अध्याय ७

गजेंद्र — जबड़ों में हाथी

हज़ार साल एक मगर की पकड़ में रहने के बाद हाथी ने वह किया जो उसने पहले कभी नहीं किया — उसने हार मान ली

झील

त्रिकूट पर्वत पर एक झील थी, कमलों से भरी।

गजेंद्र — झुंड का सरदार हाथी — गर्मी में अपनी हथिनियों और बच्चों के साथ पानी में उतरा।

हज़ार साल

एक मगर ने उसका पैर पकड़ लिया।

हाथी किनारे की ओर खींचता, मगर गहरे की ओर। यह खिंचाई हज़ार साल चली।

हाथी कमज़ोर पड़ता गया — पानी उसका घर नहीं था। मगर मज़बूत होता गया — पानी उसका घर था।

झुंड धीरे-धीरे किनारे से चला गया। कोई काम न आया।

कमल

आख़िर में, जब हाथी की अपनी सारी ताक़त चुक गई, उसे एक प्रार्थना याद आई — जो उसने इस जन्म में नहीं, किसी पिछले मानव-जन्म में सीखी थी।

उसी लंबी स्तुति में उसने सबके मूल परम तत्त्व को पुकारा — "वह, जिससे यह सब आया, जिसमें यह सब टिका है।" कोई सौदा नहीं, कोई शर्त नहीं।

और जब सहायता आई, तब उसके पास सूँड में उठाने को बस एक कमल था।

सबसे तेज़ उत्तर

विष्णु तुरंत आए — गरुड़ पर, और देवता भी उनके साथ स्तुति करते हुए।

उन्होंने पहले गजेंद्र और मगर दोनों को साथ पानी से बाहर खींचा, फिर सुदर्शन चक्र से मगर का मुँह उसके शरीर से अलग कर दिया।

फिर पता चला — दोनों शापित मनुष्य थे।

हाथी पहले इंद्रद्युम्न था, एक पांड्य राजा और विष्णु-भक्त, जिसे अगस्त्य ने ध्यान में डूबे रहने के कारण — अभिवादन न करने पर — हाथी होने का शाप दिया था।

मगर पहले हूहू नाम का गंधर्व था, जिसे देवल ऋषि ने पानी में उनका पैर खींचने की शरारत पर शाप दिया था।

दोनों मुक्त हुए — एक ही क्षण में। जिसने काटा और जिसे काटा गया।

बात

इस कथा में उत्तर असाधारण तेज़ी से आता है — एक पशु-देह, पिछले मानव-जन्म से याद आई एक प्रार्थना, और अपनी सारी शक्ति चुकने पर ही की गई पुकार।

और वह इसलिए मिला कि प्रार्थना पूरी थी। गजेंद्र ने तभी पुकारा जब बाक़ी हर उपाय चुक गया।

टिप्पणी: गजेंद्र-मोक्ष भागवत पुराण के आठवें स्कंध (अध्याय २–४) में है; गजेंद्र की स्तुति (८.३) आज भी बहुत से लोग रोज़, और संकट या मृत्यु से पहले, पढ़ते हैं। हाथी का इंद्रद्युम्न/पांड्य-राजा होना और मगर का हूहू गंधर्व होना — ये पहचान भागवत की हैं। कथा मुख्यतः भागवत-केंद्रित है, विष्णु, पद्म और परवर्ती स्तोत्र-साहित्य में भी दोहराई गई है। कुछ दक्षिण-भारतीय मंदिर-परंपराएँ उस झील को अपने यहाँ बताती हैं (जैसे आहोबिलम, तिरुक्कुरुंगुडि)।

स्रोत: भागवत पुराण से, गजेंद्र — जबड़ों में हाथी

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

जिस झील में गजेंद्र उतरा, वह किस पर्वत पर थी?

  • कैलास
  • मंदराचल
  • त्रिकूट
  • गोवर्धन
पूरी कथा पढ़िए — एक झील, एक झुंड

गजेंद्र झुंड का सरदार हाथी था।

गर्मी में वह अपनी हथिनियों और बच्चों के साथ त्रिकूट की झील में उतरा।

वहीं, पानी के भीतर, उसका पैर पकड़ा गया।

तथ्य

हाथी और मगर की खिंचाई कितनी देर चली?

  • एक रात
  • सात दिन
  • एक क्षण
  • हज़ार साल
पूरी कथा पढ़िए — हज़ार साल की जकड़

हाथी किनारे की ओर खींचता, मगर गहरे की ओर।

भागवत कहता है कि यह खिंचाई हज़ार (देव-) वर्ष चली।

इतने लंबे संघर्ष के बाद ही हाथी उस बिंदु पर पहुँचा जहाँ उसने पहली बार हार मानी।

ऐसा क्यों?

समय के साथ हाथी कमज़ोर और मगर मज़बूत क्यों होता गया?

  • क्योंकि पानी मगर का घर था, हाथी का नहीं
  • क्योंकि मगर देवताओं का प्रिय था
  • क्योंकि हाथी बूढ़ा था
  • क्योंकि हाथी ने खाना छोड़ दिया था
पूरी कथा पढ़िए — अपने तत्त्व में

ज़मीन पर हाथी मगर को घसीट ले जाता; पानी में बाज़ी उलट गई।

यही कथा का एक शांत सबक है — लड़ाई की जगह मायने रखती है।

हाथी तभी जीता जब उसने अपने बल पर लड़ना छोड़ा।

क्या हुआ?

