अध्याय ५

प्रह्लाद — जो रुका नहीं

पिता ने हर तरीक़े से बेटे को मारना चाहा। बेटा हर बार लौटकर वही नाम लेता रहा

वरदान

हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष — दो भाई — असल में विष्णु के द्वारपाल जय और विजय थे, जिन्हें चार कुमारों ने तीन राक्षस-जन्मों का शाप दिया था।

वराह ने अभी-अभी हिरण्याक्ष को मारा था। हिरण्यकशिपु ने प्रण किया — वह विष्णु को और उसके हर पूजक को मिटा देगा।

उसने ऐसा घोर तप किया कि लोक तपने लगे। ब्रह्मा प्रकट हुए।

हिरण्यकशिपु ने वरदान माँगा — हर दरवाज़ा बंद करके।

"तेरे बनाए किसी जीव से मेरी मृत्यु न हो, चर हो या अचर। न घर के भीतर, न बाहर। न दिन में, न रात में। न ज़मीन पर, न आकाश में। किसी हथियार से नहीं। न किसी देवता से, न दानव से, न मनुष्य से, न किसी बड़े साँप से।"

ब्रह्मा ने दे दिया।

जो बेटा गिनती में नहीं था

हिरण्यकशिपु का बेटा प्रह्लाद गर्भ से ही विष्णु का भक्त था — उसने माँ के पेट में नारद का उपदेश सुना था।

उसे राजनीति सीखने शुक्र के बेटों, षंड और अमर्क, के पास भेजा गया।

पिता ने पूछा — "सबसे अच्छी बात क्या सीखी?"

प्रह्लाद ने भक्ति के नौ अंग गिना दिए — श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद-सेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्म-निवेदन।

हिरण्यकशिपु आग-बबूला हो गया। उसने बेटे को मार डालने का आदेश दिया।

पहरेदारों के हथियार चले। हाथियों से कुचलवाया। ज़हरीले साँप लिपटाए। भोजन में विष। भूखा रखा। ठंड, हवा, आग और पानी में डाला। भारी पत्थरों और पहाड़ियों से कुचलने की कोशिश की। पहाड़ से नीचे फिंकवाया। मंत्र।

कुछ भी उसे छू न सका। वह हर बार हरि में डूबा रहा, और पूछने पर क्रोधित भी नहीं था।

बाद की होलिका-परंपरा

बाद की होली-परंपरा कहती है कि प्रह्लाद की बुआ होलिका को अग्नि से रक्षा का वर मिला था।

वह प्रह्लाद को गोद में लेकर धधकती चिता पर जा बैठी।

हवा चली। वरदान वाला वस्त्र होलिका के ऊपर से उड़कर प्रह्लाद पर आ गया।

होलिका जल गई। प्रह्लाद चलकर बाहर आ गया।

होली की परंपरा होलिका-दहन को इसी प्रसंग से जोड़ती है।

खंभा

पिता का वही सवाल, बार-बार — "कहाँ है तेरा भगवान?"

"हर जगह," प्रह्लाद कहता। "आप में भी, मुझ में भी, हर चीज़ में।"

"इस खंभे में भी?"

"हाँ।"

बीच-बीच में प्रह्लाद अपने राक्षस सहपाठियों को समझाता — "बचपन से ही धर्म शुरू कर देना चाहिए, यह जीवन भरोसे का नहीं।"

फिर एक दिन हिरण्यकशिपु ने दरबार के उस खंभे पर घूँसा मारा।

टिप्पणी: प्रह्लाद की कथा भागवत पुराण के सातवें स्कंध (अध्याय २–७) में है; विष्णु पुराण (१.१७–२०) में इसका थोड़ा पुराना, थोड़ा छोटा रूप है, और हरिवंश तथा कई पुराणों में भी प्रह्लाद-नरसिंह के अपने-अपने पाठभेद हैं। जय-विजय वाला ढाँचा (रावण-कुंभकर्ण, शिशुपाल-दंतवक्र भी इसी से) भागवत में स्पष्ट है। वरदान की शर्तें और भक्ति के नौ अंग वाला श्लोक भागवत की पहचान हैं। होलिका को अग्नि-रोधक वरदान वाला रूप भागवत के मूल पाठ में पतला है और परवर्ती तथा त्योहार-परंपरा (भविष्य, नारद, स्थानीय होली-कथाएँ) में भरा-पूरा — भागवत का अपना अग्नि-प्रसंग छोटा है। पिता का अपने छोटे बच्चे को बार-बार मरवाना पाठ में है और वही कथा का बिंदु है; यहाँ ज़ोर बच्चे की शांति पर है, यातना के तरीक़ों पर नहीं।

स्रोत: भागवत पुराण से, प्रह्लाद — जो रुका नहीं

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष असल में विष्णु के कौन थे?

