
अध्याय २
पृथु — जिसने धरती को दुहा
जिस राजा ने कहा "भोग मैं ही हूँ", उसे मारकर ऋषियों ने उसी की देह से एक बेहतर राजा निकाला
पृथु — जिसने धरती को दुहा — भागवत भक्त का अध्याय २। स्रोत: भागवत पुराण। इसमें ५ दृश्य हैं — वेन; देह से निकले दो; काम पहले, बड़ाई बाद में; धरती, जो गाय बनकर भागी; सौवाँ घोड़ा — और अंत में १० सवाल।
वेन
राजा अंग अच्छे राजा थे, पर उनकी पत्नी सुनीथा मृत्यु की बेटी थी। उनका बेटा वेन बचपन से ही क्रूर निकला। खेल-खेल में वह साथी बच्चों को मार डालता। अंग समझा-समझाकर थक गए, और एक रात राजपाट छोड़कर चुपचाप घर से निकल गए।
राजा के बिना प्रजा असुरक्षित हो गई, इसलिए ऋषियों ने वेन को ही गद्दी पर बिठा दिया। वेन ने पहला आदेश यही दिया — "कोई यज्ञ नहीं होगा, कोई दान नहीं। भोग करने वाला और पूजने योग्य सिर्फ़ मैं हूँ। मुझे चढ़ाओ।"
ऋषियों ने बहुत समझाया, पर वेन नहीं माना। तब उन्होंने क्रोध से भरकर, बिना किसी हथियार के, अपने हुंकार की शक्ति से ही वेन को मार डाला।
देह से निकले दो
वेन मर गया और देश में फिर लूटपाट फैल गई। राजा फिर भी चाहिए था।
ऋषियों ने वेन की जाँघ मथी। उसमें से एक ठिगना, साँवला, बेडौल आदमी निकला। ऋषियों ने उससे कहा — "निषीद", यानी बैठ जा, यहीं रुक जा। वह निषाद कहलाया। पाठ कहता है कि वह वेन के पाप को अपने साथ ले गया।
फिर ऋषियों ने वेन की भुजाएँ मथीं। उनमें से पृथु प्रकट हुए — तेजस्वी, हथेलियों पर चक्र का चिह्न लिए — और उनके साथ उनकी रानी अर्चि। पृथु विष्णु के अंश थे, धरती के पहले विधिवत अभिषिक्त राजा — आदिराज।
काम पहले, बड़ाई बाद में
जन्म लेते ही सूत और मागध — पहले बंदी और पहले वंश-गायक — पृथु की स्तुति करने लगे। पृथु ने उन्हें रोक दिया।
"मैंने अभी कुछ किया ही नहीं। इसकी जगह यह गाओ कि भगवान मुझमें आगे कौन-से गुण दिखाएँगे — ताकि मुझे पता रहे कि मुझे किस पर खरा उतरना है।"
धरती, जो गाय बनकर भागी
फिर पृथु के राज्य में अकाल पड़ा। खेतों में अन्न उग ही नहीं रहा था। पृथु ने धरती को दोषी ठहराया। धरती गाय का रूप लेकर भागी, और पृथु धनुष उठाए तीनों लोकों में उसके पीछे दौड़ते रहे।
आख़िर धरती मुड़ी और बोली — "बीज मेरे भीतर बंद पड़े हैं और सड़ रहे हैं। मुझे एक बछड़ा दो, एक दुहने वाला दो, तो मैं सब कुछ दूध की तरह दे दूँगी।"
पृथु ने स्वायंभुव मनु को बछड़ा बनाया और अपनी अंजुली में सारे अन्न और औषधियाँ दुह लीं। फिर एक-एक करके सब आते गए। ऋषियों ने बृहस्पति को बछड़ा बनाकर वेद दुहे। देवताओं ने इंद्र को बछड़ा बनाकर बल और अमृत। दैत्यों और दानवों ने प्रह्लाद को बछड़ा बनाकर मदिरा। गंधर्वों ने संगीत और सौंदर्य। पितरों ने अपना हविष्य। हर वर्ग ने अपने पात्र में, अपने योग्य वस्तु ली।
तब पृथु ने अपने धनुष की नोक से धरती को समतल किया — पहले वह सारी ऊबड़-खाबड़ थी — ताकि उस पर गाँव बस सकें और खेती हो सके। पाठ कहता है कि धरती "पृथ्वी" इसीलिए कहलाई: वह पृथु की हुई।
अथर्ववेद में भी "पृथी वैन्य" — यानी वेन का बेटा पृथु — वह पहला व्यक्ति है जिसने धरती से खेती निकाली। इस कथा का सबसे पुराना बीज वहीं मिलता है।
सौवाँ घोड़ा
पृथु ने सौ अश्वमेध यज्ञ करने का संकल्प लिया। निन्यानबे पूरे हो गए। सौवें में इंद्र ने ईर्ष्या से घोड़ा चुरा लिया, और वह भी एक ढोंगी तपस्वी का भेस बनाकर।
पृथु का बेटा घोड़े को पकड़ लाया। ऋषि इंद्र को शाप देने ही वाले थे कि ब्रह्मा ने आकर सौवाँ यज्ञ रोक दिया और दोनों में मेल करा दिया।
बाद में चार कुमारों ने पृथु को वैराग्य सिखाया। बुढ़ापे में पृथु और अर्चि वन चले गए, और अर्चि ने पति के पीछे प्राण त्याग दिए।
टिप्पणी: पृथु की कथा भागवत पुराण के चौथे स्कंध (अध्याय १३–२३, मुख्य रूप से १४–१८) में है; विष्णु पुराण (१.१३) में इसका मूल, कुछ छोटा रूप मिलता है, और अथर्ववेद में "पृथी वैन्य" को खेती धरती से निकालने वाला पहला व्यक्ति कहा गया है — यही सबसे पुराना बीज है। वेन की देह से निषाद के निकलने वाला प्रसंग एक नाम की व्युत्पत्ति-कथा है; आधुनिक सामाजिक इतिहास में ऐसी "अमुक जाति ऐसे बनी" वाली उत्पत्ति-कथाओं को अक्सर ऐतिहासिक वंशावली नहीं, बल्कि बाद की सामाजिक व्याख्या के रूप में पढ़ा जाता है, और यह साइट इस पर कोई निर्णय नहीं देती और किन्हीं जन-समूहों की सूची नहीं दोहराती। धरती को दुहने की सूची में बछड़े और पात्र वाचना-दर-वाचना थोड़े बदलते हैं; यहाँ भागवत (४.१८) का क्रम लिया गया है। सौवें अश्वमेध में इंद्र का घोड़ा चुराना और ब्रह्मा का यज्ञ रोकना — देवता भी सदा सही नहीं होते, यह भागवत का अपना स्वर है।
स्रोत: भागवत पुराण से, पृथु — जिसने धरती को दुहा