
अध्याय १३
लक्ष्मी और सरस्वती
लक्ष्मी और सरस्वती की स्वतंत्र पहचान
श्री, जो माँगी जाती थी
ऋग्वेद के खिल (परिशिष्ट) "श्री सूक्त" में श्री से सीधे समृद्धि, पशु, अन्न और संतान माँगी जाती है; विष्णु के साथ उनका बाद का वैष्णव दांपत्य यहाँ कथा का विषय नहीं है। और साँची जैसे प्रारंभिक बौद्ध स्मारकों पर कमल और हाथियों से घिरी स्त्री की छवियाँ मिलती हैं।
कुछ विद्वान उन्हें गजलक्ष्मी मानते हैं, जबकि कुछ उसी आकृति को बुद्ध की माता माया से जोड़ते हैं। इससे इतना साफ़ है कि हाथी, जल, कमल और शुभ देवी-आकृति का यह प्रतीक बहुत पुराना है — लक्ष्मी-विष्णु की बाद की मानक संयुक्त मूर्ति-परंपरा से भी पुराना।
मंथन में लक्ष्मी
समुद्र-मंथन में लक्ष्मी प्रकट हुईं। वहाँ उन्होंने उपस्थित देवताओं और अन्य शक्तियों को देखा, और अंत में विष्णु को अपना पति चुना — उन्हें माला पहनाई।
बाद की परंपरा में यह "पत्नी" का ढाँचा बन गया। शाक्त व्याख्या इस प्रसंग पर अलग बल देती है: लक्ष्मी समुद्र से स्वतंत्र देवी के रूप में प्रकट हुईं और उन्होंने विष्णु को चुना।
यहाँ चुनाव उनका है।
लक्ष्मी की परछाईं
कुछ पुराण-कथाओं में मंथन से लक्ष्मी से पहले एक और देवी निकलती हैं — ज्येष्ठा, जिन्हें अलक्ष्मी से जोड़ा जाता है। वे "बड़ी" बहन हैं।
वह दुर्भाग्य की देवी है — जहाँ आलस्य, कलह, गंदगी, वहाँ वह। लक्ष्मी घर में तभी टिकती हैं जब अलक्ष्मी बाहर हो।
इस रूप में ज्येष्ठा की तुलना महाविद्याओं की धूमावती (अध्याय १०) से की जा सकती है: अगर देवी समस्त अनुभवों को समेटती हैं, तो उनमें शुभता के साथ अभाव और अशुभता की संभावना भी आती है। यह एक व्याख्यात्मक समानता है; दोनों देवियाँ हर परंपरा में एक नहीं मानी जातीं।
सरस्वती और वाक्
सरस्वती की सबसे पुरानी पहचान "ब्रह्मा की पत्नी" नहीं। वैदिक साहित्य में सरस्वती पहले नदी और प्रेरणा से जुड़ी देवी हैं।
आगे की परंपरा में वे वाणी, विद्या, संगीत और कलाओं की अधिष्ठात्री बनीं तथा वाक् से उनकी पहचान गहरी होती गई। लेकिन ऋग्वेद १०.१२५ की वक्ता को सीधे सरस्वती कहना ठीक नहीं होगा।
उस सूक्त की ऋषिका और वक्ता वाक् अम्भृणी हैं। सरस्वती और वाक् का स्पष्ट मेल बाद की वैदिक और पौराणिक परंपराओं में विकसित हुआ।
सरस्वती और ब्रह्मा
लेकिन एक कथा इस तस्वीर को थोड़ा उलझा देती है। कई पुराण-कथाओं में ब्रह्मा की बनाई एक स्त्री की कथा आती है, जिसे अलग-अलग परंपराएँ शतरूपा, सावित्री या सरस्वती से जोड़ती हैं।
ब्रह्मा उस पर मोहित होते हैं; वह दिशा बदलती है, और उसे देखते रहने के लिए ब्रह्मा के अतिरिक्त मुख प्रकट होते हैं। इसे सरस्वती की एकमात्र या सबसे पुरानी कथा नहीं समझना चाहिए।
पर इस कथा में सरस्वती को केवल "ब्रह्मा की पत्नी" कह देना बात को बहुत सरल कर देता है।
महासरस्वती
देवी माहात्म्य का दावा और भी सीधा है। सप्तशती के तीन चरितों की तीन अधिष्ठात्री देवियाँ हैं: प्रथम चरित (मधु-कैटभ) की महाकाली; मध्यम चरित (महिष) की महालक्ष्मी; उत्तम चरित (शुम्भ-निशुम्भ) की महासरस्वती।
इस अनुष्ठानिक विभाजन में महिष-वध वाले चरित की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी और शुम्भ-निशुम्भ वाले चरित की अधिष्ठात्री महासरस्वती मानी जाती हैं। यहाँ ये नाम केवल विष्णु या ब्रह्मा की सहचरी के अर्थ में नहीं आते; वे सर्वोच्च देवी के व्यापक रूपों को व्यक्त करते हैं।
यह शाक्त पाठ-परंपरा का अपना धार्मिक ढाँचा है।
टिप्पणी: श्री सूक्त ऋग्वेद का खिल (परिशिष्ट) है और श्री/लक्ष्मी के सबसे पुराने स्वतंत्र संदर्भों में है। साँची की "स्त्री और हाथी" वाली छवि की पहचान विद्वानों में विवादित है — कुछ इसे गजलक्ष्मी, कुछ माया मानते हैं। ब्रह्मा के अतिरिक्त सिर और अपनी ही सृष्ट स्त्री पर उनके मोहित होने की कथा अलग पुराणों में अलग नामों और रूपों से मिलती है — कहीं स्त्री शतरूपा है, कहीं सावित्री या सरस्वती से जोड़ी जाती है। शिव द्वारा ब्रह्मा का पाँचवाँ सिर काटने की कथा भी अलग पौराणिक परंपराओं में अलग कारणों से कही गई है। इन्हें एक ही तयशुदा रूप नहीं समझना चाहिए। लक्ष्मी और सरस्वती की स्वतंत्र पहचान को शाक्त परंपरा दोनों को महादेवी के रूप मानकर जोड़ती है।
स्रोत: कई ग्रंथों से, लक्ष्मी और सरस्वती