अध्याय ९

हाथी वाला देवता, दुनिया भर में

वे व्यापारियों के साथ चले — बौद्ध धर्म में, दक्षिण-पूर्व एशिया में, और जापान तक

व्यापारियों का देवता

गणेश भारत से बाहर उन्हीं रास्तों से पहुँचे जिनसे संस्कृत, मंदिर-संस्कृति और हिंदू-बौद्ध पूजा एशिया में फैली — व्यापार, राजकीय संरक्षण, और शैव तथा बौद्ध संजाल, सब मिलाकर।

इनमें व्यापारी एक बड़ा माध्यम थे। लगभग दसवीं सदी से गणेश ख़ास तौर पर व्यापारियों और सार्थवाहों के देवता माने जाने लगे, और जहाँ भारतीय व्यापारी गए, गणेश साथ गए।

दक्षिण-पूर्व एशिया

छठी-सातवीं सदी तक गणेश दक्षिण-पूर्व एशिया के कई हिस्सों में दिखाई देने लगते हैं। पहले फुनान और चेनला में, फिर श्रीविजय और खमेर साम्राज्य के साथ। चंपा (वियतनाम), जावा, बाली और म्यांमार में भी उनकी मूर्तियाँ और अभिलेख मिलते हैं।

अक्सर वे मंदिर के पिछले हिस्से में या ख़तरनाक जगहों — घाटियों, चौराहों — पर रखे जाते थे, ताकि वहाँ से गुज़रने वालों की बाधा हटे।

थाईलैंड में आज भी उनकी पूजा होती है — फ्रा फिकानेत के नाम से, कला और व्यापार के देवता के रूप में।

बौद्ध धर्म में

बौद्ध कला में गणेश दो बिल्कुल विपरीत भूमिकाओं में दिखाई देते हैं — एक बाधा जिसे वश में करना है, और एक रक्षक।

तिब्बती बौद्ध धर्म में एक लाल रंग के गणपति हैं जो धन के देवता हैं; और एक रूप ऐसा भी जहाँ वे विघ्नांतक के पैरों तले दबे दिखते हैं — बाधा को कुचला जाता हुआ।

जापान में, एक जोड़ा

जापान में गणेश कांगितेन या शोतेन कहलाते हैं। वे आठवीं-नौवीं सदी में जापान पहुँचे, चीन से आई गुह्य बौद्ध परंपरा के साथ — शिंगोन और तेंदाई संप्रदाय। शिंगोन को जापान में स्थापित करने वाले कूकाई थे। उनकी निर्णायक गुह्य दीक्षा चीन के चांगआन नगर में आचार्य हुईगुओ से हुई। वहीं उनका संपर्क गांधार के एक संस्कृत-विद्वान भिक्षु, प्रज्ञा, से भी हुआ।

जापानी कांगितेन का सबसे ख़ास रूप एक जोड़ा है — हाथी के सिर वाले दो आकृतियाँ, आमने-सामने, एक-दूसरे को आलिंगन में लिए। आज भी लगभग २५० मंदिरों में उनकी पूजा होती है, अक्सर छिपाकर रखी मूर्तियों के साथ — सुख, समृद्धि और कठिन मनोकामनाओं के देवता। जैन परंपरा में भी नौवीं सदी से गणेश की पूजा मिलती है, ख़ासकर राजस्थान और गुजरात में।

टिप्पणी: गणेश भारत से बाहर व्यापार, राजकीय संरक्षण, और शैव तथा बौद्ध संजाल के मिले-जुले रास्तों से फैले। दक्षिण-पूर्व एशिया में छठी-सातवीं सदी तक उनकी मूर्तियाँ और अभिलेख मिलने लगते हैं — फुनान, चेनला, श्रीविजय, खमेर साम्राज्य, चंपा, जावा, बाली और म्यांमार में; थाईलैंड में आज भी वे फ्रा फिकानेत के नाम से पूजे जाते हैं। बौद्ध कला में वे दो विपरीत भूमिकाओं में मिलते हैं — कहीं वश में की जाने वाली बाधा, कहीं ख़ुद रक्षक और धन-देवता (तिब्बत का महारक्त गणपति)। जापान में वे कांगितेन या शोतेन कहलाते हैं — आठवीं-नौवीं सदी में चीन से पहुँची शिंगोन-तेंदाई गुह्य बौद्ध परंपरा के साथ, जिसे कूकाई ने स्थापित किया; उनकी दीक्षा चांगआन में आचार्य हुईगुओ से हुई थी, प्रज्ञा से केवल संपर्क। जैन परंपरा में भी नौवीं सदी से, ख़ासकर राजस्थान और गुजरात में, गणेश-पूजा मिलती है।

