
अध्याय ३
दुर्गा — हार से बनी देवी
देवताओं के तेज से जन्म
महिषासुर
महिषासुर असुरों का राजा था — भैंसे का रूप धारण करने वाला, जब चाहे रूप बदलने वाला। देवी माहात्म्य यहाँ उसकी उत्पत्ति या वरदान की कथा नहीं सुनाता।
कथा सीधे उसके देवताओं पर चढ़ाई करने से शुरू होती है।
सौ बरस का युद्ध
युद्ध सौ बरस चला। आख़िर में महिष जीत गया।
उसने इंद्र का सिंहासन ले लिया, तीनों लोकों का स्वामी बन बैठा।
देवता स्वर्ग से निकाल दिए गए और आम मनुष्यों की तरह धरती पर भटकने लगे।
देवताओं की शिकायत
हारे हुए देवता विष्णु और शिव के पास पहुँचे और पूरी कथा सुनाई — कैसे महिष ने सूर्य का काम ले लिया, चंद्र का, वायु का, यम का; कैसे वे अपने ही स्वर्ग से बेघर हो गए। सुनते-सुनते विष्णु और शिव क्रोध में आ गए।
उनके मुँह से तेज निकलने लगा।
बाक़ी हर देवता के शरीर से भी।
तेज का पर्वत
वे सब लपटें एक जगह मिलीं और एक जलता हुआ पर्वत बन गईं, जिसकी रोशनी तीनों लोकों में फैल गई।
फिर वह पर्वत सिमटकर एक स्त्री का रूप ले गया — तीन आँखों वाली, कई भुजाओं वाली।
देवी माहात्म्य उन्हें एक नाम से नहीं बुलाता — चंडिका, अम्बिका, दुर्गा, कात्यायनी, सब उन्हीं के नाम हैं।
हर देवता का एक अंग
उनका हर अंग एक अलग देवता के तेज से बना। शिव के तेज से चेहरा, विष्णु के तेज से भुजाएँ, चंद्र से स्तन, इंद्र से कमर, वरुण से जंघाएँ, पृथ्वी से नितंब, ब्रह्मा से पैर, वसुओं से हाथ और उँगलियाँ, अग्नि से तीन नेत्र, वायु से कान।
सूर्य ने अपनी किरणें उनकी त्वचा के रोम-रोम में भर दीं। वे किसी एक देवता की बेटी नहीं थीं, किसी की पत्नी नहीं।
वे उन सबकी हार से बनी एक नई देवी थीं — और उनकी होकर नहीं रहने वाली थीं।
हर देवता का एक हथियार
फिर हर देवता ने अपने हथियार की एक प्रति उन्हें दी। शिव ने त्रिशूल, विष्णु ने चक्र, वरुण ने शंख, अग्नि ने शक्ति, वायु ने धनुष-बाण, इंद्र ने वज्र और घंटा, यम ने दंड, ब्रह्मा ने कमंडल और अक्षमाला, काल ने तलवार और ढाल।
कुबेर ने मदिरा से भरा पात्र दिया। समुद्र ने कभी न मुरझाने वाली माला।
हिमालय ने सवारी के लिए एक सिंह। फिर उस देवी ने एक अट्टहास किया — इतना बड़ा कि तीनों लोक काँप गए, समुद्र हिल गए, पर्वत डोले।
महिष ने वह गर्जना सुनी। "यह क्या है?" कहकर वह अपनी सेना के साथ उसकी ओर बढ़ा।
टिप्पणी: दुर्गा के इस रूप की सबसे विस्तृत कथा देवी माहात्म्य (मार्कण्डेय पुराण, मध्यम चरित) में है। "तेज से निर्मित" वाला दृश्य उसी पाठ में है, और हर देवता का तेज किस अंग में गया — यह सूची भी। महिष का "कोई पुरुष या देवता न मार सके, स्त्री का नाम भूल गया" वाला वरदान देवी माहात्म्य के इस चरित में नहीं है — वह अन्य पुराण-परंपराओं में मिलता है (कुछ में उसे असुर रम्भ और एक भैंसी का पुत्र बताया गया है)। देवी माहात्म्य में सीधे सौ बरस के युद्ध और देवताओं की हार से कथा शुरू होती है। कुबेर का मदिरा-पात्र मूल पाठ में है और अध्याय ४ के मदिरा-प्रसंग से जुड़ता है।
स्रोत: कई ग्रंथों से, दुर्गा — हार से बनी देवी