अध्याय १२

शाकम्भरी और दुर्गम

शताक्षी से शाकम्भरी

वेद चुरा लिए

दुर्गम नाम के असुर ने ब्रह्मा से तप करके माँगा कि तीनों लोकों में ब्राह्मणों और देवताओं के पास जो वैदिक मंत्र हैं, वे उसके अधिकार में आ जाएँ — और उसे देवताओं को हराने की शक्ति मिले। ब्रह्मा ने वर दे दिया।

वेद ब्राह्मणों के मुँह से निकलकर दुर्गम के पास चले गए। अब कोई मंत्र याद नहीं रहा।

कोई यज्ञ पूरा नहीं होता था।

सौ बरस सूखा

यज्ञ बंद हुए, तो देवताओं को आहुति मिलनी बंद हो गई — वे कमज़ोर पड़ने लगे। और सबसे बड़ी बात: जो मंत्र बारिश बुलाते थे, वे भी खो गए।

बादल आना बंद हो गए। सौ बरस बारिश नहीं हुई।

नदियाँ सूख गईं, फ़सलें नहीं उगीं। लोग और जानवर भूख-प्यास से मरने लगे।

सौ आँखों से आँसू

बचे हुए लोग देवी की प्रार्थना करने लगे। देवी प्रकट हुईं — पर योद्धा के रूप में नहीं।

उन्होंने संसार का दुख देखा और रोने लगीं — सौ आँखों से। शताक्षी — सौ आँखों वाली — उनका नाम उस दिन से पड़ा।

उनकी आँखों से लगातार आँसू बरसे, और धरती फिर जल से भरने लगी।

देह से भोजन

फिर देवी ने अपनी देह से भोजन उगाया। फल, साग, सब्ज़ियाँ, कंद, खाने योग्य हर पौधा — सब उनके अपने शरीर से निकला।

इसीलिए नाम पड़ा — शाकम्भरी, साग-सब्ज़ी से धारण करने वाली।

अगली फ़सल आने तक देवी ने पूरे संसार को अपनी देह से खिलाया।

दुर्गम से युद्ध

दुर्गम को पता चला और वह देवी को रोकने आया, बड़ी सेना लेकर। देवी के शरीर से अनेक शक्तियाँ निकलीं — कालिका, तारा, भैरवी, बगला, मातंगी, त्रिपुरसुंदरी और दूसरी देवियाँ। कई दिनों तक युद्ध चला।

दसवें दिन तक दुर्गम की सेना नष्ट हो चुकी थी। ग्यारहवें दिन वह स्वयं देवी के सामने आया।

देवी ने उसके घोड़ों और सारथी को गिराया, आँखों और भुजाओं को बाणों से भेदा, ध्वज काटा, और अंत में पाँच बाण उसकी छाती में उतार दिए। दुर्गम गिर पड़ा।

वेद लौटे, नाम मिला

वेद ब्राह्मणों के पास लौट आए, यज्ञ फिर शुरू हुए, बारिश लौटी। दुर्गम को मारने के कारण देवी का एक नाम पड़ा — दुर्गा।

परंपरा में इसके तीन अर्थ साथ चलते हैं: जिसने दुर्गम को मारा; जो एक क़िले (दुर्ग) जैसी अभेद्य है; और जो दुर्गति — संकट, दुख — को हर लेती है। यह वही वचन है जो अध्याय ८ में नारायणी स्तुति के बाद दिया गया था — कि देवी शताक्षी बनेंगी, फिर शाकम्भरी, और दुर्गम को मारकर "दुर्गा" कहलाएँगी।

