा का सारा लाड़ अब उसी शिशु पर था। एक दिन उन्होंने शिशु को ज़हर दे दिया।
बच्चा मर गया। दरबार बिलख उठा, और चित्रकेतु टूट गया।
तभी अंगिरा लौटे, इस बार नारद के साथ। नारद ने राजा को सिखाने के लिए बच्चे की बीती हुई आत्मा को थोड़ी देर बुला लिया और उसे बोलने दिया।
आत्मा ने पूछा — "मेरे कितने जन्मों में कितने माँ-बाप हुए। तुम किसकी बात कर रहे हो? मैं सबका रहा हूँ, और किसी का नहीं।"
फिर वह चली गई। और चित्रकेतु का शोक फूटकर समझ में बदल गया।
आकाश में
नारद ने चित्रकेतु को एक विद्या दी — संकर्षण की स्तुति। चित्रकेतु ने उसे साधा, और सात दिन में विद्याधरों का राजा बन गया — प्रकाशमान, आकाश में उड़ता, मंत्र-सिद्ध। और सच्चा भक्त भी, राजपाट के बोझ से हल्का।
एक दिन वह अपने चमकते विमान में कैलास के ऊपर से उड़ रहा था। नीचे उसने देखा कि शिव सभा में, ऋषियों के बीच, पार्वती को गोद में लिए, उनके गिर्द बाँह डाले बैठे हैं।
चित्रकेतु हँस पड़ा। "जो सारे जगत को धर्म सिखाते हैं, वे भरी सभा में पत्नी को यों लिपटाए बैठे हैं, किसी साधारण आदमी की तरह?"
शाप
पार्वती को यह बात चुभ गई। "तूने हँसी उड़ाई," उन्होंने कहा। "जा, असुरों में जन्म ले।"
चित्रकेतु ने न गिड़गिड़ाया, न क्रोध किया। वह विमान से उतरा, झुका, और बोला — "शाप और वरदान मेरे लिए एक बराबर हैं। इस देह का कारण जो भी हो, आसरा तो भगवान ही है। मैं स्वीकार करता हूँ।"
तब शिव ने पार्वती से कहा — "देखो, भक्त ऐसा होता है। देखो, यह कैसे खड़ा है।"
चित्रकेतु वृत्र बनकर जन्मा। और भागवत कहता है कि रणभूमि में वृत्र सबसे बड़े भक्त की तरह लड़ा — मरते-मरते भी भगवान की ही बात करता रहा।
टिप्पणी: चित्रकेतु की कथा भागवत पुराण के छठे स्कंध (अध्याय १४–१७) में है। वृत्र का दूसरा आधा — इंद्र से युद्ध — ऋग्वेद की बहुत पुरानी वैदिक परत में भी है, जहाँ वृत्र सिर्फ़ शत्रु है, कोई पिछली कथा नहीं; और महाभारत की कुछ वृत्र-कथाओं में उसके वध को ब्रह्महत्या से जोड़ा गया है। चित्रकेतु वाला ढाँचा — भक्त का राक्षस बनकर जन्म लेना — भागवत का अपना है। एक आधुनिक साहित्यिक पाठ में इसे इस तरह देखा जा सकता है कि भागवत ने पुराने वैदिक वृत्र-मिथक को एक नई भक्ति-कथा के भीतर पुनःव्याख्यायित किया; यह आधुनिक व्याख्या है, भागवत का अपना दावा नहीं। शाप वाले प्रसंग को "पार्वती खलनायक" की तरह न पढ़ें — पाठ दोनों को सही रखता है: मर्यादा के लिए क्षुब्ध देवी, और वह भक्त जिस तक शाप पहुँच ही नहीं सकता; शिव किसी एक का पक्ष नहीं लेते।
स्रोत: भागवत पुराण से, चित्रकेतु — जिसका बेटा चला गया