
अध्याय ४
दो भाई, एक फल
एक दिव्य फल, दो भाई, और दुनिया का चक्कर लगाने की शर्त
नारद का आम
नारद शिव और पार्वती के पास एक सुनहरा फल लेकर आए — तमिल कंद पुराणम् की यह कथा दक्षिण भारत में सबसे प्रसिद्ध है। परंपरा उस फल को आम के रूप में याद रखती है।
"यह साधारण फल नहीं है," उन्होंने कहा। "जो इसे खाएगा, उसे अमरता और परम ज्ञान मिलेगा।"
शिव ने आम अपने दोनों बेटों को दिखाया — गणेश और कार्तिकेय। दोनों उसे चाहते थे, और फल बाँटा नहीं जा सकता था।
"तो एक शर्त," शिव ने कहा। "जो पहले पूरी दुनिया के तीन चक्कर लगाकर लौटेगा, आम उसका।"
एक उड़ गया, एक चला
कार्तिकेय ने देर नहीं की। वे अपने मोर पर सवार हुए और हवा से बात करते निकल पड़े — समुद्र, पर्वत, नदियाँ पीछे छूटती गईं।
गणेश वहीं खड़े रहे। उनका वाहन एक चूहा था — मोर से होड़ करना बेकार था।
फिर वे धीरे-धीरे उठे, और अपने माता-पिता के चारों ओर एक चक्कर लगाया। फिर दूसरा। फिर तीसरा। "आप दोनों मेरा संसार हैं," उन्होंने हाथ जोड़कर कहा। "आपकी परिक्रमा ही पूरी दुनिया की परिक्रमा है।"
शिव मुस्कुराए और आम गणेश को दे दिया। जब कार्तिकेय थके-हारे लौटे, फल जा चुका था।
दो बहनें, दो बेटे
आगे एक और होड़ हुई — इस बार विवाह की। दोनों भाई प्रजापति की दो बेटियों से विवाह चाहते थे।
शिव पुराण उन्हें सिद्धि और बुद्धि कहता है; ब्रह्मवैवर्त पुराण ऋद्धि और सिद्धि। गणेश यह होड़ भी जीत गए। आगे चलकर उनके दो बेटे हुए — क्षेम और लाभ (कुछ उत्तर भारतीय कथाओं में शुभ और लाभ)।
कार्तिकेय इस बार रुके नहीं। वे दक्षिण की ओर चले गए और पलनी की पहाड़ी पर जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने गहने और वस्त्र उतार दिए, और एक कौपीन और अपने भाले के साथ तपस्वी बन गए — तमिल परंपरा में यहीं वे मुरुगन, दंडायुधपाणि कहलाते हैं।
उत्तर का गृहस्थ, दक्षिण का ब्रह्मचारी
यहीं से एक फ़र्क़ आज तक चला आता है।
उत्तर भारत में गणेश गृहस्थ हैं — ऋद्धि और सिद्धि उनके साथ, घर में समृद्धि लाने वाले। विवाहित देवता घर के भीतर विराजते हैं।
दक्षिण भारत के कई हिस्सों में उन्हें ब्रह्मचारी माना जाता है — अविवाहित, जिसकी शक्ति उसके ब्रह्मचर्य से आती है। पर यह पूरे दक्षिण का नियम नहीं; वहाँ संगिनी वाले गणेश-रूप भी मिलते हैं।
दोनों परंपराएँ आज भी जीवित हैं। दोनों अपनी जगह सही हैं।
टिप्पणी: आम और परिक्रमा की होड़ ख़ास तौर पर तमिल कंद पुराणम् और बाद की दक्षिण भारतीय परंपरा की है (संस्कृत स्कंद पुराण में भी मिलती-जुलती कथाएँ हैं); फल अमरता और परम ज्ञान देता है। गणेश की संगिनियों के नाम स्रोत के अनुसार बदलते हैं — सिद्धि, बुद्धि और ऋद्धि अलग-अलग संयोजनों में — और कुछ परंपराएँ उन्हें अविवाहित भी मानती हैं; पुत्र क्षेम और लाभ (या शुभ और लाभ) कहे जाते हैं। उत्तर का गृहस्थ गणेश और दक्षिण के कई हिस्सों का ब्रह्मचारी गणेश एक असली परंपरागत भेद है — पर यह कोई साफ़ उत्तर-दक्षिण सीमा नहीं, दक्षिण में भी संगिनी वाले रूप हैं। कार्तिकेय का हारकर पलनी चले जाना तमिल मुरुगन/दंडायुधपाणि की कथा से जुड़ा है।
स्रोत: कई ग्रंथों से, दो भाई, एक फल