अध्याय ११

ललिता और भण्डासुर

राख से असुर, अग्नि से देवी

राख से भण्डासुर

शिव के तीसरे नेत्र ने कामदेव को जलाकर राख कर दिया था। उस राख से शिव के एक गण ने एक आकृति बनाई। शिव की नज़र पड़ी — आकृति जीवित हो गई, एक बलशाली पुरुष।

चित्रकर्मा ने उसे शतरुद्रीय मंत्र का उपदेश दिया और तप करने को कहा। तप पूरा होने पर शिव प्रकट हुए।

उसने वर माँगा: युद्ध में जो भी उसके सामने आए, उसकी आधी शक्ति उसमें आ जाए और शत्रुओं के अस्त्र उसे बाँध न सकें। शिव ने वर दे दिया और उसे साठ हज़ार वर्ष शासन करने का आशीर्वाद भी दिया।

यह देखकर ब्रह्मा के मुँह से "भण्ड" निकला — धिक्कार के अर्थ में — और उसी से उसका नाम पड़ा। भण्ड ने शून्यक नगर बसाया और तीनों लोकों को अपने प्रभाव में ले लिया।

यज्ञ से ललिता

महाशम्भु के निर्देश पर देवताओं ने एक महायज्ञ किया और अंत में स्वयं को भी उसकी अग्नि में अर्पित कर दिया। उस चिदग्नि से एक देवी प्रकट हुईं — लाल वर्ण, चार भुजाएँ।

हाथों में गन्ने का धनुष, फूलों के बाण, पाश और अंकुश। वे ललिता त्रिपुर सुंदरी थीं — परम सुंदरी।

वे कामेश्वर (शिव के एक रूप) से ब्याही गईं और श्रीपुर से राज किया।

श्रीचक्र का रथ

ललिता युद्ध के लिए चक्रराज रथ पर निकलीं, जिसे श्रीचक्रराज रथ भी कहा जाता है। उसका विन्यास श्रीचक्र से जुड़ा था — नौ त्रिकोणों और मध्य-बिंदु वाली वह ज्यामितीय रचना जो श्रीविद्या परंपरा के केंद्र में है।

उनके साथ उनकी शक्तियाँ थीं: सेनापति दंडनाथा, यानी वाराही; मंत्री मंत्रिणी, यानी श्यामला।

सामने भण्ड की सेना, और उसके भाई विशुक्र और विशंग।

मुस्कान से गणेश

विशुक्र ने एक यंत्र रचा — जयविघ्न यंत्र — जिससे ललिता की सेना में फूट और आलस्य फैलने लगा। ललिता बस मुस्कुराईं।

उस मुस्कान से गणेश प्रकट हुए, जिन्होंने वह विघ्न-यंत्र तोड़ डाला। यहाँ गणेश शिव-पार्वती के पुत्र नहीं — देवी की मुस्कान से जन्मे विघ्नहर्ता।

शिव-महिमा में वे पार्वती के उबटन से बनते हैं; यहाँ एक मुस्कान से।

नाख़ूनों से दस अवतार

भण्ड ने अपनी माया से मधु-कैटभ, रक्तबीज और दूसरे पुराने असुरों जैसे रूप फिर खड़े किए। ललिता से प्रकट हुईं दुर्गा और दूसरी शक्तियों ने उनका संहार किया।

फिर भण्ड ने सोमक और दूसरे असुर उत्पन्न किए। उनके उत्तर में ललिता के हाथों के नाख़ूनों से विष्णु के दस अवतार प्रकट हुए — मत्स्य से कल्कि तक — और उन्होंने उन असुरों को परास्त किया।

काम लौटा

आख़िर में ललिता ने एक अस्त्र चलाया — महाकामेश्वरास्त्र। भण्डासुर और उसका शहर, दोनों एक साथ राख हो गए।

फिर देवताओं ने विनती की: संसार बिना प्रेम के अधूरा है। ललिता ने कामदेव को फिर जीवित किया।

रति को उसका पति लौटा, और संसार में रस लौट आया। जिस देवी के हाथों में गन्ने का धनुष और फूलों के बाण थे — यानी काम के ही चिह्न — उन्होंने शिव के तीसरे नेत्र से भस्म हुए कामदेव को जीवन लौटाया।