यहाँ देवी केवल युद्ध नहीं करतीं — वे रोती हैं और संसार को भोजन भी देती हैं।

टिप्पणी: शाकम्भरी और दुर्गम की विस्तृत कथा देवी भागवत पुराण में है; देवी माहात्म्य भी भविष्य में सौ बरस के सूखे और "शताक्षी" नाम की बात कहता है। दुर्गम की लड़ाई में देवी के शरीर से जो शक्तियाँ निकलती हैं, उनके नामों में बाद की महाविद्या-सूची के कई नाम मिलते हैं — लेकिन इस प्रसंग में ग्रंथ उन्हें "दस महाविद्या" नाम से एक निश्चित समूह के रूप में नहीं गिनता। "दुर्गा" नाम की कई व्युत्पत्तियाँ पुराणों में मिलती हैं। राजस्थान सहित कई क्षेत्रों में शाकम्भरी की स्वतंत्र पूजा परंपरा आज भी है।

स्रोत: कई ग्रंथों से, शाकम्भरी और दुर्गम

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

दुर्गमासुर ने ब्रह्मा से क्या माँगा?

  • अमरता
  • चारों वेद और उनकी शक्ति
  • तीनों लोकों का राज
  • देवताओं के हथियार
पूरी कथा पढ़िए — ताक़त नहीं, शब्द माँगे

दुर्गम की चतुराई महिष या रक्तबीज से अलग है: उसने कोई वरदान-दरार वाली शक्ति नहीं माँगी। उसने वेद माँगे — यानी वह ज्ञान और विधि जिस पर पूरी व्यवस्था टिकी है।

बिना वेद के देवता ख़ुद कमज़ोर पड़ जाते हैं, क्योंकि उनकी ताक़त यज्ञ की आहुति से आती है।

यह अध्याय १ (वाक्, शब्द की देवी) से जुड़ता है: अगर देवी शब्द की शक्ति हैं, तो शब्द का चोर सीधे उन्हीं पर हमला है।

ऐसा क्यों?

वेद चोरी होने पर बारिश क्यों रुक गई?

  • क्योंकि दुर्गम ने बादलों को भी क़ैद कर लिया
  • क्योंकि देवी ने क्रोध में बारिश रोक दी
  • क्योंकि सूर्य ने तपना बढ़ा दिया
  • क्योंकि जो मंत्र यज्ञ में बारिश बुलाते थे, वे वेद के साथ ही खो गए
पूरी कथा पढ़िए — शब्द, जिन पर मौसम टिका था

वैदिक विश्व-दृष्टि में यज्ञ सिर्फ़ पूजा नहीं — वह प्रकृति को चलाने की विधि है। सही मंत्र, सही आहुति, और बारिश आती है, फ़सल होती है।

दुर्गम ने वह विधि ही छीन ली। इसलिए सूखा किसी एक मौसम का नहीं — सौ बरस का।

इसीलिए देवी का पहला काम लड़ाई नहीं था। पहले उन्होंने नदियाँ लौटाईं (आँसुओं से), फिर भोजन दिया (देह से), और युद्ध सबसे बाद में किया।

कौन हूँ मैं?

मैंने संसार का दुख देखकर सौ आँखों से आँसू बहाए, और वे आँसू सूखी नदियों में बहने लगे। फिर मैंने अपनी देह से साग-सब्ज़ी उगाकर भूखे संसार को खिलाया। मेरे दो नाम इन्हीं दो कामों से पड़े। मैं कौन हूँ?

  • शताक्षी (सौ आँखों वाली) और शाकम्भरी (साग-सब्ज़ी धारण करने वाली)
  • दुर्गा और चंडिका
  • लक्ष्मी और अन्नपूर्णा
  • गंगा और यमुना
पूरी कथा पढ़िए — रोने वाली, खिलाने वाली देवी

शताक्षी और शाकम्भरी देवी-चरित के सबसे अलग रूप हैं: यहाँ देवी की ताक़त हथियार नहीं — आँसू और भोजन।

"सौ आँखें" का मतलब है कि वे संसार का हर दुख एक साथ देखती हैं, और वह देखना ही आँसू बन जाता है, और आँसू नदी।

यह देवी माहात्म्य की उग्र दुर्गा से बहुत दूर लगता है — पर परंपरा दोनों को एक ही मानती है। यही "एक या अनेक" वाला सवाल है: क्या रोने वाली देवी और भैंसा मारने वाली देवी एक हैं?

किसने कहा?

