अध्याय ५

टूटा दाँत

उनका एक दाँत टूटा हुआ है — क्योंकि उन्होंने ख़ुद तोड़ा

एक लिखनेवाला चाहिए

व्यास के मन में महाभारत तैयार थी, पर उसे लिखे कौन? वे इतनी तेज़ी से रचते जा रहे थे कि कोई लेखक उनकी गति का साथ नहीं दे सकता था।

ब्रह्मा ने कहा — गणेश को बुलाओ।

गणेश आए और एक शर्त रखी: "मैं तभी लिखूँगा जब मेरी क़लम एक पल के लिए भी न रुके। तुम बोलते रहो, बिना अटके।"

व्यास ने जवाब में अपनी शर्त रखी: "पर तुम कोई पंक्ति तब तक मत लिखना जब तक उसका अर्थ पूरी तरह समझ न लो।" और फिर व्यास बीच-बीच में ऐसी उलझी हुई पंक्तियाँ बोलने लगे कि गणेश उन्हें समझने में रुकें, और व्यास को आगे सोचने का समय मिल जाए।

क़लम टूटी, दाँत टूटा

लिखते-लिखते गणेश की सरकंडे की क़लम टूट गई।

रुकना शर्त के ख़िलाफ़ था। एक पल भी गँवाए बिना, गणेश ने अपना दाहिना दाँत तोड़ा और उसी से लिखते रहे।

इसी से उन्हें एक नाम मिला — एकदंत।

पर एक बात साफ़ रखनी ज़रूरी है। यह पूरा प्रसंग महाभारत के आलोचनात्मक संस्करण में नहीं है — वी. एस. सुक्थांकर ने इसे बाद का जोड़ मानकर हटा दिया। यह कुछ क्षेत्रीय पाठों में ही मिलता है।

कैलास के द्वार पर

दूसरी कथा ब्रह्माण्ड और ब्रह्मवैवर्त पुराण में है।

परशुराम कैलास आए, शिव के दर्शन को। शिव उस समय ध्यान में थे, और गणेश द्वार पर पहरे पर।

"अभी नहीं," गणेश ने रास्ता रोका।

परशुराम क्रोध में आ गए और अपना परशु — कुल्हाड़ी — गणेश की ओर फेंक दिया। गणेश उसे रोक सकते थे। पर उन्होंने पहचान लिया कि वह कुल्हाड़ी शिव की दी हुई है। पिता के दिए हथियार का अपमान करने के बजाय उन्होंने वार अपने ऊपर ले लिया। कुल्हाड़ी दाँत पर लगी और वह टूट गया।

एक ही दाँत, दो वजहें

एक कथा में दाँत ज्ञान के लिए टूटता है — ताकि एक महाकाव्य लिखा जा सके।

दूसरी में पिता के सम्मान के लिए — ताकि एक दिव्य हथियार का अपमान न हो।

परंपरा ने दोनों को रखा। एक ही टूटा दाँत, और उसके पीछे दो अलग-अलग बातें।

टिप्पणी: महाभारत लिखवाने वाली कथा महाभारत के आदिपर्व की भूमिका में मिलती है, पर वह भाग बोरी के आलोचनात्मक संस्करण में नहीं है — सुक्थांकर ने आदिपर्व का संपादन करते हुए (१९३३) इसे प्रक्षेप मानकर हटाया; यह केवल कुछ क्षेत्रीय संस्कृत पाठों में है। क़लम टूटने पर दाँत को लेखनी बनाने वाला ब्योरा उसी कथा पर चढ़ी एक और बाद की परत है। परशुराम वाली कथा ब्रह्माण्ड पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण (गणेश खंड, अध्याय ४३) में है। दोनों कथाएँ एक ही टूटे दाँत को अलग-अलग अर्थ देती हैं — एक ज्ञान का त्याग, दूसरी पिता के हथियार के प्रति आदर।

स्रोत: कई ग्रंथों से, टूटा दाँत

अब बताइए — कितना याद रहा?

क्या हुआ?

महाभारत-लेखक कथा से जुड़ी बाद की लोकप्रिय परंपरा में लेखनी टूटने पर गणेश क्या करते हैं?

