
अध्याय ८
मैं अकेली हूँ
देवी का एकत्व
निशुम्भ का अंत
रक्तबीज के बाद निशुम्भ लड़ने आया। देवी ने उसके हथियार तोड़े, घायल किया, और आख़िर में त्रिशूल से गिरा दिया।
ख़ून बहने लगा। तभी निशुम्भ की देह से एक और आकृति आधी बाहर निकलने लगी — "रुको, रुको!" चिल्लाती हुई।
देवी हँस पड़ीं और उस आधे-निकले योद्धे का सिर काट दिया।
निशुम्भ वहीं गिर पड़ा।
शुम्भ का ताना
अपने भाई और सेना का अंत देखकर शुम्भ स्वयं आगे बढ़ा। उसने देवी को ललकारा — पर हथियार से नहीं, शब्द से: "तू घमंड में है, दुर्गा।"
"तू अकेले लड़ती ही नहीं — इन सब देवियों का सहारा लेकर लड़ती है।"
"फिर घमंड कैसा?"
"मैं अकेली हूँ"
देवी ने शांत होकर उत्तर दिया। "एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा — मैं ही अकेली हूँ इस संसार में, मेरे सिवा दूसरा कौन?"
"देख, दुष्ट — ये सब देवियाँ मेरी ही शक्तियाँ हैं। ये अब मुझमें लौट रही हैं।"
एक हो गईं
और उनके कहते ही युद्ध में प्रकट हुई ब्रह्माणी आदि सारी देवी-शक्तियाँ एक-एक कर देवी की देह में समा गईं।
मैदान में अब सिर्फ़ अम्बिका खड़ी थीं। अकेली।
"मैं यहाँ अपने कई रूपों में खड़ी थी, अपनी ही शक्ति से," देवी ने कहा। "वह शक्ति मैंने वापस समेट ली। अब लड़ — डटकर।"
आकाश में द्वंद्व
फिर शुम्भ और देवी का अकेला द्वंद्व शुरू हुआ। देवता, यक्ष, गंधर्व, सिद्ध — सब रुककर देखने लगे।
वे आकाश में लड़े, फिर धरती पर, फिर पर्वतों की चोटियों पर। हथियार से हथियार, फिर मुट्ठी से मुट्ठी।
शुम्भ बार-बार उठता, बार-बार गिरता।
शूल, और शांति
आख़िर में देवी ने अपना शूल शुम्भ की छाती के आर-पार कर दिया। वह गिरा — और उसके गिरते ही आकाश, धरती, समुद्र, सब शांत हो गए।
जो हवा रुकी थी, चलने लगी; जो आग बुझ गई थी, फिर जली। देवताओं ने देवी की स्तुति की — "नारायणी स्तुति" — और देवी ने वचन दिया कि जब-जब संसार पर संकट आएगा, वे नए रूपों में लौटेंगी: कभी रक्तदंतिका, कभी शाकम्भरी, कभी भ्रामरी।
फिर वे अंतर्धान हो गईं — इस बार भी स्वर्ग में नहीं, बल्कि उस वादे में जो अब पूरा होना बाक़ी था।
टिप्पणी: "एकैवाहं जगत्यत्र" — मैं इस संसार में अकेली हूँ — यह देवी माहात्म्य के दसवें अध्याय का सबसे महत्त्वपूर्ण वाक्य माना जाता है। शाक्त व्याख्या में यह पद देवी की सर्वोच्चता और एकत्व की सबसे स्पष्ट घोषणाओं में से एक माना जाता है। मातृकाओं का देवी में वापस समाना भी उसी पाठ में है। कथा में यह सीधे शुम्भ के "तू अकेले नहीं" वाले आरोप का उत्तर बनता है।
स्रोत: कई ग्रंथों से, मैं अकेली हूँ