"मैं शताक्षी बनूँगी, फिर शाकम्भरी, और दुर्गमासुर को मारकर दुर्गा कहलाऊँगी।" — यह वचन कहाँ, किसने दिया?

  • ब्रह्मा ने, दुर्गम को वरदान देते हुए
  • शिव ने, देवताओं से
  • देवी ने ख़ुद, देवी माहात्म्य के ग्यारहवें अध्याय की नारायणी स्तुति में
  • नारद ने, देवताओं से
पूरी कथा पढ़िए — एक वचन, जो एक अध्याय बाद पूरा होता है

देवी माहात्म्य अपने अंत में (नारायणी स्तुति) देवी के मुँह से भविष्य की कथाएँ गिनवाता है — रक्तदंतिका, शताक्षी, शाकम्भरी, दुर्गा, भ्रामरी।

शाकम्भरी-दुर्गम की यह कथा उसी वचन का पूरा रूप है, जो देवी माहात्म्य के मुख्य भाग में नहीं, बाद के अध्यायों और देवी भागवत में मिलती है।

यानी देवी माहात्म्य ख़ुद अपने से आगे इशारा करता है, और देवी-चरित उन इशारों को कथाएँ बना देती है।

क्या हुआ?

देवी के आँसू ज़मीन पर गिरने से क्या हुआ?

  • अकाल और बढ़ गया
  • वे नदियाँ बन गए
  • असुर सेना जल में डूब गई
  • ज़मीन फट गई
पूरी कथा पढ़िए — आँसू, जो नदी बने

यह छवि देवी-चरित में अकेली है: देवी का दुख सीधे संसार का उपकार बन जाता है।

शताक्षी की सौ आँखें सिर्फ़ "देखने" के लिए नहीं — वे "रोने" के लिए हैं, और वह रोना ही सूखी धरती का इलाज है।

इसके बाद देह से भोजन — यानी देवी पहले पानी देती हैं, फिर अन्न। युद्ध तीसरे नंबर पर आता है।

पहेली

मेरा एक नाम एक असुर को मारने से पड़ा। मेरा वही नाम एक क़िले का भी अर्थ रखता है। और वही नाम "दुख हरने वाली" भी है। मैं तीन अर्थों वाला एक नाम हूँ — कौन-सा?

  • चंडिका
  • अम्बिका
  • कात्यायनी
  • दुर्गा
पूरी कथा पढ़िए — एक नाम, तीन जड़ें

"दुर्गा" नाम की व्युत्पत्ति परंपरा में एक नहीं — तीन अर्थ साथ चलते हैं, और तीनों "सही" माने जाते हैं।

यह देवी-चरित के "एक या अनेक" वाले सवाल का भाषा में रूप है: एक शब्द, कई अर्थ, और परंपरा किसी एक को नहीं चुनती।

ध्यान देने की बात: सबसे प्रसिद्ध देवी-नाम "दुर्गा" महिष-वध से नहीं, इस कम जानी कथा — दुर्गम-वध — से आता है (एक व्युत्पत्ति के अनुसार)।

सही क्रम

घटनाओं का सही क्रम कौन-सा है?

  • दुर्गम का तप और वेद माँगना → वेदों का ब्राह्मणों से दुर्गम के पास जाना → यज्ञ बंद, सौ बरस सूखा, नदियाँ सूखीं → लोगों की प्रार्थना और देवी का शताक्षी रूप में सौ आँखों से रोना → आँसुओं से नदियाँ लौटना → देवी का शाकम्भरी रूप और देह से भोजन → दुर्गम का युद्ध और वध → वेदों का लौटना और देवी का "दुर्गा" नाम
  • सूखा → देवी का युद्ध → वेद माँगना → शाकम्भरी
  • देवी का "दुर्गा" नाम → शताक्षी → दुर्गम का तप → सूखा
  • शाकम्भरी → दुर्गम का तप → सूखा → शताक्षी
पूरी कथा पढ़िए — चोरी, सूखा, आँसू, भोजन, युद्ध

इस अध्याय की बनावट देवी माहात्म्य के युद्ध-अध्यायों से बिलकुल अलग है: यहाँ देवी का पहला और सबसे लंबा काम बचाना है, मारना नहीं।

बीच का मोड़ शताक्षी का रोना है — वहीं कथा "सूखे की त्रासदी" से "देवी के बचाव" की ओर मुड़ती है।

युद्ध सबसे आख़िर में, सबसे छोटा। और उसके बाद भी देवी का काम है — वेद लौटाना, व्यवस्था फिर चालू करना।

ग्रंथ असहमत

"दुर्गा" नाम कहाँ से आया — इस पर परंपरा क्या कहती है?

