
अध्याय १
विनायक — पहले जो रोकता था
जिस देवता को आज सबसे पहले पूजते हैं, कभी उसे दूर रखने के लिए पूजा होती थी
एक अलग तरह की प्रार्थना
घर के मुखिया को कई रातों से नींद नहीं आ रही थी। सपनों में उसे गंजे सिर वाले लोग दिखते, ऊँट दिखते, पानी में डूबता हुआ ख़ुद को देखता। बेटा दुबला पड़ता जा रहा था, काम बनते-बनते बिगड़ जाते।
पुरोहित ने कारण बताया — विनायक। "ये चार हैं," उसने कहा। "शालकटंकट, कूष्माण्डराजपुत्र, उस्मित, देवयजन। ये किसी पर सवार हो जाते हैं, और फिर हर काम में अड़चन डालते हैं।"
फिर उसने विधि बताई — वही जो मानव गृह्यसूत्र में लिखी है। चौराहे पर, या घर की देहरी पर, रात में भोजन रखो — चावल, मांस, फूल, एक दीपक। स्नान कराओ, अर्पण करो, और प्रार्थना करो कि ये चले जाएँ।
यह प्रार्थना किसी को पाने के लिए नहीं थी। यह किसी से छूटने के लिए थी।
याज्ञवल्क्य का पन्ना
बरसों बाद, याज्ञवल्क्य स्मृति में तस्वीर बदली हुई है।
अब एक अकेला विनायक सामने है — गणपति — जिसे रुद्र और ब्रह्मा गणों का अधिपति बनाते हैं। अनुष्ठान में आगे और नाम भी आते हैं, पर ज़ोर अब एक देवता पर है।
पन्ने पर विनायक-ग्रस्त होने के लक्षण गिनाए गए हैं: बुरे सपने, ऐसा लगना कि कोई पीछे-पीछे चल रहा है, बनते काम का टूट जाना।
पर एक बात साफ़ हो चुकी है। जो विनायक कभी एक उपद्रवी शक्ति के रूप में दिखाई देता था, वह अब देवताओं की कतार में आ चुका है।
उदयगिरि की दीवार
मध्य प्रदेश में, विदिशा के पास, उदयगिरि की गुफाओं में एक मूर्ति है — पाँचवीं सदी की, गुप्तकाल की। यह हाथी के सिर वाले देवता की सबसे पुरानी पक्की तारीख़ वाली मूर्ति मानी जाती है।
उसी गुफा-समूह में सप्त मातृकाओं — सात देवियों — का शिल्प भी है, जिनके साथ शुरुआती गणेश-कला बार-बार जुड़ी मिलती है।
भरहुत के पास भूमरा के मंदिर में भी उसी सदी की एक महत्त्वपूर्ण गणेश-मूर्ति है — गोल पेट, एक दाँत, हाथ में अंकुश और पाश, गोद में मिठाई का कटोरा।
चौथी-पाँचवीं सदी तक वह देवता बन चुका है जिसे हम पहचानते हैं।
जो रोकता था, वही राह खोलता है
आज हर पूजा उन्हीं के नाम से शुरू होती है। हर नए काम से पहले उन्हीं को याद किया जाता है — विघ्नहर्ता, बाधाओं को हटाने वाला।
जो चीज़ कभी बाधा डालती थी, वही अब बाधा हटाती है। पूरी की पूरी दिशा उलट गई।
एक बात और। पूजा से पहले लोग ऋग्वेद की एक ऋचा पढ़ते हैं — "गणानां त्वा गणपतिं हवामहे"। पर ऋग्वेद में वह पंक्ति गणेश को नहीं, बृहस्पति को संबोधित है।
बाद की परंपरा ने उसे गणेश की ऋचा मान लिया। इतिहासकार नहीं मानते। यह गाथा दोनों बातें दर्ज करती है।
टिप्पणी: विनायकों का सबसे पहला उल्लेख मानव गृह्यसूत्र (२.१४) में है, जहाँ वे चार उपद्रवी आत्माएँ हैं जिनसे छूटने के लिए अनुष्ठान बताया गया है। याज्ञवल्क्य स्मृति (लगभग तीसरी-पाँचवीं सदी) में एक अकेले विनायक को — गणपति — रुद्र और ब्रह्मा गणों का अधिपति बनाते हैं (उसी अनुष्ठान में आगे छह नाम भी आते हैं); यहीं वह मोड़ दिखता है जहाँ एक दानव देवता बनता है। हाथी के सिर वाले सौम्य देवता की सबसे पुरानी पक्की तारीख़ वाली मूर्तियाँ गुप्तकाल की हैं — उदयगिरि गुफा ६ (जहाँ सप्तमातृका-शिल्प भी है) और भूमरा मंदिर, दोनों पाँचवीं सदी। ऋग्वेद (२.२३.१) की "गणपति" वाली ऋचा वहाँ ब्रह्मणस्पति के लिए है (जिसे बाद की परंपरा बृहस्पति से जोड़ती है); बाद की गणेश-पूजा ने उसे अपना लिया, विद्वान इसे बाद का जोड़ मानते हैं। कुछ विद्वान गणेश को प्रारंभिक अनुष्ठानिक साहित्य के विनायक-विघ्नकारी रूप, हाथी-मुख यक्ष और मातृका-संदर्भ के मेल से बना मानते हैं — यह बहस अब भी चलती है।
स्रोत: कई ग्रंथों से, विनायक — पहले जो रोकता था