
अध्याय १४
मनसा, शीतला, षष्ठी
लोक की तीन देवियाँ
ग्रंथ और लोक के बीच
अब तक के तेरह अध्यायों की अधिकांश देवियाँ बड़े संस्कृत ग्रंथों से आई हैं — देवी माहात्म्य, पुराण और तंत्र से। लेकिन लोकजीवन में पूजी जाने वाली अनेक देवियों की कथाएँ केवल संस्कृत ग्रंथों से तय नहीं होतीं।
वे क्षेत्रीय भाषाओं, गीतों, व्रत-कथाओं और घरेलू अनुष्ठानों में भी जीवित रहती हैं। बाद के ग्रंथ उन्हें अपने बड़े पौराणिक ढाँचों में स्थान देते हैं, पर उनकी पूजा उन ग्रंथों से कहीं अधिक व्यापक और विविध हो सकती है।
मनसा, शीतला, षष्ठी — ये तीनों ऐसी ही हैं। यहाँ पूजा का कारण साँप है, बुखार है, नवजात की साँस है।
मनसा और चाँद सौदागर
मनसा साँपों की देवी हैं, बंगाल-असम-बिहार में। उनकी उत्पत्ति की कोई एक कथा नहीं है — कहीं वे कश्यप ऋषि की पुत्री हैं, कहीं शिव से जन्मी, कहीं नाग-कन्या। बंगाली मनसा-मंगल काव्यों में मनसा की प्रतिष्ठा का संघर्ष कथा के केंद्र में है।
शिव की पत्नी चंडी उन्हें घर में स्वीकार नहीं करतीं और शिव-भक्त चाँद सौदागर उनकी पूजा करने से साफ़ इनकार कर देता है। मनसा उससे अपनी पूजा स्वीकार करवाना चाहती हैं और इस संघर्ष में कठोर दंड देती हैं। चाँद सौदागर बड़ा व्यापारी और शिव-भक्त है।
मनसा उसका व्यापार नष्ट करती हैं और उसके बेटों की मृत्यु का कारण बनती हैं। अलग-अलग मनसा-मंगल रचनाओं में घटनाओं और बेटों की संख्या का विवरण बदलता है।
बेहुला
सबसे छोटे बेटे लखिन्दर की शादी बेहुला से हुई। चाँद ने उसे बचाने के लिए लोहे का विवाह-कक्ष बनवाया, पर साँप भीतर पहुँच गया और विवाह की रात लखिन्दर मर गया। बेहुला ने उसका शव जलाने नहीं दिया।
वह उसे केले के तनों से बने बेड़े पर रखकर नदी में उतर गई और लंबी यात्रा पर निकल पड़ी। अंततः बेहुला देवताओं तक पहुँची और उनके सामने नाची। उसने लखिन्दर का जीवन और परिवार का खोया हुआ सौभाग्य वापस माँगा।
इसके बदले चाँद सौदागर को मनसा की पूजा स्वीकार करनी पड़ी। कई लोकप्रिय रूपों में वह अंततः बाएँ हाथ से या मुँह फेरकर अर्पण करता है। लखिन्दर जीवित हो जाता है।
शीतला — चेचक की देवी
शीतला का नाम ही "ठंडी" है — और वे चेचक और ज्वर से जुड़ी देवी हैं। उत्तर भारत में मान्यता यह थी कि चेचक शीतला का "आना" है — बीमारी नहीं, देवी की उपस्थिति। इसलिए रोगी को ठंडा रखो, नीम की पत्तियाँ रखो, नाराज़ मत करो।
उन्हें गधे पर सवार दिखाया जाता है, हाथ में झाड़ू और जल का पात्र। शीतला की लोककथाएँ क्षेत्र के अनुसार बदलती हैं।
गुजरात में शीतला सातम और उत्तर भारत के कई हिस्सों में शीतला अष्टमी या बसौड़ा जैसे पर्व उनसे जुड़े हैं। कई जगह उस दिन ताज़ा खाना नहीं पकाया जाता और पहले से बना ठंडा भोजन चढ़ाया और खाया जाता है।
षष्ठी — छठे दिन की देवी
षष्ठी बच्चों की रक्षक हैं। जन्म के छठे दिन उनकी पूजा होती है। कई लोक-परंपराओं में माना जाता है कि इस रात देवी नवजात का भाग्य लिखती हैं और उसकी रक्षा करती हैं।
उन्हें अक्सर बिल्ली पर सवार दिखाया जाता है; बिल्ली उनकी पहचान का प्रमुख लोक-चिह्न बन गई। अनेक क्षेत्रों में स्त्रियाँ घर के भीतर, बरगद के नीचे या किसी स्थानीय पूजा-स्थल पर उनके व्रत और अनुष्ठान करती हैं।
पूजा की विधि क्षेत्र और समुदाय के अनुसार बदलती है। बंगाल में उनकी पूजा "षष्ठी पूजा" के रूप में अलग है — बिहार का "छठ" सूर्य-पूजा है, यह उससे अलग है।
लोक से ग्रंथ तक
समय के साथ इन देवियों को संस्कृत और पौराणिक परंपराओं ने भी अपने ढाँचों में स्थान दिया। मनसा की उत्पत्ति के कई रूप बने; शीतला के प्रसंग पुराणों से जोड़े गए; और षष्ठी की पहचान कहीं स्कंद की पालक माता, कहीं उनकी पत्नी देवसेना से की गई।
लोकपूजा और ग्रंथीय परंपरा का संबंध एकतरफ़ा नहीं था। पुरानी स्थानीय मान्यताएँ ग्रंथों में पहुँचीं और ग्रंथों ने बदले में उनकी नई पहचान बनाई।
"महादेवी" का शाक्त ढाँचा इन अलग-अलग देवियों को एक व्यापक दैवी शक्ति के रूप में जोड़ता है, लेकिन उनकी क्षेत्रीय विशिष्टता पूरी तरह समाप्त नहीं करता। देवी-चरित यह दर्ज करती है, छिपाती नहीं।
टिप्पणी: मनसा की कथा का सबसे बड़ा स्रोत मनसा-मंगल काव्य (बंगाल, मध्यकाल) है; देवी भागवत में भी उनका उल्लेख है। बेहुला-लखिन्दर उस कथा का केंद्र हैं। शीतला के पौराणिक उल्लेख स्कंद पुराण से जुड़े मिलते हैं, पर उनकी लोक-पूजा का इतिहास केवल उस ग्रंथ तक सीमित नहीं है। षष्ठी की पूजा "षष्ठी तिथि" और प्रसूति-नवजात से संबंधित लोक परंपराओं से जुड़ी है। इन देवियों की पूजा में लोक और ग्रंथीय परंपराएँ एक-दूसरे से मिलती हैं — फिर भी उनकी सबसे जीवित परंपरा घरेलू और क्षेत्रीय रही है।
स्रोत: कई ग्रंथों से, मनसा, शीतला, षष्ठी