
अध्याय १०
दस महाविद्या
सती के दस रूप
शिव ने रोका
सती को पिता दक्ष के यज्ञ में जाना था। शिव ने मना किया — वहाँ अपमान होगा। सती को क्रोध आया।
उनका रूप बदलने लगा — और उनके चारों ओर, एक-एक कर, दस देवियाँ प्रकट होने लगीं। हर एक अलग: कोई काली, कोई नीली, कोई वृद्ध, और एक ऐसी, जिसने अपना ही सिर काट रखा है।
दस दिशाओं में दस
शिव घबराकर वहाँ से निकलने लगे।
पर जिधर भी वे मुड़े, उन दस में से एक खड़ी थी — पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर, नीचे, हर कोने में।
"ये कौन हैं?" शिव ने पूछा।
सती का उत्तर
"ये सब मैं ही हूँ," सती ने कहा। "मेरे दस रूप।"
"तुमने मुझे रोका, इसलिए मैंने तुम्हें दिखाया कि मैं क्या हूँ।" शिव ने सती को जाने दिया। आगे जो हुआ — दक्ष का अपमान, सती का देह-त्याग — वह शिव-महिमा की कथा है।
यहाँ हम सती की तरफ़ से देख रहे हैं: उन्होंने जाने की अनुमति माँगी नहीं, ली।
दस के चेहरे — पहली चार
उन दस को महाविद्या कहते हैं — "बड़ी विद्याएँ"। इन्हें एक ही कहानी के दस पात्र समझना ठीक नहीं होगा; हर एक की अपनी स्वतंत्र साधना, प्रतीक और दर्शन आगे विकसित हुआ। पहली दो सबसे उग्र हैं।
काली — काल, मृत्यु और मुक्ति की देवी। तारा — उग्र और तारने वाली, पर उतनी ही भयानक।
तारा का नाम और रूप हिंदू और बौद्ध तांत्रिक परंपराओं दोनों में मिलता है, पर दोनों की परंपराएँ एक जैसी नहीं हैं। तीसरा रूप है षोडशी, यानी त्रिपुरसुंदरी — सोलह वर्ष की पूर्णता से जुड़ा रूप, श्रीविद्या की ललिता से निकट (अध्याय ११)।
और सबसे चौंकाने वाली हैं छिन्नमस्ता — अपना सिर स्वयं काटे हुए। उनकी गर्दन से तीन रक्तधाराएँ निकलती हैं — एक वे स्वयं पीती हैं, बाक़ी दो उनकी दो सहचरियाँ।
बाक़ी छह
बाक़ी छह में कई ऐसी देवियाँ हैं जिन्हें आम मंदिरों में कम पूजा जाता है। भुवनेश्वरी शांत हैं, जिनकी देह में पूरा ब्रह्मांड समाया है। भैरवी उग्र तप का, शक्ति और भय के पार जाने का रूप हैं।
धूमावती विधवा हैं, धुएँ के रंग की, कौवे के चिह्न वाले रथ से जुड़ी अभाव की देवी। बगलामुखी पीली हैं, जो शत्रु की वाणी और गति को स्तंभित कर देती हैं।
मातंगी सामाजिक सीमाओं और "अशुद्ध" मानी गई चीज़ों को उलटने वाला रूप हैं, चांडाल और उच्छिष्ट से जुड़ी। और कमला लक्ष्मी से निकट जुड़ा रूप हैं, कमल और समृद्धि से संबंधित।
साधना की देवियाँ
महाविद्याओं का मुख्य शास्त्रीय ढाँचा तांत्रिक साधना से जुड़ा है, हालांकि इनमें से कई देवियों की स्वतंत्र भक्तिपरक पूजा भी व्यापक है। अलग-अलग साधना-परंपराओं में इनके अपने मंत्र, यंत्र और अनुष्ठान विकसित हुए।
कहीं साधना का लक्ष्य ज्ञान या मुक्ति है, कहीं वाणी, रक्षा या स्तंभन। इन विधियों को एक ही सामान्य पूजा-पद्धति मानना ठीक नहीं होगा।
महाविद्याएँ देवी के दस ऐसे रूप हैं जो दैवी स्त्रीत्व को केवल सुंदरता और सौम्यता तक सीमित नहीं रहने देते। इनमें उग्रता, अभाव, मृत्यु और सामाजिक सीमाओं के बाहर मानी गई चीज़ों के लिए भी स्थान है।
टिप्पणी: सती के दस महाविद्या रूप लेकर शिव को चारों ओर से घेरने की यह कथा महाभागवत पुराण और बृहद्धर्म पुराण जैसे उत्तरकालीन शाक्त उपपुराणों में मिलती है। महाविद्याओं की सूची और उनकी साधना अनेक तांत्रिक ग्रंथों में आगे विकसित होती है। धूमावती — बिना पति की देवी — एक असामान्य रूप है जो परंपरागत स्त्री-दैवत्व से बाहर जाता है।
स्रोत: कई ग्रंथों से, दस महाविद्या