  • सिर्फ़ महिषासुर-मर्दिनी होने से
  • सिर्फ़ पर्वत (दुर्ग) पर रहने से
  • एक से ज़्यादा व्युत्पत्तियाँ साथ चलती हैं
  • नाम किसी ग्रंथ में नहीं, सिर्फ़ लोक-परंपरा में
पूरी कथा पढ़िए — नाम, जिसकी एक जड़ नहीं

"दुर्गा" संस्कृत में एक शब्द है जिसके कई अर्थ हैं: कठिन, अभेद्य, पार करने में मुश्किल, दुर्गम स्थान।

शाक्त परंपरा इन सब अर्थों को देवी से जोड़ती है — और दुर्गमासुर वाली कथा उनमें एक और, कथात्मक अर्थ जोड़ती है।

देवी-चरित किसी एक व्युत्पत्ति को "असली" नहीं कहती — यह दिखाती है कि सबसे बड़ा देवी-नाम भी एक निश्चित मूल का नहीं।

कौन हूँ मैं?

मैं वह असुर हूँ जिसने ताक़त नहीं, वेद माँगे। मेरे कारण सौ बरस बारिश नहीं हुई। मुझे मारने से देवी को उनका सबसे प्रसिद्ध नाम मिला। मैं कौन हूँ?

  • महिषासुर
  • रक्तबीज
  • दुर्गम (दुर्गमासुर)
  • भण्डासुर
पूरी कथा पढ़िए — असुर, जिसने व्यवस्था चुराई

दुर्गम देवी-चरित का सबसे "बौद्धिक" असुर है — उसने समझा कि व्यवस्था की जड़ ताक़त में नहीं, ज्ञान (वेद) में है।

और उसकी हार भी उसी से हुई: देवी ने पहले संसार को उस ज्ञान के बिना भी जिंदा रखा (आँसू, भोजन), फिर उसे मारकर ज्ञान लौटाया।

यही देवी-चरित की धुरी का एक और रूप है: देवी सिर्फ़ शत्रु को नहीं मारतीं — वे उस व्यवस्था को भी लौटाती हैं जो शत्रु ने तोड़ी थी, जैसे शिव-महिमा में शिव दक्ष का यज्ञ पूरा करवाते हैं।

बाद की परंपरा

शाकम्भरी देवी से जुड़ा एक तीर्थ और एक तिथि कौन-से हैं?

  • कामाख्या, और नवरात्रि की अष्टमी
  • वैष्णो देवी, और दीवाली
  • कालीघाट, और काली पूजा
  • सहारनपुर के पास शाकम्भरी शक्तिपीठ (और राजस्थान में भी एक), और "शाकम्भरी पूर्णिमा" (पौष पूर्णिमा)
पूरी कथा पढ़िए — एक देवी, जिसका पर्व भोजन का है

शाकम्भरी पूर्णिमा को देवी को साग, सब्ज़ी, फल चढ़ाए जाते हैं — यानी वही चीज़ें जो कथा में उन्होंने अपनी देह से उगाई थीं।

यह देवी का एक कम मनाया जाने वाला, पर बहुत पुराना पर्व है — और इसका ज़ोर युद्ध या शक्ति पर नहीं, अन्न और पोषण पर है।

सहारनपुर के पास का शाकम्भरी पीठ उत्तर भारत का एक प्राचीन शक्ति-स्थल है, जहाँ देवी की पूजा "अन्न देने वाली" के रूप में होती है।