नारायण को आते देखकर गजेंद्र ने अपनी सूँड़ में क्या उठाया?

  • एक पत्थर
  • पानी
  • एक कमल
  • एक टहनी
पूरी कथा पढ़िए — एक कमल, कोई शर्त नहीं

गजेंद्र इससे पहले अपने पिछले जन्म से याद आई लंबी स्तुति कर चुके थे।

जब नारायण गरुड़ पर प्रकट हुए, तब गजेंद्र ने सूँड़ में कमल उठाकर छोटी-सी वंदना के साथ अर्पित किया।

कमल वाला प्रसंग भगवान के आगमन के समय है, गजेंद्र-स्तुति की शुरुआत में नहीं।

तथ्य

गजेंद्र की प्रार्थना कहाँ से आई?

  • वह किसी पिछले मानव-जन्म से उभरकर आई
  • उसे उसके महावत ने सिखाई थी
  • वह हाथियों की सहज पुकार थी
  • वह नारद ने उसी क्षण उसे दी
पूरी कथा पढ़िए — पिछले जन्म की याद

गजेंद्र पहले इंद्रद्युम्न था, एक विष्णु-भक्त राजा।

हाथी की देह में वह भक्ति सोई पड़ी थी, और संकट की आख़िरी घड़ी में जागी।

इसलिए प्रार्थना के शब्द किसी हाथी के नहीं लगते — वे एक भक्त के हैं।

किसने कहा?

गजेंद्र ने अपनी प्रार्थना किसे संबोधित की?

  • सीधे विष्णु को, नाम लेकर
  • इंद्र को
  • अपने झुंड को, मदद के लिए
  • किसी नाम वाले देवता को नहीं
पूरी कथा पढ़िए — बिना नाम की पुकार

गजेंद्र ने किसी एक देवता का पक्ष नहीं लिया।

उसने उस मूल की ओर पुकारा जिससे सब कुछ निकलता और जिसमें सब लौटता है।

और उत्तर विष्णु ने दिया — बाक़ी सब देवता पीछे रह गए।

क्या हुआ?

विष्णु ने मगर को कैसे मारा?

  • अपनी गदा से
  • उन्होंने पहले गजेंद्र और मगरमच्छ दोनों को साथ पानी से बाहर निकाला, फिर सुदर्शन चक्र से मगरमच्छ का मुँह उसके शरीर से अलग कर दिया
  • हाथ से जबड़े खोलकर
  • मगर को शाप देकर
पूरी कथा पढ़िए — सबसे तेज़ उत्तर

विष्णु गरुड़ पर उड़ते हुए तुरंत आए, बाक़ी देवताओं से पहले।

हरि ने गजेंद्र और मगरमच्छ दोनों को साथ झील से बाहर निकाला।

फिर सुदर्शन चक्र ने मगरमच्छ का मुँह शरीर से अलग किया और गजेंद्र मुक्त हुए।

किसका बेटा?

हाथी और मगर पहले कौन थे?

  • हाथी पहले इंद्रद्युम्न, एक पांड्य राजा (अगस्त्य का शाप); मगर पहले हूहू, एक गंधर्व (देवल ऋषि का शाप)
  • दोनों देवता थे
  • हाथी एक ऋषि था, मगर एक राक्षस
  • दोनों एक ही व्यक्ति के दो जन्म थे
पूरी कथा पढ़िए — दोनों शापित, दोनों मुक्त

इंद्रद्युम्न ध्यान में इतना डूबा था कि उसने अगस्त्य का अभिवादन नहीं किया — शाप मिला हाथी बनने का।

हूहू गंधर्व ने पानी में देवल ऋषि का पैर खींचा — शाप मिला मगर बनने का।

चक्र के एक वार से जिसने काटा और जिसे काटा गया, दोनों एक साथ मुक्त हुए।

ऐसा क्यों?

विष्णु इतनी जल्दी क्यों आए?

  • क्योंकि वह पूरे हज़ार साल के संघर्ष में लगातार स्तुति करता रहा था
  • क्योंकि गजेंद्र ने एक बड़ा यज्ञ किया था
  • क्योंकि हाथी विष्णु का वाहन था
  • क्योंकि गजेंद्र ने अपने बल पर निर्भर रहना छोड़ दिया था
पूरी कथा पढ़िए — पूरी हार, पूरी पुकार

एक लंबी दार्शनिक स्तुति के बाद, गजेंद्र का समर्पण पूर्ण होते ही उत्तर असाधारण तेजी से आता है।

कारण यह नहीं कि प्रार्थना सुंदर थी, बल्कि यह कि वह पूरी थी।

गजेंद्र ने तभी पुकारा जब "मैं ख़ुद कर लूँगा" वाली हर कोशिश ख़त्म हो गई।

कौन हूँ मैं?

मैं एक हाथी हूँ, लेकिन संकट में पिछले मानव-जन्म में सीखी प्रार्थना मुझे फिर याद आ गई। मैंने कमल उठाया और पुकारा। मैं कौन हूँ?

  • ऐरावत
  • गजेंद्र
  • नंदी
  • जटायु
पूरी कथा पढ़िए — छोटा पात्र, बड़ा दृश्य

गजेंद्र की कथा पिछले जन्म से याद आई भक्ति और वर्तमान संकट के पूर्ण समर्पण को एक साथ जोड़ती है।

इसीलिए गजेंद्र-स्तुति आज भी संकट और मृत्यु से पहले पढ़ी जाती है।

विशाल भगवान सबसे छोटी पुकार पर सबसे तेज़ आते हैं।