
अध्याय ८
गणपति — सबसे पहले क्यों
हर पूजा से पहले जिसका नाम आता है, और वह परंपरा जिसने उसे ही परम माना
हर पूजा से पहले
कोई भी अनुष्ठान हो, कोई भी नया काम — विवाह, गृह-प्रवेश, यात्रा, परीक्षा — सबसे पहले गणेश का नाम लिया जाता है।
इसकी एक जड़ तो वही वरदान है (अध्याय ३), कि किसी भी पूजा से पहले उन्हीं को याद किया जाएगा।
पर इसे नियम बनाकर हर जगह फैलाने में एक और परंपरा का हाथ है।
गणपत्य — जिनके लिए वे ही ब्रह्म
गणपत्य एक संप्रदाय था जो गणेश को शिव का पुत्र नहीं, बल्कि स्वयं परब्रह्म — सर्वोच्च सत्य — मानता था।
यह संप्रदाय प्रारंभिक मध्यकाल से साफ़ दिखाई देता है। कुछ क्षेत्रों में इसका काफ़ी प्रभाव रहा, लेकिन बाद में यह धीरे-धीरे कम होता गया। उसके उदय और चरम-प्रभाव की तारीख़ पर विद्वान एकमत नहीं। "सबसे पहले गणेश" वाली प्रथा को फैलाने में उसका हाथ रहा, पर वह अकेला कारण नहीं।
इसी परंपरा का एक पाठ है गणपति अथर्वशीर्ष — "त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रः…"। इसे उपनिषद की तरह पढ़ा जाता है, पर यह लगभग सोलहवीं-सत्रहवीं सदी की रचना है, कोई प्राचीन उपनिषद नहीं।
दो पुराण, आठ अवतार
पूरे पुराण-साहित्य में सिर्फ़ दो पुराण अकेले गणेश को समर्पित हैं — गणेश पुराण और मुद्गल पुराण। दोनों उपपुराण हैं।
मुद्गल पुराण गणेश के आठ अवतार बताता है, और हर अवतार एक भीतरी दोष का नाश करता है — ईर्ष्या, अहंकार, मोह, लोभ, क्रोध, काम, आसक्ति, और अहंता।
यानी बाहर के असुर भीतर के दोष बन जाते हैं।
आठ मंदिर, एक चक्कर
महाराष्ट्र में गणेश के आठ स्वयंभू मंदिर हैं — मोरगाँव, थेऊर, सिद्धटेक, रांजणगाँव, ओझर, लेण्याद्री, महड़, पाली — और इनकी यात्रा अष्टविनायक कहलाती है।
ध्यान रहे, यह "आठ" मुद्गल पुराण के आठ अवतारों से अलग है — सिर्फ़ संख्या एक जैसी है।
और वह ऋग्वेद की ऋचा, "गणानां त्वा गणपतिं" — गणपत्य उसे अपना मूल मानते हैं, पर वह मूल रूप से बृहस्पति की है। यह गाथा दोनों बातें साथ रखती है।
टिप्पणी: गणपत्य परंपराएँ गणेश को परब्रह्म मानती थीं; प्रारंभिक मध्यकाल से स्पष्ट रूप से मिलती हैं, पर उनके उदय और चरम-प्रभाव की तारीख़ पर विद्वानों में मतभेद है। हर पूजा में गणेश को पहले स्मरण करने की प्रथा को अकेले इसी संप्रदाय से जोड़ना ठीक नहीं। गणेश पुराण और मुद्गल पुराण — दोनों उपपुराण — ही अकेले गणेश को समर्पित हैं। मुद्गल पुराण के आठ अवतार आठ भीतरी दोषों (मत्सर, मद, मोह, लोभ, क्रोध, काम, ममता, अहंकार) का नाश करते हैं। गणपति अथर्वशीर्ष लगभग सोलहवीं-सत्रहवीं सदी की रचना है। महाराष्ट्र की अष्टविनायक यात्रा (मोरगाँव आदि आठ स्वयंभू मंदिर) मुद्गल पुराण के आठ अवतारों से अलग बात है। ऋग्वेद (२.२३.१) की "गणपति" ऋचा वहाँ ब्रह्मणस्पति के लिए है।
स्रोत: कई ग्रंथों से, गणपति — सबसे पहले क्यों