  • दो असुर सेनापति
  • दो ऋषि
  • विष्णु के दो अवतार
  • द्वारपाल जय और विजय
पूरी कथा पढ़िए — तीन जन्मों का शाप

जय और विजय ने चार कुमारों को वैकुंठ के द्वार पर रोका; कुमारों ने उन्हें तीन राक्षस-जन्मों का शाप दिया।

पहला जोड़ा — हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष। आगे यही ढाँचा रावण-कुंभकर्ण और शिशुपाल-दंतवक्र को भी जन्म देता है।

भागवत इस फ़्रेम को साफ़ रखता है।

तथ्य

ब्रह्मा से माँगे वरदान में इनमें से कौन-सी शर्त हिरण्यकशिपु ने नहीं रखी?

  • न दिन में मृत्यु, न रात में
  • "न आग से, न पानी से"
  • न घर के भीतर, न बाहर
  • न किसी हथियार से
पूरी कथा पढ़िए — हर दरवाज़ा, पर एक नहीं

हिरण्यकशिपु ने माँगा — तेरे बनाए किसी जीव से नहीं, चर या अचर; न भीतर न बाहर; न दिन न रात; न ज़मीन न आकाश; किसी हथियार से नहीं; न देवता, दानव, मनुष्य या बड़े साँप से।

उसने आग और पानी का ज़िक्र नहीं किया — पर उसकी असली भूल यह थी कि उसने "संधि" वाली हर जगह खुली छोड़ दी।

नरसिंह ने ठीक उन्हीं दरारों से प्रवेश किया।

तथ्य

प्रह्लाद को भक्ति कहाँ मिली?

  • अपने गुरुओं से
  • एक स्वप्न में
  • माँ के गर्भ में, जब नारद ने उसकी गर्भवती माँ को उपदेश दिया
  • नरसिंह के दर्शन के बाद
पूरी कथा पढ़िए — गर्भ से भक्त

हिरण्यकशिपु के तप के दौरान नारद प्रह्लाद की माँ कयाधु को अपने आश्रम ले गए और उसे भक्ति का उपदेश दिया।

गर्भ में पल रहे प्रह्लाद ने वह सुना, और वह उसी के साथ जन्मा।

इसीलिए कोई भी दंड, कोई भी डर उसे हिला नहीं पाता — वह भक्ति सीखी हुई नहीं, साथ लाई हुई थी।

किसने कहा?

भक्ति के नौ अंग — श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद-सेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य, आत्म-निवेदन — किसने, किससे कहे?

  • नारद ने, कयाधु से
  • शुक्र ने, प्रह्लाद से
  • षंड और अमर्क ने, हिरण्यकशिपु से
  • प्रह्लाद ने, अपने पिता हिरण्यकशिपु से
पूरी कथा पढ़िए — ग़लत जवाब, ग़लत जगह

हिरण्यकशिपु ने बेटे को राजनीति सीखने भेजा था, और जवाब में सुना — भक्ति के नौ अंग।

यह श्लोक (भागवत ७.५.२३) परंपरा में सबसे ज़्यादा उद्धृत होने वाले श्लोकों में है।

पिता के लिए यह अवज्ञा थी; प्रह्लाद के लिए यही एकमात्र सीखने लायक़ बात थी।

क्या हुआ?

इनमें से कौन-सा तरीक़ा हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को मारने के लिए नहीं आज़माया?

  • उसे अंधे कुएँ में जीवित चुनवाना
  • हाथियों से कुचलवाना
  • ज़हरीले साँप लिपटाना
  • समुद्र में डुबोना
पूरी कथा पढ़िए — हर तरीक़ा, कोई असर नहीं

भागवत गिनाता है — पहरेदारों के हथियार, हाथी, साँप, भोजन में विष, भूख, पहाड़ से गिराना, समुद्र में पहाड़ रखकर डुबोना, मंत्र और आग।

हर बार प्रह्लाद हरि में डूबा रहा, और पूछने पर क्रोधित भी नहीं था।

पाठ का ज़ोर यातना के तरीक़ों पर नहीं, बच्चे की शांति पर है।

बाद की परंपरा

होलिका वाली कथा किस त्योहार से जुड़ी है, और भागवत में उसकी स्थिति क्या है?

