
अध्याय ३
सिर — हाथी का क्यों
बेटे ने बाप को रोका, सिर गया, और उत्तर से एक हाथी का सिर लाया गया
दरवाज़े पर बेटा
शिव लौटे। द्वार पर एक बालक खड़ा था जिसे उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था।
"हटो," शिव ने कहा। "यह मेरा घर है।"
"माँ ने कहा है, किसी को भीतर मत आने देना।" बालक ने लाठी आड़ी कर ली।
शिव के गण आगे बढ़े — बालक ने सबको पीछे धकेल दिया। विष्णु आए, इंद्र आए — कोई उस द्वार को पार नहीं कर सका। शिव का धैर्य टूट गया। उन्होंने त्रिशूल उठाया, और एक वार में बालक का सिर धड़ से अलग कर दिया।
भीतर से पार्वती निकलीं। जो उन्होंने देखा, उसके बाद उनका क्रोध ऐसा था कि सृष्टि काँप उठी। "इसे जीवित करो," उन्होंने कहा। "वरना मैं सब कुछ मिटा दूँगी।"
उत्तर की ओर सिर किए
शिव ने गणों को आदेश दिया — "उत्तर की ओर जाओ। जो पहला जीव उत्तर की ओर सिर करके सोता मिले, उसका सिर ले आओ।"
उत्तर शुभ दिशा है — देवताओं की दिशा।
गणों को एक हाथी मिला। कोई कथा उसे ऐरावत कहती है, कोई ऐरावत का बच्चा, कोई गजासुर नाम का हाथी-रूप वाला असुर जिसे शिव पहले ही मार चुके थे। उसका सिर काटकर लाया गया।
शिव ने वह सिर धड़ पर रखा और प्राण लौटा दिए। बालक उठ बैठा — अब हाथी के मुख के साथ।
या फिर, शनि की नज़र
ब्रह्मवैवर्त पुराण की कथा अलग है। वहाँ सिर त्रिशूल से नहीं जाता।
शिशु के जन्म पर देवता उसे देखने आए। शनि भी आए, पर उन्होंने नज़र नीची रखी। "मेरी दृष्टि शापित है," उन्होंने कहा। "मैं जिसे सीधे देख लूँ, वह भस्म हो जाता है। मैं इस बच्चे को नहीं देखूँगा।"
पार्वती ज़िद पर अड़ गईं — "मेरे बेटे को देखो।" शनि ने आँख उठाई। शिशु का सिर वहीं जलकर उड़ गया, गोलोक की ओर।
तब विष्णु गरुड़ पर सवार होकर उत्तर गए, एक हाथी का सिर लेकर लौटे, और उसे धड़ पर जोड़ दिया।
गणों का ईश
शिव पुराण की इस कथा में, अंत यहाँ आता है।
बालक जीवित हुआ, हाथी के सिर के साथ, और शिव ने उसे अपने गणों का स्वामी बना दिया — गणेश, गणपति। "गण" यानी शिव का दल, "ईश" यानी स्वामी।
और एक वरदान भी मिला — कि किसी भी पूजा में, किसी भी काम से पहले, सबसे पहले उसी का नाम लिया जाएगा।
जो द्वार पर रोका गया था, वही अब हर द्वार खोलने वाला बन गया।
टिप्पणी: सिर कटने और हाथी का सिर लगने की दो बड़ी कथाएँ हैं। शिव पुराण: शिव ने अनजाने में त्रिशूल से बालक का सिर काटा; गण उत्तर से एक हाथी का सिर लाए (कौन-सा हाथी — अनाम, ऐरावत, या गजासुर — इस पर पाठ अलग-अलग हैं)। ब्रह्मवैवर्त पुराण: शनि की शापित दृष्टि से सिर जला, और विष्णु गरुड़ पर उत्तर से हाथी का सिर लाए। वराह पुराण में सिर कटता ही नहीं — वहाँ शिव अपने तेज से एक बहुत सुंदर युवक बनाते हैं, और बाक़ी देवताओं की ईर्ष्या/भय देखकर ख़ुद उसे तोंद और हाथी का मुख दे देते हैं। ध्यान रहे: गजासुर (हाथी-रूप वाला शिव-भक्त असुर, जिसका सिर कुछ कथाओं में गणेश को लगता है) और गजमुखासुर (वह असुर जिससे गणेश आगे लड़ते हैं, अध्याय ७) दो अलग पात्र हैं।
स्रोत: कई ग्रंथों से, सिर — हाथी का क्यों