
अध्याय २
जन्म — और उसकी कई कहानियाँ
एक शिशु, और उसके जन्म की कम-से-कम चार अलग कहानियाँ
उबटन से बना बेटा
शिव पुराण की कथा सबसे ज़्यादा सुनाई जाती है। पार्वती स्नान करने जा रही थीं, और नंदी बाहर पहरे पर था — पर नंदी शिव का था, शिव को कभी रोकता नहीं।
तो पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से — हल्दी और तेल के लेप से — एक बालक की आकृति बनाई, और उसमें प्राण फूँक दिए।
"यह द्वार," उन्होंने कहा, बालक को दहलीज़ पर बिठाते हुए। "जब तक मैं न कहूँ, किसी को भीतर मत आने देना। किसी को भी।"
बालक ने सिर हिलाया। उसके हाथ में एक छोटी लाठी थी।
या फिर, शिव ने बनाया
लिंग पुराण कुछ और कहता है। वहाँ गणेश को शिव बनाते हैं — देवताओं की प्रार्थना पर।
देवता चाहते थे कि कोई ऐसा हो जो अधर्मियों की राह में बाधा डाले और धर्मियों की बाधा हटाए। शिव ने अपने से एक तेजस्वी रूप प्रकट किया, और वही काम उसे सौंप दिया।
मत्स्य पुराण और शिव पुराण का एक और अंश तीसरी बात कहता है — कि गणेश को शिव और पार्वती ने साथ मिलकर बनाया।
एक ही जन्म, और तीन अलग-अलग कर्ता।
विष्णु का वरदान
ब्रह्मवैवर्त पुराण की कथा सबसे अलग है। वहाँ शिव के कहने पर पार्वती एक पूरे साल का व्रत रखती हैं — पुण्यक व्रत — विष्णु को प्रसन्न करने के लिए, ताकि उन्हें पुत्र मिले।
व्रत पूरा होने पर विष्णु प्रकट होते हैं। "मैं हर कल्प में तुम्हारे पुत्र के रूप में जन्म लूँगा," वे कहते हैं।
और तब गणेश जन्म लेते हैं — एक सुंदर शिशु के रूप में। ख़बर फैलती है, और देवता उसे देखने चल पड़ते हैं।
यह वही देखने-आने वाली भीड़ है जो अगले अध्याय में एक भयानक मोड़ लाएगी।
एक बात जो हर कहानी में है
चारों कहानियाँ अलग हैं। सिर्फ़ यह नहीं कि गणेश को किसने बनाया, बल्कि यह भी कि वे क्यों प्रकट हुए।
शिव पुराण में वे पार्वती के द्वारपाल हैं। लिंग पुराण में विघ्न डालने और हटाने वाली शक्ति। ब्रह्मवैवर्त पुराण में वे पार्वती की पुत्र-कामना का उत्तर हैं।
यानी एक ही देवता, लेकिन जन्म के पीछे अलग-अलग कारण।
टिप्पणी: गणेश के जन्म की कई असंगत कथाएँ हैं। शिव पुराण (रुद्रसंहिता): पार्वती ने अकेले, अपने शरीर के उबटन से बनाया। लिंग पुराण: शिव ने, देवताओं की प्रार्थना पर, बाधा डालने और हटाने वाले के रूप में। मत्स्य पुराण (१५४) और शिव पुराण का एक अंश: शिव और पार्वती ने साथ। ब्रह्मवैवर्त पुराण: पार्वती के पुण्यक व्रत के बाद विष्णु ने वरदान दिया कि वे हर कल्प में उनके पुत्र होंगे। वराह पुराण में एक और रूप है जहाँ हाथी का सिर जन्म से ही है (देखें अगला अध्याय)। यहाँ किसी एक को "सही" नहीं ठहराया गया।
स्रोत: कई ग्रंथों से, जन्म — और उसकी कई कहानियाँ