टिप्पणी: यह कथा ब्रह्माण्ड पुराण में सम्मिलित ललितोपाख्यान में आती है। यह देवी माहात्म्य और देवी भागवत की कथा-धारा से अलग श्रीविद्या परंपरा का बड़ा स्रोत है। इस कथा में भण्डासुर को वर शिव देते हैं; ब्रह्मा के उच्चारण से उसका नाम पड़ता है और उसकी नगरी का नाम शून्यक है। ललिता को दस महाविद्याओं में षोडशी और भुवनेश्वरी से जोड़ा जाता है। श्रीविद्या एक जटिल तांत्रिक उपासना है जो दक्षिण भारत में आज भी जीवित है। मंत्रिणी (श्यामला) मंत्री हैं और दंडनाथा (वाराही) सेनापति — यह जोड़ी ललिता सहस्रनाम में भी आती है। महाकामेश्वरास्त्र मूल पाठ में है।

स्रोत: कई ग्रंथों से, ललिता और भण्डासुर

अब बताइए — कितना याद रहा?

किसका बेटा?

भण्डासुर किस चीज़ से बना, और उसका नाम कैसे पड़ा?

  • हिरण्यकशिपु के वंश से; नाम पिता से
  • महिष की राख से; नाम "महिष-भण्ड" से
  • यज्ञ की आग से; नाम अग्नि से
  • कामदेव की राख से (जो शिव के तीसरे नेत्र से जला); नाम ब्रह्मा के "भण्ड! भण्ड!" (वाह-वाह) से
पूरी कथा पढ़िए — जले हुए प्रेम से बना असुर

भण्डासुर की पूरी पहचान इसी में है: वह "जले हुए काम" से बना है, इसलिए उसके राज में प्रेम और रस सूख जाते हैं।

यह शिव-महिमा के अध्याय ५ से सीधा जुड़ता है — जहाँ कामदेव जला था। वहाँ कथा शिव की थी; यहाँ उसी राख से उठा असुर देवी की कथा बन जाता है।

"भण्ड" का अर्थ है "वाह" या "शाबाश" — ब्रह्मा के मुँह से निकला एक शब्द, जो असुर का नाम बन गया। जैसे शिव-महिमा में "हनुमान" ठुड्डी से, या "रावण" चीख़ से।

क्या हुआ?

देवताओं के महायज्ञ से क्या हुआ?

  • यज्ञ की आग से ललिता त्रिपुर सुंदरी उठीं
  • यज्ञ से दुर्गा उठीं, सिंह पर
  • यज्ञ से कामदेव फिर जीवित हो गए
  • यज्ञ असफल रहा और देवता निराश लौटे
पूरी कथा पढ़िए — आग से उठी सुंदरता

ललिता का जन्म देवी-चरित की बाक़ी देवियों से अलग है: दुर्गा क्रोध से, कौशिकी कोश से, काली माथे से — ललिता एक यज्ञ की आग से।

और उनका रूप भी अलग है: उग्र नहीं, लाल और सुंदर; हथियार भी नरम — गन्ना, फूल, पाश, अंकुश।

यह श्रीविद्या परंपरा का अपना धर्मशास्त्र है: सर्वोच्च शक्ति संहार नहीं, सौंदर्य और इच्छा है — पर वही इच्छा एक अस्त्र भी है।

कौन हूँ मैं?

मैं एक ज्यामितीय आकृति हूँ — नौ त्रिकोणों का जाल, बीच में एक बिंदु। तंत्र में मैं ललिता की पूजा का यंत्र हूँ। पर भण्डासुर के युद्ध में मैं एक रथ बन गई, जिस पर ललिता सवार हुईं। मैं कौन हूँ?

  • स्वस्तिक
  • श्री चक्र (श्री यंत्र)
  • सुदर्शन चक्र
पूरी कथा पढ़िए — यंत्र, जो रथ बना

श्री चक्र श्रीविद्या परंपरा का केंद्र है — ललिता की पूजा इसी ज्यामिति के ज़रिये होती है, मूर्ति से ज़्यादा।

ललितोपाख्यान में यह यंत्र एक विशाल रथ बन जाता है — यानी जिस आकृति में देवी बसती हैं, वही उनका वाहन भी है।

यह देवी माहात्म्य के सिंह से अलग है: दुर्गा का वाहन एक पशु है, ललिता का वाहन एक ज्यामिति।

किसने कहा?

