अध्याय ५

काली — कौशिकी के क्रोध से

पार्वती, कौशिकी और कालिका

शुम्भ और निशुम्भ का राज

महिष के बहुत बाद, दो असुर भाई उठे — शुम्भ और निशुम्भ। उन्होंने इंद्र और देवताओं को हराया, यज्ञों के हिस्से छीन लिए, सूर्य का काम, चंद्र का, वायु का — सब अपने पास कर लिया।

देवता फिर स्वर्ग से निकाल दिए गए। पर इस बार उनके पास एक चीज़ थी जो महिष के समय नहीं थी — एक वचन।

देवी ने कहा था: याद करोगे तो आ जाऊँगी।

देवताओं का गीत

देवता हिमालय गए और गाने लगे —

"या देवी सर्वभूतेषु — जो देवी हर जीव में शक्ति के रूप में, बुद्धि के रूप में, नींद, भूख, छाया, दया, क्षमा के रूप में बसती हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार।" यह वही देवी सूक्त नहीं जो अध्याय १ में था — वह ऋग्वेद का था।

यह देवी माहात्म्य का अपना स्तोत्र है, और आज भी दुर्गा पूजा में गाया जाता है।

कोश से कौशिकी

उसी समय पार्वती वहाँ गंगा में स्नान करने आईं। "तुम किसकी स्तुति कर रहे हो?" उन्होंने पूछा।

उनके यह पूछते ही, उनकी अपनी देह के कोश से — भीतर की परत से — एक देवी निकलीं: चमकती हुई, सुंदर, अकेली। कोश से निकलने के कारण उनका नाम पड़ा कौशिकी।

अम्बिका भी। देवताओं ने कहा: "हम इन्हीं की स्तुति कर रहे थे।"

"ये आ गईं।"

पार्वती कालिका हुईं

जिस पार्वती से वह चमकती देवी निकली, वे ख़ुद अब बदल गईं। उनकी देह से जैसे सारी रोशनी कौशिकी में चली गई हो — पार्वती श्याम रंग की हो गईं।

तभी से उनका एक नाम पड़ा — कालिका। यहाँ "कालिका" नाम श्याम हुई पार्वती के लिए आया है।

आगे युद्ध में कौशिकी के माथे से एक उग्र काली भी प्रकट होंगी। देवी माहात्म्य इन दोनों घटनाओं को अलग-अलग सुनाता है; बाद की शाक्त परंपराएँ दोनों रूपों को एक ही महादेवी से जोड़ती हैं।

"पहले मुझे हराओ"

शुम्भ के दो सेवक — चंड और मुंड — ने हिमालय पर कौशिकी को देखा और लौटकर शुम्भ को उनके रूप का वर्णन किया। "तीनों लोकों के सारे रत्न आपके पास हैं," उन्होंने कहा।

"यह स्त्री सबसे सुंदर है — यह भी आपके पास होनी चाहिए।" शुम्भ ने दूत भेजा। दूत ने विवाह का प्रस्ताव रखा।

कौशिकी ने कहा: "मेरा एक व्रत है। मैं उसी से विवाह करूँगी जो मुझे युद्ध में हरा दे और मेरे बराबर शक्ति साबित करे।"

"जाकर अपने स्वामी से कह दो — पहले मुझे हराओ।"

धूम्रलोचन भेजा गया

शुम्भ आग-बबूला हो गया। उसने धूम्रलोचन नाम के सेनापति को साठ हज़ार असुरों की सेना के साथ भेजा — "उसे बालों से घसीटकर ले आओ।"

"जो बीच में आए, उसे मार डालो।" धूम्रलोचन सेना लेकर हिमालय की ओर चल पड़ा।

ऊपर कौशिकी शांत बैठी थीं, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

टिप्पणी: देवी माहात्म्य के उत्तम चरित के पाँचवें अध्याय में पार्वती से कौशिकी के प्रकट होने और पार्वती के कालिका कहलाने का प्रसंग आता है। "कोश" (आवरण) से "कौशिकी" नाम बना। "या देवी सर्वभूतेषु" का स्तोत्र इसी संदर्भ में आता है — यह देवी माहात्म्य का अपना स्तोत्र है, ऋग्वेद वाला नहीं। चंड-मुंड यहाँ देखने और ख़बर लाने वाले हैं; औपचारिक दूत अलग आता है। काली और पार्वती का यह रिश्ता हर ग्रंथ में एक जैसा नहीं है।

स्रोत: कई ग्रंथों से, काली — कौशिकी के क्रोध से

अब बताइए — कितना याद रहा?