  • दीवाली से; और भागवत में यह विस्तार से है
  • नवरात्रि से; और यह सिर्फ़ भागवत में है
  • होली (होलिका-दहन) से; और भागवत का अपना अग्नि-प्रसंग छोटा है
  • मकर संक्रांति से
पूरी कथा पढ़िए — बाद की परत

भागवत में आग से मारने की कोशिश तो है, पर "बुआ होलिका, जिसे वरदान था कि आग नहीं जलाएगी" वाला पूरा दृश्य भविष्य, नारद और स्थानीय होली-कथाओं में भरा-पूरा मिलता है।

इसी से होली की पूर्व-संध्या पर होलिका-दहन जुड़ा है।

इसलिए यह अध्याय उसे "बाद की परंपरा" कहकर रखता है, भागवत का सुनिश्चित दृश्य कहकर नहीं।

किसने कहा?

"इस खंभे में भी?" — यह किसने कहा?

  • हिरण्यकशिपु ने
  • प्रह्लाद ने
  • नरसिंह ने
  • ब्रह्मा ने
पूरी कथा पढ़िए — आख़िरी सवाल

प्रह्लाद बार-बार कहता रहा — भगवान हर जगह हैं, आप में भी, मुझ में भी।

हिरण्यकशिपु ने उसी बात को झुठलाने के लिए खंभे की ओर इशारा किया — "इसमें भी?" प्रह्लाद ने कहा "हाँ।"

फिर उसने खंभे पर घूँसा मारा — और वहीं से अगला अध्याय शुरू होता है।

ऐसा क्यों?

प्रह्लाद अपने साथ हुई हर क्रूरता के बावजूद क्रोधित क्यों नहीं था?

  • क्योंकि उसे दर्द महसूस ही नहीं होता था
  • क्योंकि उसे पता था कि नरसिंह आएँगे
  • क्योंकि उसके गुरुओं ने उसे क्रोध रोकना सिखाया था
  • क्योंकि वह हर चीज़ में
पूरी कथा पढ़िए — शत्रु कोई नहीं

प्रह्लाद के लिए हिरण्यकशिपु "बुरा पिता" से पहले एक और जगह था जहाँ भगवान थे।

इसीलिए दंड उसे तोड़ नहीं पाया — उसके पास नफ़रत करने के लिए कोई नहीं था।

बीच-बीच में वह अपने राक्षस सहपाठियों को यही समझाता — "बचपन से ही धर्म शुरू कर दो, यह जीवन भरोसे का नहीं।"

ग्रंथ असहमत

प्रह्लाद-नरसिंह की कथा और किन ग्रंथों में है, और भागवत की अपनी पहचान क्या है?

  • सिर्फ़ भागवत में है
  • विष्णु पुराण, हरिवंश और कई पुराणों में इसके अपने-अपने रूप हैं; भागवत की पहचान है वरदान की सटीक शर्तें और भक्ति के नौ अंग वाला श्लोक
  • सिर्फ़ रामायण में
  • यह कथा वेदों में पूरी मिलती है
पूरी कथा पढ़िए — साझा कथा, अलग हस्ताक्षर

विष्णु पुराण (१.१७–२०) में यही कथा थोड़ी पुरानी, थोड़ी छोटी है।

हरिवंश, पद्म, मत्स्य और अन्य पुराणों में भी प्रह्लाद-नरसिंह के पाठभेद हैं।

भागवत जो चीज़ें सबसे तीखे ढंग से गढ़ता है, वे हैं वरदान की "संधि" वाली शर्तें और नौ-अंग वाला श्लोक।

कौन हूँ मैं?

मैं एक राक्षस का बेटा हूँ, पर गर्भ से भगवान का भक्त। मेरे पिता ने मुझे मारने की हर कोशिश की, और हर कोशिश नाकाम रही। मैं कौन हूँ?

  • प्रह्लाद
  • ध्रुव
  • बलि
  • वृत्र
पूरी कथा पढ़िए — जो रुका नहीं

प्रह्लाद की कथा का पूरा भार इसी एक बात पर है — कि वह हर बार लौटकर वही नाम लेता रहा।

पिता ने समझाया, डाँटा, मारा — कुछ नहीं बदला।

और जब सब ख़त्म हुआ, तो सबसे बड़ा दृश्य वध का नहीं, उसके बाद का था — जब वही बच्चा भगवान के क्रोध को शांत करता है।