  • उन्होंने लिखना रोक दिया और नई क़लम माँगी
  • उन्होंने उँगली से लिखना शुरू किया
  • उन्होंने व्यास से रुकने को कहा
  • अपना एक दाँत तोड़कर उसी को लेखनी बना लेते हैं
पूरी कथा पढ़िए — बिना रुके

आदिपर्व का उपलब्ध लेखक-अंश ब्रह्मा की सलाह, गणेश की "क़लम न रुके" शर्त और व्यास की "अर्थ समझकर लिखो" शर्त बताता है।

क़लम टूटने और दाँत को लेखनी बनाने वाला ब्योरा उस अंश में नहीं — वह बाद की जुड़ी कथा है। इसी से नाम मिला, एकदंत।

और वह पूरा लेखक-अंश भी बोरी के आलोचनात्मक संस्करण के स्थापित पाठ में नहीं है (देखें सवाल ५)।

तथ्य

दाँत तोड़ने से गणेश को कौन-सा नाम मिला?

  • लंबोदर
  • विनायक
  • एकदंत
  • वक्रतुंड
पूरी कथा पढ़िए — एक दाँत वाला

"एकदंत" गणेश के सबसे पुराने विशेषणों में है — गुप्तकाल की मूर्तियों में भी उन्हें एक दाँत के साथ दिखाया गया है।

यानी टूटा दाँत गणेश की छवि का बहुत पुराना हिस्सा है, भले उसके पीछे की कथाएँ बाद में जुड़ी हों।

मुद्गल पुराण के आठ अवतारों में एक "एकदंत" भी है, जो "मद" यानी अहंकार का नाश करता है।

किसने कहा?

"मैं तभी लिखूँगा जब मेरी क़लम एक पल भी न रुके।" — यह शर्त किसने रखी?

  • गणेश ने
  • व्यास ने
  • ब्रह्मा ने
  • शिव ने
पूरी कथा पढ़िए — दो शर्तें

गणेश की शर्त: क़लम न रुके, व्यास बिना अटके बोलें।

व्यास की जवाबी शर्त: गणेश कोई पंक्ति तब तक न लिखें जब तक उसका अर्थ पूरी तरह समझ न लें।

इसीलिए व्यास बीच-बीच में उलझी हुई पंक्तियाँ (कूट-श्लोक) बोलते, ताकि गणेश समझने में रुकें और उन्हें आगे सोचने का समय मिले।

ग्रंथ असहमत

गणेश ने दाँत क्यों तोड़ा — इसकी दो अलग कथाएँ क्या हैं?

  • दोनों कथाएँ एक ही हैं
  • एक युद्ध में, दूसरी खेल में
  • एक बचपन में, दूसरी बुढ़ापे में
  • महाभारत-लेखक कथा से जुड़ी एक बाद की परंपरा में दाँत लेखनी बनता है; दूसरी पुराणिक कथा में परशुराम का परशु दाँत तोड़ता है क्योंकि गणेश शिव के दिए हथियार का अपमान नहीं करना चाहते
पूरी कथा पढ़िए — एक दाँत, दो वजहें

लेखक-कथा से जुड़ी बाद की परंपरा में दाँत ज्ञान के लिए लेखनी बनता है — ताकि एक महाकाव्य लिखा जा सके।

दूसरी में पिता के सम्मान के लिए — परशुराम की कुल्हाड़ी शिव की दी हुई थी, और गणेश ने उसका अपमान करने के बजाय वार अपने ऊपर ले लिया।

परंपरा ने दोनों को रखा — एक ही टूटे दाँत के पीछे दो अलग अर्थ।

तथ्य

गणेश के महाभारत लिखने वाला प्रसंग महाभारत के आलोचनात्मक संस्करण में है या नहीं?

  • हाँ, आदिपर्व के मूल पाठ में
  • नहीं
  • हाँ, भीष्म पर्व में
  • यह प्रश्न ही ग़लत है, ऐसा कोई प्रसंग नहीं
पूरी कथा पढ़िए — जो हटाया गया

बोरी (भांडारकर संस्थान, पुणे) ने महाभारत का आलोचनात्मक संस्करण बनाया, हज़ारों पांडुलिपियाँ मिलाकर।

सुक्थांकर ने आदिपर्व का संपादन करते हुए (१९३३) पांडुलिपि-प्रमाण के आधार पर इसे बाद का उत्तर भारतीय प्रक्षेप मानकर स्थापित पाठ से बाहर रखा।

यानी यह कथा प्रिय है, लोकप्रिय है, पर महाभारत की सबसे पुरानी परत का हिस्सा नहीं।

कौन हूँ मैं?

मैंने कैलास के द्वार पर परशुराम को रोका, क्योंकि पिता ध्यान में थे। क्रोध में उन्होंने अपनी कुल्हाड़ी मुझ पर फेंकी, और मैंने वह वार जान-बूझकर सह लिया। मैं कौन हूँ?