स्रोत: कई ग्रंथों से, हाथी वाला देवता, दुनिया भर में

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

लगभग दसवीं सदी से गणेश ख़ास तौर पर किनके देवता माने जाने लगे?

  • राजाओं और योद्धाओं के
  • व्यापारियों और सार्थवाहों के
  • किसानों के
  • नाविकों के अकेले
पूरी कथा पढ़िए — व्यापारियों का देवता

बाधा हटाने वाला देवता स्वाभाविक रूप से उनका देवता बना जिनकी राह में सबसे ज़्यादा बाधाएँ थीं — व्यापारी।

जहाँ भारतीय व्यापारी गए, गणेश साथ गए — दुकान में, कारवाँ में, बंदरगाह पर।

व्यापारी-संजाल गणेश के आगे फैलाव का एक बाद का माध्यम थे, पर जापान में आठवीं-नौवीं सदी के कांगितेन को इससे नहीं समझाया जा सकता; वहाँ यह रूप चीन के रास्ते गुह्य बौद्ध परंपरा से पहुँचा।

तथ्य

दक्षिण-पूर्व एशिया में गणेश की मूर्तियाँ और अभिलेख कब तक मिलने लगते हैं?

  • उन्नीसवीं सदी तक
  • छठी-सातवीं सदी तक
  • पंद्रहवीं सदी तक
  • वे वहाँ कभी नहीं पहुँचे
पूरी कथा पढ़िए — समुद्र पार, जल्दी

गणेश की छवियाँ कंबोडिया, आज के वियतनाम (चंपा), जावा, बाली और म्यांमार में बहुत पहले दिखने लगती हैं।

वे उन्हीं संपर्क-जालों के साथ फैले जिनसे संस्कृत, मंदिर-संस्कृति और हिंदू-बौद्ध पूजा एशिया में गई।

स्थान और काल के साथ उनकी भूमिका बदलती रही — कहीं शैव देवता, कहीं रक्षक, कहीं विद्या और राजकीय शक्ति से जुड़े।

क्या हुआ?

दक्षिण-पूर्व एशिया के मंदिरों में गणेश की मूर्ति अक्सर कहाँ रखी जाती थी?

  • गर्भगृह के ठीक बीच में
  • मंदिर की चोटी पर
  • मंदिर के बाहर, नदी में
  • मंदिर के पिछले हिस्से में, या घाटियों और चौराहों जैसी ख़तरनाक जगहों पर
पूरी कथा पढ़िए — राह की रखवाली

गणेश को अक्सर वहाँ रखा जाता था जहाँ से लोग गुज़रते हैं — दरवाज़े के पास, रास्ते के मोड़ पर, पहाड़ी दर्रे पर।

मक़सद वही था जो भारत में — गुज़रने वालों की बाधा हटे।

यानी विदेश में भी उनकी पहचान "विघ्नहर्ता" की ही रही।

तथ्य

थाईलैंड में गणेश आज किस नाम से पूजे जाते हैं?

  • फ्रा फिकानेत
  • गणपति महाराज
  • शोतेन
  • विनायकर
पूरी कथा पढ़िए — बैंकॉक का गणेश

थाईलैंड में गणेश की पूजा जीवित परंपरा है — शॉपिंग मॉल के बाहर मंदिर, फ़िल्म-स्टूडियो में मूर्ति, बैंकॉक के सेंट्रल वर्ल्ड के पास एक बड़ा मंदिर।

वहाँ वे ख़ास तौर पर कला, नृत्य, संगीत और व्यापार से जुड़े हैं।

यह दिखाता है कि गणेश सिर्फ़ पुरानी मूर्तियों में नहीं — वे आज भी दक्षिण-पूर्व एशिया के जीवन में हैं।

कौन हूँ मैं?