क्या हुआ?

देवताओं की स्तुति सुनकर पार्वती के पूछने पर क्या हुआ?

  • पार्वती ने ख़ुद शुम्भ-निशुम्भ से लड़ने का फ़ैसला किया
  • शिव प्रकट हुए और देवताओं को आश्वासन दिया
  • पार्वती की देह के कोश से एक चमकती देवी
  • देवता निराश होकर लौट गए
पूरी कथा पढ़िए — एक देह से दो देवियाँ

देवी माहात्म्य में यह सबसे बारीक़ जन्म है: कोई तेज नहीं, कोई पर्वत नहीं — बस एक सवाल, "तुम किसकी स्तुति कर रहे हो?", और उसी पल पार्वती से एक दूसरी देवी अलग हो जाती हैं।

"कौशिकी" नाम "कोश" से है — भीतर की परत, म्यान। वे पार्वती के भीतर से निकलीं।

और जो पीछे रह गईं — पार्वती — काली पड़ गईं। जैसे उजाला एक तरफ़ चला गया और अँधेरा दूसरी तरफ़।

तथ्य

अध्याय ५ में देवता जो देवी सूक्त गाते हैं ("या देवी सर्वभूतेषु…"), वह अध्याय १ वाले देवी सूक्त से कैसे अलग है?

  • अध्याय १ वाला ऋग्वेद का है (सबसे पुराना); यह देवी माहात्म्य का अपना "तांत्रोक्त देवी सूक्त" है, और बाद का
  • दोनों एक ही हैं, बस नाम अलग
  • यह ऋग्वेद का है और अध्याय १ वाला बाद का
  • यह किसी ग्रंथ में नहीं, सिर्फ़ लोक-गीत है
पूरी कथा पढ़िए — दो देवी सूक्त, एक परंपरा

शाक्त परंपरा में "देवी सूक्त" दो हैं: वैदिक (ऋग्वेद १०.१२५, वाक् आम्भृणी का) और तांत्रोक्त (देवी माहात्म्य का, "या देवी…")।

दुर्गा पूजा में अक्सर दोनों बोले जाते हैं — पहला सप्तशती से पहले, दूसरा सप्तशती के भीतर।

दोनों का दावा एक है: देवी हर जगह, हर जीव में शक्ति के रूप में मौजूद हैं। फ़र्क़ सिर्फ़ उम्र का और शब्दों का।

किसने कहा?

"मैं उसी से विवाह करूँगी जो मुझे युद्ध में हरा दे।" — यह किसने, किससे कहलवाया?

  • पार्वती ने, शिव को
  • काली ने, शुम्भ को सीधे
  • देवताओं ने, शुम्भ को
  • कौशिकी ने, शुम्भ के दूत के ज़रिये
पूरी कथा पढ़िए — एक व्रत, जो जाल बना

कौशिकी का व्रत सुनने में विनम्र लगता है — "जो मुझे हराए"। पर इसका असली मतलब है: कोई मुझे हरा नहीं सकता, इसलिए कोई मुझसे विवाह नहीं कर सकता।

शुम्भ के लिए यह अपमान था — उसके पास तीनों लोकों के रत्न थे, और यह स्त्री कह रही थी "पहले जीतो"।

यही व्रत पूरे उत्तम चरित का इंजन है: शुम्भ एक-एक करके सेनापति भेजता है, हर एक हारता है, और आख़िर में उसे ख़ुद आना पड़ता है।

कौन हूँ मैं?

मैं पार्वती की देह के भीतर की परत से निकली। मैं उजली हूँ, अकेली हूँ, किसी की पत्नी नहीं। मेरे निकलते ही पार्वती ख़ुद काली पड़ गईं। मैं कौन हूँ?

