
अध्याय ९
सप्त मातृका
युद्ध और मंदिर की मातृकाएँ
युद्ध में उतरी मातृकाएँ
देवी माहात्म्य की रक्तबीज-लड़ाई में देवताओं की कई शक्तियाँ उतरती हैं — ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही और ऐंद्री। काली-चामुंडा भी उनके साथ लड़ती हैं। हर देवी अपने देवता का वाहन और हथियार धारण करती है। ब्रह्माणी हंस पर, कमंडल लिए।
माहेश्वरी बैल पर, त्रिशूल लिए। कौमारी मोर पर, भाला लिए। वैष्णवी गरुड़ पर, चक्र-शंख-गदा लिए। वाराही वराह के मुख वाली, नारसिंही सिंह के मुख वाली, और ऐंद्री हाथी पर, वज्र लिए।
मंदिरों की सामान्य सूची
पर मंदिर और मूर्तिकला में जो "सप्त मातृका" समूह स्थिर हुआ, उसकी सामान्य सूची थोड़ी अलग है: ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, ऐंद्री और चामुंडा।
यहाँ नारसिंही की जगह चामुंडा सातवीं बन जाती है।
यही पाठ की सूची और मूर्ति-परंपरा की सूची में फ़र्क़ है — और यह फ़र्क़ जानना ज़रूरी है, क्योंकि दोनों को अक्सर एक मान लिया जाता है।
अंधक का ख़ून
मातृकाओं की एक और बड़ी कथा शिव से जुड़ी है। अंधक नाम का असुर शिव से लड़ रहा था, और उसे रक्तबीज जैसा ही वरदान था — उसके ख़ून की हर बूँद से एक नया अंधक।
मत्स्य पुराण के एक रूप में शिव मातृकाओं को उत्पन्न करते हैं ताकि वे अंधक का गिरता हुआ रक्त पी सकें।
अलग-अलग पुराणों में इस युद्ध और मातृकाओं की उत्पत्ति का क्रम बदलता है, इसलिए इसे देवी माहात्म्य की रक्तबीज-कथा का ही दूसरा रूप नहीं समझना चाहिए।
जो रुकीं नहीं
पर ख़ून चखने के बाद मातृकाएँ रुकीं नहीं। वे तीनों लोकों में घूमकर जीवों को खाने लगीं — भूख जैसे बुझती ही न हो।
देवता घबरा गए। मत्स्य पुराण से जुड़ी परंपरा में नरसिंह आगे आकर उन्हें शांत करते हैं और संसार की रक्षा करने का आदेश देते हैं।
दूसरे ग्रंथ इस प्रसंग को अलग ढंग से सुनाते हैं।
बच्चों की देवियाँ
मातृकाओं की एक परत देवी माहात्म्य से भी पुरानी है। महाभारत में "मातृगण" — माँओं का समूह — बालक स्कंद के आसपास आते हैं: कुछ रक्षा करती हैं, कुछ "पकड़ने वाली" (ग्रह) हैं जो बच्चों को रोग देती हैं।
उन्हें मनाना पड़ता है — बलि, पूजा, चौराहे पर रखा भोजन।
यानी मातृका सिर्फ़ योद्धा नहीं — वे जन्म, रोग और मृत्यु की देवियाँ भी हैं, और उनसे डरा भी जाता है।
मंदिर की दीवार पर सात
पुराने मंदिरों की दीवारों पर मातृकाएँ अक्सर एक पंक्ति में बैठी मिलती हैं — सात, एक-सी मुद्रा में, हर एक अपने वाहन के साथ। पंक्ति के एक छोर पर वीरभद्र, दूसरे छोर पर गणेश।
एलोरा, ऐहोल, उदयगिरि — कई जगह यही क्रम। गुप्त काल तक यह समूह मूर्तिकला में स्पष्ट रूप से स्थापित दिखता है।
मातृकाओं में देवी का मातृत्व केवल कोमलता नहीं है। वे रक्षा करती हैं, रोग से जुड़ती हैं, युद्ध करती हैं और कई पुरानी परंपराओं में उन्हें शांत तथा तृप्त भी रखना पड़ता है।
टिप्पणी: गुप्त काल (४-५वीं सदी) तक सप्तमातृका समूह की मूर्तिकला स्पष्ट रूप से स्थापित दिखाई देती है। देवी माहात्म्य में उनका आना (रक्तबीज की लड़ाई में) और देवी में समाना (शुम्भ के आरोप के बाद) — दोनों मूल पाठ में हैं। अंधक-वध वाली कथा मत्स्य पुराण और अन्य पुराण-परंपराओं में अलग-अलग रूपों में मिलती है। मंदिरों में सप्त या अष्ट मातृकाओं के समूह भी मिलते हैं; उनकी पहचान अक्सर उनके वाहन, मुद्रा और संबंधित देवताओं के चिह्नों से होती है। "मातृका" का अर्थ है "माँ"।
स्रोत: कई ग्रंथों से, सप्त मातृका