
अध्याय ७
गजमुखासुर और मूषक
एक असुर जिसे हथियार नहीं मार सकते थे, और एक शापित गंधर्व — दोनों का अंत एक ही जगह हुआ
इंद्र की सभा में एक ग़लत क़दम
गणेश पुराण में क्रौंच नाम का एक गंधर्व था। इंद्र की सभा में बुलाए जाने पर वह जल्दबाज़ी में आगे बढ़ा और एक ऋषि के पैर पर पैर रख दिया।
ऋषि ने क्रोध में शाप दे दिया — "जा, चूहा बन जा।"
क्रौंच वहीं एक विशाल चूहे में बदल गया।
पराशर के आश्रम में
चूहा बनकर वह ऋषि पराशर के आश्रम में जा पहुँचा, जहाँ बालक गणेश उन दिनों रह रहे थे।
वह चूहा साधारण नहीं था। उसने खेत उजाड़े, पेड़ गिराए, आश्रम की हर चीज़ कुतर डाली।
गणेश ने अपना पाश — रस्सी वाला फंदा — घुमाकर फेंका। फंदा चूहे के गले में जा पड़ा। चूहा खिंचता हुआ सामने आ गिरा और हार मान गया। पर जब गणेश उस पर सवार हुए, तो वह उनका भार सह नहीं पाया और उनसे हल्का होने की विनती करने लगा। गणेश ने अपना आकार समेटा, और वही वश में आया चूहा उनका वाहन बना।
जिसे हथियार नहीं मार सकता
एक और कथा गजमुखासुर की है — एक असुर जिसे वरदान था कि कोई हथियार उसे नहीं मार सकता।
गणेश उससे भिड़े। जब कोई अस्त्र काम नहीं आया, तो उन्होंने अपना एक दाँत तोड़कर उसी को अस्त्र की तरह उस पर दे मारा।
गजमुखासुर हार गया, और गणेश ने उसे भी एक चूहे में बदलकर अपना वाहन बना लिया।
सबसे बड़ा, सबसे छोटे पर
दोनों कथाएँ अलग हैं, पर अंत एक ही — गणेश का वाहन एक चूहा है।
और इसमें एक बात है। चूहा वह है जो चुपचाप कुतरता रहता है — इच्छा, बेचैन मन, अहंकार। सबसे बड़ा देवता सबसे छोटी चीज़ पर सवार होता है, और वह छोटी चीज़ उसे उठाए रखती है।
टिप्पणी: चूहे के दो अलग मूल बताए जाते हैं। गणेश पुराण: गंधर्व क्रौंच ने एक ऋषि (परंपरा में वामदेव) के पैर पर पैर रखा और शाप से चूहा बना; आगे वह पराशर के आश्रम में उत्पात मचाता है जहाँ गणेश उसे पाश से वश में करते हैं। दूसरी कथा: गजमुखासुर नाम का अवध्य असुर, जिसे गणेश अपना टूटा दाँत फेंककर हराते हैं और चूहे में बदल देते हैं। दोनों का अंत एक ही — चूहा वाहन बनता है। ऋषि का नाम इस जाँच में पक्के तौर पर नहीं मिला।
स्रोत: कई ग्रंथों से, गजमुखासुर और मूषक