
अध्याय १
वाक् — मैं ही हूँ
देवी की अपनी आवाज़
एक आवाज़, उल्टी दिशा में
ऋग्वेद की अधिकांश ऋचाओं में ऋषि किसी देवता की स्तुति करते हैं या उनसे कुछ कहते-माँगते हैं — गाय, वर्षा, पुत्र, जीत। लेकिन दसवें मंडल के एक सूक्त की आवाज़ बिल्कुल अलग है।
यहाँ किसी देवता को संबोधित नहीं किया जा रहा — वक्ता स्वयं "मैं" कहकर बोलती है और कहती है: जिन देवताओं की बाक़ी ऋचाएँ स्तुति करती हैं, वे सब मेरे भीतर टिके हैं।
यह देवी सूक्त है — ऋग्वेद १०.१२५ — बाद की दुर्गा-मंदिर और शाक्त परंपराओं से बहुत पहले का।
बोलने वाली कौन थी
परंपरा इस ऋचा की ऋषिका वाक् अम्भृणी को मानती है — अम्भृण की पुत्री वाक्। वे उन थोड़ी-सी स्त्री-ऋषियों में हैं जिनके नाम ऋग्वेद में दर्ज हैं।
वाक् का अर्थ है वाणी — बोला हुआ शब्द। यह वह शक्ति है जिसके बिना कोई मंत्र काम नहीं करता, कोई यज्ञ पूरा नहीं होता।
इस सूक्त में वही वाक् एक दिव्य, सर्वव्यापी शक्ति के रूप में स्वयं बोलती हैं। इस प्राचीन सूक्त में सर्वोच्च स्वर किसी युद्ध-देवी का नहीं, वाक् का है — शब्द की शक्ति का।
वह क्या कहती है
उस ऋचा में वाक् एक-एक करके गिनाती हैं — "मैं रुद्रों के साथ चलती हूँ, वसुओं के साथ, आदित्यों के साथ। मैं मित्र और वरुण दोनों को धारण करती हूँ, इंद्र और अग्नि को, अश्विनों की जोड़ी को।"
"जो यजमान आहुति देता है, धन उसे मैं देती हूँ। मैं रानी हूँ, ऐश्वर्य समेटने वाली।"
"देवताओं ने मुझे अनेक जगहों पर बिठाया है। जो कोई खाता है, देखता है, साँस लेता है, कोई शब्द सुनता है — वह मेरे ही सहारे करता है।"
"वे यह नहीं जानते, फिर भी मुझमें बसते हैं।"
जो माँगती नहीं
फिर वाक् एक और बात कहती हैं, जो पूरी ऋचा का मोड़ है — "मैं रुद्र के लिए धनुष खींचती हूँ, ताकि उसका बाण उस पर लगे जो पवित्र वचन से बैर रखता है। मैं लोगों के लिए युद्ध रचती हूँ।"
"मैं इस संसार के शिखर पर पिता को जन्म देती हूँ।"
"मेरा घर जल में है, समुद्र में।"
"वहाँ से मैं हर जीव पर फैली हूँ, और अपने माथे से ऊपर वाले आकाश को छूती हूँ।" यहाँ प्रार्थना से ज़्यादा घोषणा है — "मुझे दो" नहीं, "मैं हूँ"।
बाद की शाक्त परंपरा
कई सदियों बाद, पुराणकाल में, देवी माहात्म्य की शाक्त परंपरा ने इसी वैदिक स्वर को अपने पीछे की एक प्राचीन परत के रूप में पढ़ा। बाद की दुर्गासप्तशती-पाठ परंपराओं में देवी सूक्त को महत्त्वपूर्ण स्थान मिला, और कई परंपराओं में इसे सप्तशती के साथ पढ़ा जाता है।
आज भी कई शाक्त और नवरात्रि पाठ-परंपराओं में यह सूक्त पढ़ा जाता है।
शाक्त परंपरा का तर्क इसी पर टिका था: देवी कोई केवल बाद की पौराणिक खोज नहीं — उनका एक शक्तिशाली स्वतंत्र स्वर वैदिक साहित्य में भी मौजूद है, और वहाँ वे किसी की पत्नी नहीं — वहाँ वे बोल रही हैं।
पूरी गाथा का सवाल
वाक् "मैं" कहती हैं — एक आवाज़, एक वक्ता। पर आगे जो देवियाँ आएँगी उनके सौ नाम हैं — दुर्गा, काली, चामुंडा, ललिता, लक्ष्मी, सरस्वती, मनसा।
क्या ये सब वही एक "मैं" हैं, या अलग-अलग देवियाँ जिन्हें बाद में एक कर दिया गया? यह गाथा इस सवाल का एक जवाब नहीं देती।
हर अध्याय में यह दर्ज करती है कि किस ग्रंथ ने क्या माना — और वह फ़र्क़ छुपाया नहीं जाता।
टिप्पणी: देवी सूक्त (ऋग्वेद १०.१२५) की ऋषिका वाक् अम्भृणी मानी जाती हैं — अम्भृण की पुत्री, उन थोड़ी-सी स्त्री-ऋषियों में जिनके नाम ऋग्वेद में दर्ज हैं। यह सूक्त बाद की दुर्गासप्तशती-पाठ परंपराओं में महत्त्वपूर्ण स्थान पाता है — कई परंपराओं में इसे सप्तशती के साथ पढ़ा जाता है, पर यह देवी माहात्म्य की मूल कथा का हिस्सा नहीं है — यह बाद की पाठ-परंपरा की बात है। वाक् को आगे की परंपरा ने सरस्वती से जोड़ा, पर सूक्त में वे किसी देवता की पत्नी नहीं — वे स्वतंत्र वक्ता हैं।
स्रोत: कई ग्रंथों से, वाक् — मैं ही हूँ