  • दुर्गा, जो देवताओं के तेज से बनीं
  • कौशिकी (अम्बिका)
  • लक्ष्मी
  • सती, अगले जन्म में
पूरी कथा पढ़िए — कोश से निकली देवी

"कौशिकी" का सीधा अर्थ है "कोश से जन्मी"। देवी माहात्म्य में यह उनका जन्म-नाम है; "अम्बिका" (माँ) उनका दूसरा।

ध्यान देने की बात: यह देवी पार्वती से निकली ज़रूर, पर उनकी "बेटी" नहीं कहलातीं — वे पार्वती का ही उजला रूप हैं, अलग हुई हुई।

इसी अध्याय में देवी दो हो जाती हैं और फिर आगे और बँटती हैं — काली, चामुंडा, सप्त मातृका — और आठवें अध्याय ("मैं अकेली हूँ") में सब वापस एक हो जाती हैं।

ऐसा क्यों?

पार्वती के कोश से कौशिकी के निकलते ही पार्वती ख़ुद काली क्यों पड़ गईं?

  • क्योंकि उन्हें शुम्भ पर क्रोध आया
  • क्योंकि शिव ने उन्हें शाप दिया
  • क्योंकि उनकी देह से उजला रूप अलग होकर कौशिकी बन गया
  • क्योंकि उन्होंने गंगा का काला जल पी लिया
पूरी कथा पढ़िए — उजाला एक तरफ़, अँधेरा दूसरी तरफ़

देवी माहात्म्य में पार्वती एक बार "कृष्णा" (काली) कहलाती हैं क्योंकि उनका गौर (उजला) अंश कौशिकी में चला गया।

आगे की परंपरा इसे उलट भी देती है: कुछ कथाओं में पार्वती तप करके अपना काला रंग उतारती हैं और "गौरी" बन जाती हैं, और उतरा हुआ काला रंग कौशिकी बन जाता है।

दोनों रूपों का मतलब एक है: एक ही देवी में उजाला और अँधेरा, सौम्य और उग्र — दोनों हैं, और वे अलग होकर दो देह ले सकते हैं।

पहेली

पहले मैं एक थी — शिव की पत्नी, पर्वत की बेटी। एक सवाल पूछते ही मैं दो हो गई: एक उजली, स्वतंत्र, जो लड़ने निकली; और एक काली, उग्र, जो पीछे रह गई। और ग्रंथ कहता है, दोनों मैं ही हूँ। मैं कौन हूँ?

  • लक्ष्मी
  • सरस्वती
  • दुर्गा, महिष वाली
  • पार्वती
पूरी कथा पढ़िए — एक से दो, और फिर भी एक

यह पहेली देवी-चरित के केंद्रीय सवाल को एक कथा में बाँध देती है: क्या देवी एक हैं या अनेक?

यहाँ जवाब दोनों है: पार्वती सचमुच दो देह ले लेती हैं — कौशिकी और काली — और देवी माहात्म्य फिर भी कहता है कि वे एक ही की परतें हैं।

आगे अध्याय ८ में यह पूरा खुलेगा, जब शुम्भ ताना मारेगा कि देवी "दूसरों की मदद से लड़ती हैं", और देवी सब रूपों को अपने में समेटकर कहेंगी — "देखो, मैं अकेली हूँ।"

किसने कहा?

"तीनों लोकों के सारे रत्न आपके पास हैं। यह स्त्री सबसे सुंदर है — यह भी आपके पास होनी चाहिए।" — यह किसने, किससे कहा?

  • धूम्रलोचन ने, शुम्भ से
  • निशुम्भ ने, शुम्भ से
  • शुम्भ ने, अपने दूत से
  • चंड और मुंड ने, शुम्भ से
पूरी कथा पढ़िए — दो सेवक, जिनसे एक नाम बना

चंड और मुंड शुम्भ के सेवक हैं, और वही कौशिकी की ओर शुम्भ का ध्यान खींचते हैं — जैसे रत्नों की सूची में एक और नाम जोड़ रहे हों।

आगे इन्हीं दोनों को शुम्भ कौशिकी को पकड़ने भेजेगा, और काली उन दोनों का सिर काटकर लाएगी — तभी उनका नाम "चामुंडा" बनेगा (चंड + मुंड)।

यानी जिन दो ने कौशिकी को "रत्न" कहकर शुरू किया, उन्हीं के नाम से देवी का सबसे उग्र रूप पहचाना जाएगा।

ग्रंथ असहमत

पार्वती से कौशिकी और काली का अलग होना — यह जन्म-कथा कहाँ की है, और इसका शैव-शाक्त पहलू क्या है?