"संसार बिना प्रेम के अधूरा है।" — भण्डासुर के मरने के बाद यह विनती किसने की, और ललिता ने क्या किया?

  • भण्डासुर ने, मरते हुए
  • देवताओं ने, ललिता से
  • रति ने, शिव से
  • नारद ने, ब्रह्मा से
पूरी कथा पढ़िए — मारकर नहीं, लौटाकर

यह ललिता की कथा का सबसे बड़ा मोड़ है: भण्ड "जले हुए काम" से बना था, और ललिता का हथियार भी काम ही है — गन्ने का धनुष।

पर वे काम को ख़त्म नहीं करतीं। वे भण्ड को मारकर, फिर काम को लौटाकर संतुलन बनाती हैं।

श्रीविद्या का यही सार है: इच्छा को दबाना नहीं, उसे सही दिशा देना। ललिता "कामेश्वरी" हैं — इच्छा की स्वामिनी, इच्छा की शत्रु नहीं।

तथ्य

भण्डासुर के जयविघ्न यंत्र (फूट और आलस्य फैलाने वाले) को किसने तोड़ा, और वह कैसे प्रकट हुआ?

  • वाराही ने, सेनापति के रूप में
  • विष्णु के दस अवतारों ने
  • गणेश ने
  • कामदेव ने, फिर जीवित होकर
पूरी कथा पढ़िए — मुस्कान से जन्मा विघ्नहर्ता

यह गणेश की एक कम जानी जाने वाली जन्म-कथा है: शिव-महिमा में वे पार्वती के उबटन से बने; यहाँ ललिता की मुस्कान से।

इसका मतलब यही है कि "विघ्न हटाना" एक शक्ति है जो देवी के भीतर से ही आती है — मुस्कान से, यानी बिना क्रोध, बिना हथियार।

श्रीविद्या परंपरा में गणेश और ललिता का यह रिश्ता ख़ास है, और कई ललिता-मंदिरों में गणेश की अलग पूजा होती है।

पहेली

मैं एक यज्ञ की आग से उठी। मेरा रंग लाल है, मेरा धनुष गन्ने का, मेरे बाण फूल के। मैं जिस असुर से लड़ी वह "जले हुए प्रेम" से बना था — और जीतकर मैंने प्रेम को फिर ज़िंदा किया। मैं कौन हूँ?

  • दुर्गा
  • काली
  • सरस्वती
  • ललिता त्रिपुर सुंदरी (कामेश्वरी)
पूरी कथा पढ़िए — इच्छा, जो हथियार भी है

ललिता का हर चिह्न कामदेव जैसा है — गन्ने का धनुष, फूल के बाण। फ़र्क़ यह है कि कामदेव इनसे मन में इच्छा जगाता था; ललिता इनसे युद्ध जीतती हैं।

यह श्रीविद्या का केंद्रीय विचार है: वही इच्छा जो बाँधती है, वही मुक्त भी कर सकती है — फ़र्क़ दिशा का है।

इसीलिए ललिता को "त्रिपुर सुंदरी" कहते हैं — तीनों लोकों की सुंदरता — और वे महाविद्याओं में भी हैं (अध्याय १०, षोडशी)।

सही क्रम

घटनाओं का सही क्रम कौन-सा है?

  • यज्ञ से ललिता → कामदेव का जलना → भण्ड का जन्म → भण्ड-वध
  • भण्ड-वध → यज्ञ → ललिता → श्री चक्र रथ
  • ललिता का काम को जिलाना → भण्ड-वध → गणेश → नाख़ूनों से दस अवतार
  • कामदेव का शिव के तीसरे नेत्र से जलना → राख से भण्ड का बनना और वरदान → संसार से प्रेम का सूखना → देवताओं का महायज्ञ और यज्ञ से ललिता का उठना → श्री चक्र रथ पर युद्ध → मुस्कान से गणेश का विघ्न-यंत्र तोड़ना → नाख़ूनों से दस अवतार → कामेश्वर-अस्त्र से भण्ड-वध → ललिता का कामदेव को फिर जिलाना
पूरी कथा पढ़िए — राख से रस तक

