
अध्याय ६
नरसिंह — खंभा फटा
खंभे से जो निकला वह न आदमी था न शेर — और उसका ग़ुस्सा वध के बाद भी नहीं उतरा
नरसिंह — खंभा फटा — भागवत भक्त का अध्याय ६। स्रोत: भागवत पुराण। इसमें ४ दृश्य हैं — देहली पर; हर शर्त, उलटी हुई; जो ग़ुस्सा नहीं उतरा; संध्या — और अंत में १० सवाल।
देहली पर
हिरण्यकशिपु ने खंभे पर घूँसा मारा। सारी सभा में एक आवाज़ गूँज उठी, जैसे प्रलय हो गया हो। और खंभे से एक रूप निकला — न आदमी, न शेर। मनुष्य का धड़, शेर का सिर और पंजे, धधकती अयाल, पिघले सोने जैसी आँखें। यह नरसिंह थे।
हर शर्त, उलटी हुई
वरदान की हर दीवार में एक दरार थी।
ब्रह्मा के बनाए किसी जीव से मृत्यु नहीं होनी थी — पर नरसिंह विष्णु के अवतार हैं, कोई रचा हुआ प्राणी नहीं, और वे न आदमी हैं, न पशु। न घर के भीतर, न बाहर — नरसिंह ने उसे सभा की देहली पर पकड़ा, ठीक दहलीज़ पर। न दिन, न रात — वह समय संध्या का था, दोनों के बीच की संधि। न ज़मीन, न आकाश — उन्होंने उसे अपनी जाँघों पर लिटा लिया। किसी हथियार से नहीं — उन्होंने अपने नखों से उसे चीरा, जो हथियार नहीं, देह का हिस्सा हैं। और न देवता, न दानव, न मनुष्य, न साँप — नरसिंह इनमें से कुछ भी नहीं थे।
जिस राजा ने हर दरवाज़ा बंद करके वरदान माँगा था, वह उसी बंद दरवाज़े की दरार से पकड़ा गया। हिरण्यकशिपु उनकी गोद में फट गया।
जो ग़ुस्सा नहीं उतरा
पर कथा यहाँ ख़त्म नहीं होती। भागवत के सातवें स्कंध में यह प्रसंग दो हिस्सों में चलता है — पहले वध, फिर उसके बाद की लंबी बेचैनी।
नरसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ। वे सिंहासन पर बैठे, लहू से सने, और उनकी गर्जना से लोक काँपते रहे। देवता पास नहीं जा सके। लक्ष्मी नहीं जा सकीं। ब्रह्मा नहीं, शिव नहीं। तब सबने प्रह्लाद को भेजा — उस बच्चे को — भगवान के धधकते रूप के सामने। और वही उन्हें शांत कर सका, हाथ जोड़कर, एक स्तुति से।
जब उससे वर माँगने को कहा गया, तो प्रह्लाद ने कोई सांसारिक फल नहीं माँगा। उसने माँगा कि ऐसे वर माँगने की इच्छा ही उसके हृदय में न उठे। भगवान ने फिर कहा कि अब तुम राज करो। तब प्रह्लाद ने एक और प्रार्थना की — कि उसके पिता का वैर और अपराध क्षमा कर दिए जाएँ।
भगवान ने कहा कि प्रह्लाद के कारण उसका पिता, और उसके साथ इक्कीस पूर्वज, पवित्र हो चुके हैं। प्रह्लाद दैत्यों का राजा बना, और नरसिंह अपने धाम लौट गए।
संध्या
आज नरसिंह जयंती वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को मनाई जाती है — संध्या के समय, ठीक वैसे ही जैसे वध हुआ था।
टिप्पणी: नरसिंह-प्रसंग भागवत पुराण के सातवें स्कंध (अध्याय ८) में है, और उसका असली भार आगे के दो अध्यायों (७.९–७.१०) में — वह भगवान जो वध के बाद भी शांत नहीं होता, और जिसे सबसे छोटा, सबसे कोमल पात्र शांत करता है। वरदान की शर्तों को उलटने का ब्योरा — देहली, संध्या, गोद, नख — भागवत में विस्तार से है। यह अध्याय "राक्षस को चीर दिया" वाली कथा नहीं है; यह वध (तेज़, भयानक, एक पन्ने में ख़त्म) और उसके बाद की लंबी समस्या है। आहोबिलम, सिंहाचलम और यादगिरिगुट्टा नरसिंह के प्रसिद्ध क्षेत्र हैं; उग्र, योग और लक्ष्मी-नरसिंह जैसे रूप-भेद बाद की मूर्ति-परंपरा हैं।
स्रोत: भागवत पुराण से, नरसिंह — खंभा फटा