
अध्याय २
महामाया
विष्णु की योगनिद्रा
सोए हुए विष्णु
राजा सुरथ अपना राज्य हार चुके थे, और वैश्य समाधि को उनके अपने घरवालों ने निकाल दिया था। दोनों एक ऋषि — मेधा — के आश्रम पहुँचे। उन्होंने पूछा: हम जिन्होंने हमें ठुकराया, उन्हीं के लिए मोह क्यों नहीं जाता?
ऋषि ने कहा — यह महामाया है। और फिर उन्होंने पहली कथा सुनाई। एक कल्प के अंत में, जब सब कुछ जल था, विष्णु शेषनाग की कुंडली पर लेटे थे।
यह साधारण नींद नहीं थी। यह योगनिद्रा थी — एक ऐसी नींद जिसने उनकी आँखों, साँस और देह, सबको अपने वश में कर रखा था।
विष्णु की नाभि से एक कमल उठा था। उस कमल पर ब्रह्मा बैठे थे — अकेले, उस जलमय अँधेरे में।
मधु और कैटभ
उसी समय विष्णु के कान के मैल से दो आकृतियाँ उठीं — मधु और कैटभ, अपनी ही ताक़त के नशे में। दोनों ने कमल पर बैठे ब्रह्मा को देखा और उनकी ओर बढ़े — उन्हें मार डालने के लिए।
ब्रह्मा के पास न हथियार था, न भागने की जगह।
नीचे सिर्फ़ जल था, और पास सिर्फ़ एक सोया हुआ देवता।
ब्रह्मा ने योगनिद्रा की स्तुति की
ब्रह्मा ने विष्णु को झकझोरा नहीं। उन्होंने उस नींद की स्तुति शुरू की — उस शक्ति की, जो विष्णु पर छाई थी।
"तुम ही श्री हो, तुम ही बोधशक्ति हो," ब्रह्मा बोले। "तुम इस पूरे संसार को धारण करती हो।"
"बुद्धिमानों की बुद्धि को भी तुम भ्रम में खींच लेती हो।"
"अब हटो — विष्णु की देह से बाहर आओ, ताकि वे जागें और इन दोनों से लड़ें।" यह देवी माहात्म्य की सबसे पहली स्तुति है, और यह विष्णु से नहीं, विष्णु की नींद से की गई है।
देवी बाहर आईं
महामाया विष्णु की आँखों, मुँह, नासिका, भुजाओं और हृदय से बाहर निकलीं, और आकाश में चली गईं।
विष्णु की आँखें खुलीं।
उन्होंने कमल के पास खड़े मधु और कैटभ को देखा, और उनसे भिड़ गए।
वरदान की भूल
विष्णु उन दोनों असुरों से पाँच हज़ार बरस लड़ते रहे — बराबरी पर, बिना किसी नतीजे के। तब महामाया ने असुरों की बुद्धि मोहित कर दी।
अपने बल के घमंड में दोनों ने विष्णु से कहा: "तुम अच्छा लड़ते हो।"
"माँगो — जो चाहो।" विष्णु ने कहा: "तो यही वर दो कि तुम मेरे हाथों मारे जाओ।" तब जाकर वे चौंके।
पर वरदान दे चुके थे।
जहाँ जल नहीं
असुर चालाक थे। "ठीक है — पर वहाँ मारो जहाँ ज़मीन जल से ढकी न हो।" चारों ओर सिर्फ़ जल था।
विष्णु ने अपनी जाँघें फैलाईं — सूखी, विशाल — और दोनों के सिर उन पर रखकर चक्र से काट दिए। देवी माहात्म्य की कथा यहीं समाप्त होती है।
देवी भागवत के एक अन्य रूप में आगे कहा गया है कि दोनों असुरों की मेदा जल में फैल गई और उससे धरती बनी। इसीलिए धरती का एक नाम "मेदिनी" पड़ा।
पूरी कथा में विष्णु ने बल लगाया, पर जीत का मोड़ महामाया ने दिया। मेधा ऋषि इसी से अपनी बात समझाते हैं: जो नींद थी, वह माया थी; जो माया थी, वह शक्ति थी; और वही शक्ति संसार को मोह में बाँधे रखती है — सुरथ को, समाधि को, और विष्णु को भी।
टिप्पणी: यह कथा देवी माहात्म्य के प्रथम चरित्र में है — मार्कण्डेय पुराण में। इससे पहले ग्रंथ की बाहरी कथा-भूमिका आती है: राजा सुरथ और वैश्य समाधि को महामाया समझाने के लिए ऋषि मेधा सबसे पहले यही कथा सुनाते हैं। यहाँ महामाया योगनिद्रा के रूप में विष्णु पर स्थित स्वतंत्र देवी-शक्ति हैं; ब्रह्मा उन्हीं की स्तुति करते हैं ताकि विष्णु जागें और मधु-कैटभ मारे जाएँ। देवी माहात्म्य में कथा दोनों के सिर काटे जाने पर समाप्त होती है। उनकी मेदा से धरती बनने वाला विवरण देवी भागवत में मिलता है। मधु-कैटभ का प्रसंग अन्य पुराणों में भी अलग-अलग ढंग से आता है।
स्रोत: कई ग्रंथों से, महामाया