
अध्याय १
ध्रुव — जो गोद उसे नहीं मिली
पाँच बरस के एक बच्चे को पिता की गोद नहीं मिली, और वह ऐसी जगह ढूँढने निकल पड़ा जहाँ से कोई उसे हटा न सके
ध्रुव — जो गोद उसे नहीं मिली — भागवत भक्त का अध्याय १। स्रोत: भागवत पुराण। इसमें ५ दृश्य हैं — दरबार में; माँ के पास; मधुवन में; जो माँगा नहीं था; धुरी — और अंत में १० सवाल।
दरबार में
राजा उत्तानपाद की दो रानियाँ थीं। बड़ी रानी सुनीति शांत और सीधी थी; छोटी रानी सुरुचि थी, और राजा का मन उसी में रमता था। सुनीति के बेटे का नाम ध्रुव था, सुरुचि के बेटे का उत्तम।
एक दिन राजा उत्तम को गोद में बिठाए दुलार रहे थे। पाँच बरस का ध्रुव पास आया और उसने भी चढ़ने के लिए हाथ बढ़ा दिए। राजा ने न उसे उठाया, न कुछ कहा — वे बस चुप रहे। और वही चुप्पी सबसे भारी पड़ी।
तभी सुरुचि बोली।
"यह जगह तुम्हारी नहीं है, बेटा। तुम राजा के बेटे ज़रूर हो, पर मेरे गर्भ से नहीं जन्मे। यह गोद, यह सिंहासन — इसके लिए तुम्हें तप करना होगा, और अगले जन्म में मेरे पेट से आना होगा।"
ध्रुव के होंठ काँपे, पर कोई शब्द नहीं निकला। वह मुड़ा और चुपचाप वहाँ से चला गया।
माँ के पास
रोता हुआ ध्रुव सीधा सुनीति के पास पहुँचा और सारी बात कह सुनाई। सुनीति की आँखें भर आईं, पर उसने बेटे को झूठी तसल्ली नहीं दी।
"तुम्हारी सौतेली माँ ने कड़वा कहा," उसने धीरे से कहा, "पर ग़लत नहीं कहा। जो गोद कोई तुमसे छीन न सके, वह एक ही है।"
"किसकी?" ध्रुव ने पूछा।
"उसकी, जो सबका आसरा है। तुम्हारे पिता भी जिसके आगे छोटे हैं। उसे खोजो।"
बच्चे का रोना थम गया। उसने मन-ही-मन निश्चय किया और पिता का घर छोड़कर वन की ओर चल पड़ा।
मधुवन में
रास्ते में उसे नारद मिले। उन्होंने समझाया कि तुम अभी बच्चे हो, वन कठिन है, घर लौट जाओ। पर ध्रुव अपनी बात पर अड़ा रहा। तब नारद ने उसे एक मंत्र दिया — "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" — और यमुना के किनारे मधुवन जाने को कहा।
वहीं ध्रुव आसन जमाकर बैठ गया। पहले महीने वह तीसरे दिन एक फल खाता। दूसरे महीने छठे दिन सूखा घास-पत्ता। तीसरे महीने केवल पानी, चौथे महीने केवल हवा। पाँचवें महीने वह एक पैर पर अचल खड़ा हो गया — साँस पर पूरा नियंत्रण, मन एक बिंदु पर टिका हुआ। तब उसके तप का प्रभाव तीनों लोकों तक पहुँचा।
पाठ कहता है कि अचल खड़े ध्रुव के अंगूठे के दबाव से आधी धरती झुक गई और लोक काँपने लगे।
जो माँगा नहीं था
तब हरि प्रकट हुए।
ध्रुव प्रार्थना करना चाहता था, पर शब्द नहीं निकले। तब भगवान ने अपना शंख उसके माथे से छुआ दिया, और ध्रुव के मुँह से एक पूरी स्तुति फूट पड़ी।
