
अध्याय ४
महिषासुर-मर्दिनी
महिषासुर का अंत
सेनापति एक-एक गिरे
अट्टहास सुनकर महिष ने अपने सेनापति भेजे — चिक्षुर, चामर, उदग्र, बाष्कल, और हज़ारों सैनिक। देवी का सिंह असुर सेना पर टूट पड़ा, और देवी की तेज़ साँसों से सैकड़ों-हज़ारों योद्धा उत्पन्न होकर लड़ने लगे।
सेनापति एक-एक कर गिरते गए।
महिष के दरबार में लगातार उनकी हार की ख़बर पहुँचती रही।
महिष अपने असली रूप में आया
तब महिषासुर ख़ुद युद्ध में आया — विशाल भैंसे के रूप में। उसने सींगों से पर्वत उछाले, पूँछ से ज़मीन पीटी, खुरों से पहाड़ रौंदे।
उसकी साँस से बादल बिखर गए।
देवी ने पाश फेंका और उसे बाँध लिया।
रूप बदलता महिष
फंदे में बँधते ही महिष ने एक के बाद एक रूप बदलने शुरू किए। पहले उसने भैंसे का रूप छोड़ा और सिंह बन गया।
देवी ने उस सिंह का सिर काट दिया — तो वह हाथ में तलवार लिए एक आदमी बन गया। देवी ने बाणों की झड़ी लगाई — तो वह विशाल हाथी बन गया और सूँड से देवी के सिंह को खींचने लगा।
देवी ने सूँड काट दी।
हर रूप में वह बचना चाहता था, और हर रूप देवी काटती गईं।
वापस भैंसा
आख़िर में महिष फिर भैंसा बन गया और तीनों लोकों को हिला दिया। तब देवी ने वह दिव्य पेय पिया जो उन्हें मिला था — बार-बार — और उनकी आँखें लाल हो गईं।
हँसते हुए उन्होंने कहा: "गरज ले, मूर्ख, जब तक मैं यह पेय पी रही हूँ।"
"तेरे मरने पर देवता गरजेंगे।"
पैर, त्रिशूल, तलवार
देवी उछलकर भैंसे पर चढ़ गईं। एक पैर उसकी गरदन पर रखा, और त्रिशूल उसमें उतार दिया।
महिष ने आख़िरी कोशिश की — भैंसे के मुँह से अपना असली रूप आधा बाहर निकालने लगा। ठीक उसी पल — जब वह न पूरा भैंसा था, न पूरा असुर — देवी ने अपनी तलवार से उसका सिर काट दिया।
सौ बरस से चला आ रहा युद्ध एक पल में ख़त्म।
फूलों की वर्षा
देवता आकाश से फूल बरसाने लगे। इंद्र और बाक़ी देवताओं ने देवी की स्तुति की — कि वे ही दुर्गा हैं, वे ही श्री, वे ही बुद्धि, वे ही सब कुछ।
देवी ने कहा: "जब भी संसार पर संकट आएगा, और तुम मुझे याद करोगे, मैं आ जाऊँगी।" और वे अंतर्धान हो गईं — स्वर्ग में देवताओं के साथ बैठने नहीं।
वे एक वचन बनकर रह गईं, जिसे ज़रूरत पड़ने पर पुकारा जा सके।
टिप्पणी: यह कथा देवी माहात्म्य के मध्यम चरित (अध्याय २-४) में है। महिष का बार-बार रूप बदलना — भैंसा, सिंह, तलवार लिए आदमी, हाथी, फिर भैंसा — पाठ में विस्तार से है; देवी का हर रूप के लिए अलग जवाब भी। "मदिरा" वाला प्रसंग मूल पाठ में है। देवी माहात्म्य ने महिषासुर-मर्दिनी की इस कथा को उसका सबसे प्रभावशाली साहित्यिक रूप दिया; आगे की दुर्गा-प्रतिमा और कला में भैंसे पर विजय का यही दृश्य केंद्रीय बना।
स्रोत: कई ग्रंथों से, महिषासुर-मर्दिनी