
अध्याय ६
चाँद का शाप
एक रात, बहुत सारे लड्डू, और एक नियम जो आज भी माना जाता है
लड्डुओं से भरा पेट
एक बहुत प्रचलित कथा, जिसे अक्सर स्कंद पुराण से जोड़ा जाता है, कहती है कि गणेश एक भोज में गए और जी भर लड्डू खाए।
लौटते समय वे अपने चूहे पर सवार थे, पेट भरा हुआ, चाल लड़खड़ाती हुई। रास्ते में एक साँप निकला। चूहा डरकर उछल पड़ा, और गणेश गिर गए।
गिरते ही उनका भरा हुआ पेट फट गया, और सारे लड्डू ज़मीन पर लुढ़क गए।
साँप की पेटी
गणेश उठे, एक-एक लड्डू समेटा, और वापस पेट में भर लिया।
फिर उन्होंने उसी साँप को उठाया और अपने पेट के चारों ओर पेटी की तरह बाँध लिया, ताकि पेट फिर न खुले। इसी से उनकी मूर्तियों में साँप कमर पर बँधा दिखता है।
ऊपर, आकाश में, चंद्र — चाँद — यह सब देख रहा था। और वह हँस पड़ा।
जो चाँद देखेगा
गणेश का हाथ ऊपर उठा।
"जो कोई तुझे देखेगा," उन्होंने चाँद को शाप दिया, "उस पर झूठा इल्ज़ाम लगेगा, उसकी बदनामी होगी।"
चाँद और देवताओं ने गिड़गिड़ाकर क्षमा माँगी। गणेश थोड़े नरम पड़े, और शाप को सीमित कर दिया — सिर्फ़ भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी की रात। यानी उनके अपने पर्व, गणेश चतुर्थी की रात।
और कृष्ण भी फँसे
परंपरा कहती है कि एक साल उसी रात कृष्ण ने अनजाने में दूध के कटोरे में चाँद की परछाईं देख ली।
उसके बाद स्यमंतक मणि की चोरी और हत्या का झूठा इल्ज़ाम उन्हीं पर लगा — वही कथा जो इस साइट पर कृष्ण-लीला के सत्रहवें कांड में है। इसलिए आज भी गणेश चतुर्थी पर अगर चाँद दिख जाए, तो उपाय यही है कि स्यमंतक मणि की कथा सुनी या पढ़ी जाए।
टिप्पणी: चाँद के शाप की कथा स्कंद पुराण में बताई जाती है (इस जाँच में सटीक अध्याय पक्का नहीं हुआ)। कृष्ण का उसी दिन चाँद देखकर स्यमंतक मणि के इल्ज़ाम में फँसना परंपरा में इसी शाप से जोड़ा जाता है — वह कथा इस साइट पर कृष्ण-लीला अध्याय १७ में है। तिथियाँ: गणेश चतुर्थी भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को होती है, और कई सार्वजनिक उत्सव अनंत चतुर्दशी को विसर्जन के साथ पूरे होते हैं (घरेलू पूजा इससे पहले भी); गणेश जयंती माघ शुक्ल चतुर्थी को (मुख्यतः महाराष्ट्र में); संकष्टी चतुर्थी हर महीने की कृष्ण पक्ष चतुर्थी को।
स्रोत: कई ग्रंथों से, चाँद का शाप