  • यह ऋग्वेद में है
  • यह देवी माहात्म्य की है; इसमें उग्र, स्वतंत्र देवी पार्वती से
  • सभी ग्रंथ कहते हैं कौशिकी पार्वती से बड़ी और अलग देवी हैं
  • यह कथा सिर्फ़ बंगाल की है, संस्कृत में नहीं
पूरी कथा पढ़िए — किससे निकली, यह भी एक दावा है

देवी माहात्म्य कौशिकी को पार्वती से निकालता है — यह एक तरह से शैव परंपरा से जोड़ता है, फिर भी देवी को सबसे ऊपर रखता है।

देवी भागवत जैसे कट्टर शाक्त ग्रंथ इसे उलट देते हैं: वहाँ पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती — सब आदि-शक्ति के रूप हैं, और आदि-शक्ति किसी से नहीं निकलतीं।

देवी-चरित दोनों दर्ज करती है, क्योंकि "देवी किससे निकली" का जवाब ही बताता है कि कौन-सी परंपरा बोल रही है।

सही क्रम

घटनाओं का सही क्रम कौन-सा है?

  • देवताओं का गीत → शुम्भ-निशुम्भ की जीत → कौशिकी का निकलना → धूम्रलोचन → कौशिकी का व्रत
  • शुम्भ-निशुम्भ की देवताओं पर जीत → देवताओं का हिमालय जाकर "या देवी…" गाना → पार्वती का आना और पूछना → कोश से कौशिकी का निकलना और पार्वती का काली पड़ना → चंड-मुंड का शुम्भ को बताना और दूत का प्रस्ताव → कौशिकी का "पहले मुझे हराओ" वाला व्रत → शुम्भ का धूम्रलोचन को भेजना
  • कौशिकी का निकलना → देवताओं का गीत → शुम्भ की जीत → धूम्रलोचन
  • धूम्रलोचन का भेजा जाना → कौशिकी का व्रत → चंड-मुंड → पार्वती का आना
पूरी कथा पढ़िए — हार, गीत, बँटवारा, चुनौती

इस अध्याय की बनावट महिष वाले अध्याय की तरह शुरू होती है — देवता हारते हैं — पर मोड़ अलग है: इस बार देवी बनाई नहीं जातीं, बुलाई जाती हैं, और वे एक से दो हो जाती हैं।

बीच का मोड़ पार्वती का सवाल है — "तुम किसकी स्तुति कर रहे हो?" — जिसके जवाब में वे ख़ुद ही बँट जाती हैं।

अध्याय धूम्रलोचन के चलने पर ख़त्म होता है, युद्ध पर नहीं — क्योंकि युद्ध अगले अध्याय (चामुंडा) में है।

बाद की परंपरा

"या देवी सर्वभूतेषु… नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः" — यह पंक्ति आज कहाँ सबसे ज़्यादा सुनाई देती है?

  • दुर्गा पूजा और नवरात्रि में
  • सिर्फ़ विवाह-मंत्रों में
  • सिर्फ़ अंत्येष्टि में
  • सिर्फ़ दक्षिण भारत के मंदिरों में
पूरी कथा पढ़िए — एक स्तुति, जो सबसे ज़्यादा गाई जाती है

इस सूक्त की हर पंक्ति एक ही ढाँचे की है: "जो देवी हर जीव में [शक्ति / बुद्धि / नींद / भूख / छाया / दया / भ्रम] के रूप में रहती हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार।"

यानी यह देवी को किसी एक काम की देवी नहीं मानता — वे हर जीव के भीतर की हर चीज़ हैं, अच्छी और बुरी दोनों (भ्रम और भूल भी उन्हीं का रूप हैं)।

यह अध्याय १ के ऋग्वेद वाले "मैं ही हूँ" का ही दूसरा रूप है — बस अब "मैं" की जगह "जो देवी… उन्हें नमस्कार"।