  • नंदी
  • गणेश
  • कार्तिकेय
  • वीरभद्र
पूरी कथा पढ़िए — द्वार पर, फिर से

गणेश की कथाओं में द्वार बार-बार लौटता है — जन्म में, सिर वाली कथा में, और यहाँ भी।

परशुराम शिव के परम भक्त और असाधारण योद्धा थे, और उनका क्रोध प्रसिद्ध था।

गणेश उनकी कुल्हाड़ी रोक सकते थे — पर वह शिव की दी हुई थी, इसलिए उन्होंने रोका नहीं।

ऐसा क्यों?

गणेश ने परशुराम की कुल्हाड़ी रोकी क्यों नहीं, जबकि वे रोक सकते थे?

  • क्योंकि वे डर गए थे
  • क्योंकि परशुराम उनसे बलवान थे
  • क्योंकि शिव ने उन्हें रोकने से मना किया था
  • क्योंकि वह कुल्हाड़ी शिव की दी हुई थी, और गणेश पिता के दिए हथियार का अपमान नहीं करना चाहते थे
पूरी कथा पढ़िए — आदर, वार सहकर

यह कथा का असली मोड़ है: गणेश की हार नहीं, चुनाव।

उन्होंने तय किया कि पिता के दिए अस्त्र का मान रखना उनके अपने दाँत से बड़ा है।

इसीलिए इस कथा में टूटा दाँत त्याग का चिह्न है, चोट का नहीं।

किसने कहा?

"कोई पंक्ति तब तक मत लिखना जब तक उसका अर्थ पूरी तरह समझ न लो।" — यह शर्त किसने रखी?

  • व्यास ने
  • गणेश ने
  • ब्रह्मा ने
  • शिव ने
पूरी कथा पढ़िए — एक चतुर जवाबी शर्त

गणेश तेज़ थे — इतने कि व्यास की गति उनके आगे कम पड़ सकती थी।

व्यास ने इसका तोड़ निकाला: समझे बिना मत लिखो।

फिर वे जान-बूझकर ऐसे उलझे हुए श्लोक बोलते कि गणेश उन्हें सुलझाने में रुकें, और व्यास को अगली पंक्तियाँ रचने का समय मिल जाए। कहा जाता है महाभारत में आज भी ऐसे कूट-श्लोक हैं।

पहेली

मैं एक दाँत हूँ, और मेरे टूटने की दो कहानियाँ हैं — एक में मैं एक महाकाव्य के लिए टूटा, दूसरी में एक पिता के सम्मान के लिए। मैं किसका दाँत हूँ?

  • ऐरावत का
  • नंदी का
  • गणेश का
  • कालिया का
पूरी कथा पढ़िए — एक चिह्न, दो अर्थ

एकदंत रूप गणेश की सबसे स्थायी पहचानों में से एक है और शुरुआती प्रतिमाओं में भी मिलता है।

पर उस टूटने के पीछे एक कथा नहीं, दो हैं, और वे एक-दूसरे से मेल नहीं खातीं।

यह गाथा दोनों रखती है, क्योंकि परंपरा ने भी दोनों को रखा — किसी एक को "असली" कहे बिना।

सही क्रम

आदिपर्व की बाद की गणेश-लेखक कथा का सही क्रम क्या है?

  • गणेश की शर्त → व्यास को लेखक चाहिए → व्यास की जवाबी शर्त → गणेश लिखते हैं
  • व्यास को लेखक चाहिए → गणेश बिना रुके लिखने की शर्त रखते हैं → व्यास अर्थ समझकर लिखने की शर्त रखते हैं → गणेश लिखते हैं और व्यास कठिन श्लोकों से सोचने का समय लेते हैं
  • व्यास की जवाबी शर्त → गणेश की शर्त → गणेश लिखते हैं → व्यास को लेखक चाहिए
  • व्यास को लेखक चाहिए → व्यास की जवाबी शर्त → गणेश की शर्त → गणेश लिखते हैं
पूरी कथा पढ़िए — शर्तें पहले, दाँत बाद में

कथा व्यास की ज़रूरत से शुरू होती है — एक ऐसा लेखक जो उनकी गति से लिख सके।

दोनों शर्तें तय होने के बाद ही लेखन शुरू होता है।

दाँत को लेखनी बनाने वाला प्रसंग इस पहले से उत्तरकालीन लेखक-कथा से जुड़ी और बाद की परंपरा है।