इस अध्याय की बनावट एक चक्र है: कामदेव जलता है (शुरू), और कामदेव फिर जीवित होता है (अंत)।

बीच में एक असुर है जो "प्रेम की अनुपस्थिति" है, और एक देवी है जो "प्रेम की स्वामिनी" है।

इसीलिए यह अध्याय देवी माहात्म्य वाले अध्यायों से अलग महसूस होता है: वहाँ जीत संहार से आती है, यहाँ संतुलन से।

ग्रंथ असहमत

ललिता और भण्डासुर की कथा कहाँ की है, और यह देवी माहात्म्य से कैसे अलग परंपरा है?

  • यह देवी माहात्म्य के बारहवें अध्याय की है
  • यह ब्रह्माण्ड पुराण के "ललितोपाख्यान" की है, और श्रीविद्या (श्रीकुल) नामक अलग शाक्त तांत्रिक धारा की
  • यह बंगाल की काली-परंपरा की है
  • यह ऋग्वेद की है
पूरी कथा पढ़िए — दो शाक्त धर्मशास्त्र, साथ-साथ

देवी माहात्म्य की देवी युद्ध की है — दुर्गा, काली, चामुंडा। ललिता की परंपरा (श्रीविद्या) सौंदर्य और यंत्र की है — श्री चक्र, ललिता सहस्रनाम।

दोनों "एक महादेवी, अनेक रूप" मानती हैं, पर आगे अलग-अलग रूप रखती हैं: एक दुर्गा को, दूसरी ललिता को।

देवी-चरित दोनों को एक ही गाथा में रखती है — यह दिखाने कि शाक्त परंपरा ख़ुद एक नहीं, कई धाराओं की है।

बाद की परंपरा

ललिता की पूजा से जुड़े तीन सबसे बड़े तत्व कौन-से हैं?

  • सिंह, त्रिशूल, और भैंसा
  • वीणा, हंस, और पुस्तक
  • श्री चक्र (यंत्र), ललिता सहस्रनाम (हज़ार नाम), और कांची की कामाक्षी (दक्षिण का सबसे बड़ा ललिता-स्थल)
  • कमल, उल्लू, और सोने के सिक्के
पूरी कथा पढ़िए — यंत्र, नाम, और एक मंदिर

ललिता की पूजा मूर्ति-केंद्रित नहीं — श्री चक्र-केंद्रित है। साधक यंत्र की ज्यामिति में देवी को स्थापित करता है।

"ललिता सहस्रनाम" — देवी के हज़ार नाम — शाक्त परंपरा का सबसे पढ़ा जाने वाला स्तोत्र है, और यह ब्रह्माण्ड पुराण में ही है।

कांचीपुरम की कामाक्षी को ललिता का ही रूप माना जाता है, और शंकराचार्य की परंपरा से इसका गहरा नाता है — यानी श्रीविद्या सिर्फ़ तंत्र नहीं, मुख्यधारा वेदांत से भी जुड़ी।

कौन हूँ मैं?

मैं शिव-महिमा में शिव के उबटन से नहीं, यहाँ ललिता की मुस्कान से जन्मा। मेरा काम एक ही है — विघ्न हटाना। मैं कौन हूँ?

  • गणेश
  • कार्तिकेय
  • वीरभद्र
  • हनुमान
पूरी कथा पढ़िए — एक देवता, कई जन्म

गणेश की जन्म-कथाएँ कई हैं: शिव-महिमा में पार्वती के उबटन से; ब्रह्मवैवर्त में शनि की दृष्टि से; और यहाँ ललिता की मुस्कान से।

हर कथा में नतीजा एक है — विघ्न हटाने वाला देवता — पर स्रोत अलग: कभी पार्वती, कभी ललिता, यानी हमेशा देवी।

यह "एक या अनेक" वाला सवाल गणेश पर भी लागू है: वे शिव-पार्वती के पुत्र हैं, या देवी की शक्ति का एक रूप? परंपरा दोनों कहती है।