
अध्याय ६
चामुंडा
काली बनीं चामुंडा
धूम्रलोचन की राख
धूम्रलोचन साठ हज़ार असुरों की सेना लेकर पहुँचा। कौशिकी ने उसे चेतावनी दी।
वह नहीं रुका — वह उन पर झपटा। कौशिकी ने बस एक आवाज़ की — "हुं" — और धूम्रलोचन वहीं राख हो गया।
फिर उनके सिंह ने बची हुई सेना को चीर डाला।
चंड और मुंड
शुम्भ ने अब चंड और मुंड को एक बड़ी सेना के साथ भेजा।
वे हिमालय पर पहुँचे और देखा — कौशिकी अपने सिंह पर बैठी, मुस्कुराती हुई, अकेली।
उन्होंने हमला किया।
माथे से काली
कौशिकी का चेहरा क्रोध से काला पड़ गया, और उनके माथे की एक सिलवट से एक देवी फूट पड़ीं।
दुबली, हड्डियों वाली, बाघ की खाल पहने, गले में मुंडों की माला, हाथ में खट्वांग, मुँह खुला और लाल, जीभ बाहर।
उन्होंने एक गर्जना की जिससे आकाश काँप गया।
काली का संहार
काली असुर सेना पर टूट पड़ीं। हाथी, रथ, घोड़े, सवार — वे उन्हें उठाकर मुँह में डालतीं, चबातीं, कुचलतीं।
बड़े योद्धाओं को खट्वांग से मारतीं, बाक़ियों को दाँतों तले। पहले साठ हज़ार सैनिक, फिर उससे भी बड़ी सेना।
काली के सामने कोई टिक नहीं पाया। चंड और मुंड यह देखते रह गए।
दो सिर
चंड आगे बढ़ा। काली ने उसे बालों से पकड़ा और तलवार से उसका सिर काट दिया। मुंड दौड़ा।
उसका भी सिर उसी तरह गिरा। काली दोनों सिर उठाकर कौशिकी के पास गईं।
"यह रहे चंड और मुंड — दो बड़े पशु, मेरी भेंट। शुम्भ और निशुम्भ को अब आप ख़ुद मारिए।"
चामुंडा नाम
कौशिकी प्रसन्न हुईं।
"तुमने मेरे लिए चंड और मुंड को लाकर दिया," उन्होंने कहा।
"इसलिए संसार में तुम्हारा नाम चामुंडा होगा।" जिन दो असुरों ने कौशिकी को "रत्न" कहकर शुम्भ का ध्यान उस पर खींचा था, उन्हीं दोनों के नाम पर देवी का यह उग्र रूप चामुंडा कहलाया।
टिप्पणी: देवी माहात्म्य के सप्तम अध्याय में यह प्रसंग है। चामुंडा नाम वहीं से आया — चंड + मुंड। यहाँ काली कौशिकी/अम्बिका के क्रोध से प्रकट हुई उग्र शक्ति हैं; चंड और मुंड को मारने के बाद उन्हें चामुंडा नाम मिलता है। बाद की तांत्रिक परंपराओं में यही रूप — दुबली, हड्डियों वाली, श्मशान से जुड़ी — अपनी स्वतंत्र और बहुत विस्तृत उपासना-परंपरा विकसित करता है।
स्रोत: कई ग्रंथों से, चामुंडा