
अध्याय ७
काली और रक्तबीज
रक्तबीज का रक्त
शिव, जो दूत बने
चंड-मुंड के बाद शुम्भ ने अपनी पूरी असुर सेना निकाली। अम्बिका के शरीर से एक उग्र शक्ति प्रकट हुई।
उसने शिव से कहा कि वे उसका संदेश शुम्भ तक पहुँचाएँ: "देवताओं को उनका स्वर्ग लौटा दे, या युद्ध के लिए तैयार हो जाए।" शिव को दूत बनाने के कारण उस शक्ति का नाम पड़ा — शिवदूती।
इस प्रसंग में शिव देवी के संदेशवाहक बनते हैं।
देवताओं की शक्तियाँ
जैसे-जैसे असुर सेना बढ़ी, हर देवता की शक्ति एक देवी का रूप लेकर देवी के साथ आ खड़ी हुई। ब्रह्माणी हंस पर सवार, कमंडल लिए। माहेश्वरी बैल पर, त्रिशूल लिए।
कौमारी मोर पर, भाला लिए। वैष्णवी गरुड़ पर, चक्र और शंख लिए। वाराही वराह के मुख वाली।
नारसिंही सिंह के मुख वाली। और ऐंद्री हाथी पर, वज्र लिए। आगे परंपरा इन्हें सप्त मातृका कहेगी — सात माँएँ (अध्याय ९)।
रक्तबीज की शक्ति
फिर रक्तबीज लड़ने आया।
उसकी शक्ति यह थी: उसके ख़ून की जो बूँद ज़मीन पर गिरे, उससे ठीक उसी जैसा एक और रक्तबीज पैदा हो जाए।
यानी उसे घायल करना ही ख़तरनाक था — हर घाव उसे बढ़ाता।
मैदान भर गया
मातृकाओं ने रक्तबीज पर हर हथियार चलाया — वज्र, त्रिशूल, चक्र, भाला। हर वार से ख़ून बहा, हर बूँद ज़मीन पर गिरी, और हर बूँद से एक नया रक्तबीज उठ खड़ा हुआ।
थोड़ी देर में मैदान सैकड़ों-हज़ारों रक्तबीजों से भर गया। देवता घबरा गए।
जितना मारो, उतने बढ़ते जा रहे थे।
जीभ फैलाओ
तब चंडिका ने काली से कहा: "अपना मुँह चौड़ा खोलो।"
"मैं रक्तबीज और उसकी नक़लों पर वार करती रहूँगी।"
"तुम ख़ून को ज़मीन पर गिरने से पहले पी जाओ, और जो नए असुर बनें उन्हें खा जाओ।" काली मैदान में घूमने लगीं, जीभ फैलाए — हर बूँद उनके मुँह में, हर नया रक्तबीज उनके मुँह में।
बिना ख़ून का असुर
अब रक्तबीज पर वार होते रहे, ख़ून बहता रहा — पर एक बूँद ज़मीन तक नहीं पहुँची। कोई नई नक़ल नहीं बनी।
धीरे-धीरे उसका सारा ख़ून निकल गया। बिना ख़ून का, सूखा हुआ, वह गिर पड़ा।
जिस वरदान ने उसे अजेय बनाया था, उसी ने उसे ख़त्म किया — क्योंकि काली ने वह जगह ही छीन ली जहाँ उसका ख़ून गिर सकता था।
टिप्पणी: देवी माहात्म्य के आठवें अध्याय में यह प्रसंग है। रक्तबीज की शक्ति और काली का ख़ून पीना — दोनों मूल पाठ में हैं। युद्ध में उतरने वाली शक्तियाँ हैं ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही और ऐंद्री; काली-चामुंडा भी उनके साथ लड़ती हैं। शिव का दूत बनाया जाना — "शिवदूती" — उसी पाठ में है; शाक्त व्याख्या इसे देवी की सर्वोच्चता के संकेत की तरह पढ़ती है।
स्रोत: कई ग्रंथों से, काली और रक्तबीज