भगवान बोले, "मैं जानता हूँ तुम किसलिए आए थे। वह भी तुम्हें मिलेगा — तुम्हारे पिता का राज। पर उसके बाद तुम्हें एक ऐसी जगह मिलेगी जो कभी नहीं मिटती। सब तारे, सब ग्रह जिसके चारों ओर घूमते हैं। प्रलय में भी जो बनी रहती है।" इतना कहकर वे अंतर्धान हो गए।
पर ध्रुव को चैन नहीं आया। "मैं स्वयं भगवान तक पहुँच गया," उसने कहा, "और फिर भी मेरा मन पद, बदले और बड़े राज्य पर टिका रहा। मुझे शर्म आती है कि मैंने इतना छोटा माँगा।"
वह घर लौटा। जिस पिता की गोद ने उसे कभी ठुकराया था, वही पिता इस बार आगे बढ़कर उसे गले लगाने आए। सुरुचि भी उसके आगे झुक गई।
धुरी
बरसों बाद ध्रुव राजा था।
उसका छोटा भाई उत्तम शिकार पर गया और एक यक्ष के हाथों मारा गया। बेटे को खोजती हुई सुरुचि भी वन में चल बसी। ध्रुव क्रोध और शोक से भर उठा। वह रथ पर चढ़कर यक्षों की नगरी अलकापुरी पर टूट पड़ा।
उसने यक्षों की सेना को हरा दिया, फिर हारे हुओं को भी मारने लगा — उन्हें भी, जिनका कोई दोष नहीं था। तभी स्वायंभुव मनु, उसके परदादा, सामने आ खड़े हुए।
"बस करो," उन्होंने कहा। "इन यक्षों ने तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ा। भक्त यम नहीं बन जाता।"
ध्रुव ने धनुष रख दिया। फिर कुबेर आए — प्रसन्न, इसलिए नहीं कि उसने लड़ाई जीती थी, बल्कि इसलिए कि उसने रुकना सीखा था।
अंत में विष्णु के दो पार्षद, नंद और सुनंद, एक विमान लेकर आए। ध्रुव ठिठक गया — वह माँ सुनीति को छोड़कर कैसे जाता? पर उसने देखा कि उसी राह पर आगे एक और विमान में उसकी माँ को बिठाया जा चुका है।
वह ग्रह-लोकों को पार करता हुआ अपनी अटल जगह पर जा बैठा। आज भी वह वहीं है।
टिप्पणी: ध्रुव की कथा भागवत पुराण के चौथे स्कंध (अध्याय ८–१२) में है; विष्णु पुराण (१.११–१२) में लगभग यही रूप मिलता है, और महाभारत ध्रुव को ध्रुवतारे के रूप में नाम भर लेता है, पूरी कथा नहीं देता। नारद का दिया मंत्र "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" (द्वादशाक्षर) पाठ में है; तप की महीने-दर-महीने विधि भागवत (४.८.७२–७६) में पाँचवें महीने तक विस्तार से है — पाँचवें महीने ध्रुव एक पैर पर अचल खड़ा होता है और उसके बाद लोक काँपने लगते हैं; कुछ बाद के संक्षिप्त रूपों में यही सब सिर्फ़ "छह महीने" कहकर समेट दिया जाता है — बढ़ते क्रम पर सब सहमत हैं। यक्षों के संहार और मनु के रोकने वाला प्रसंग भागवत में स्पष्ट है और जान-बूझकर रखा गया है — भक्त-बालक भी क्रोध में वही कर सकता है जो कोई और; पाठ इसे छिपाता नहीं। इस साइट का विष्णु-पुराण अध्याय भी ध्रुव को कहता है; वहाँ ज़ोर तप और प्रलय-सहिष्णु ध्रुवपद पर है, यहाँ पूरी जीवन-रेखा पर।
स्रोत: भागवत पुराण से, ध्रुव — जो गोद उसे नहीं मिली