जापान में मैं कांगितेन या शोतेन कहलाता हूँ, और मेरा सबसे ख़ास रूप एक जोड़ा है — हाथी के सिर वाली दो आकृतियाँ, एक-दूसरे को आलिंगन में लिए। मैं कौन हूँ?

  • हनुमान
  • नरसिंह
  • गणेश
  • ऐरावत
पूरी कथा पढ़िए — जापान का गणेश

कांगितेन आठवीं-नौवीं सदी में जापान पहुँचे, गुह्य (एसोटेरिक) बौद्ध परंपरा के साथ।

उनका आलिंगनबद्ध युगल-रूप जापानी परंपरा का अपना विकास है — इसे विरोधों के मेल का प्रतीक माना जाता है।

आज भी लगभग २५० मंदिरों में उनकी पूजा होती है, अक्सर छिपाकर रखी मूर्तियों के साथ — समृद्धि, सांसारिक सफलता और कठिन मनोकामनाओं के देवता।

तथ्य

कांगितेन जापान किसके ज़रिए पहुँचे?

  • सीधे भारत से आए व्यापारियों के ज़रिए
  • चीन से पहुँची शिंगोन-तेंदाई गुह्य बौद्ध परंपरा के साथ; इसे जापान में स्थापित करने वाले कूकाई थे
  • पुर्तगाली नाविकों के ज़रिए
  • कोरिया के रास्ते, बिना बौद्ध धर्म के
पूरी कथा पढ़िए — चीन होकर जापान

गुह्य बौद्ध धर्म पहले चीन पहुँचा, फिर वहाँ से जापान।

कूकाई (कोबो दाइशी) ने जापान में शिंगोन संप्रदाय की नींव रखी।

कांगितेन जापानी बौद्ध धर्म में समाहित कई भारतीय मूल के देवताओं में से एक हैं; उनकी विशेषता वहाँ विकसित हुआ गुप्त, आलिंगनबद्ध हाथी-मुख युगल-रूप है।

ग्रंथ असहमत

कूकाई की निर्णायक गुह्य बौद्ध दीक्षा किससे हुई?

  • गांधार के भिक्षु प्रज्ञा से
  • सीधे बुद्ध से स्वप्न में
  • नालंदा में
  • चांगआन में आचार्य हुईगुओ से
पूरी कथा पढ़िए — एक बारीक़, ज़रूरी फ़र्क़

लोकप्रिय कथन में अक्सर कहा जाता है कि कूकाई ने यह विद्या "गांधार के प्रज्ञा से" पाई।

पर इतिहास के अनुसार उनकी निर्णायक दीक्षा चांगआन (आज का शीआन) में आचार्य हुईगुओ से हुई।

प्रज्ञा उन संस्कृत-विद्वान भिक्षुओं में थे जिनसे कूकाई का संपर्क हुआ — इससे कम, इससे ज़्यादा नहीं। यह गाथा यह फ़र्क़ साफ़ रखती है।

क्या हुआ?

बौद्ध कला में गणेश किन दो उलटी भूमिकाओं में दिखते हैं?

  • राजा और भिखारी
  • शिक्षक और शिष्य
  • एक बाधा जिसे वश में करना है, और एक रक्षक
  • सूर्य और चंद्र
पूरी कथा पढ़िए — बाधा भी, रक्षक भी

बौद्ध परंपरा में गणेश (विनायक) दोनों तरफ़ खड़े दिखते हैं।

कहीं वे वह बाधा हैं जिसे कोई बोधिसत्व या रक्षक-देवता वश में करता है — तिब्बत में विघ्नांतक के पैरों तले दबा रूप।

और कहीं वे ख़ुद रक्षक और धन-देवता हैं — तिब्बत का लाल महारक्त गणपति।

बाद की परंपरा

उपलब्ध प्रमाणों में जैन कला और पूजा में गणेश लगभग कब से दिखाई देने लगते हैं?

  • प्रारंभिक मध्यकाल से, जिनमें कई उदाहरण लगभग नौवीं सदी के माने जाते हैं, विशेषकर पश्चिमी भारत में
  • कभी नहीं
  • महावीर के समय से
  • सिर्फ़ बीसवीं सदी से
पूरी कथा पढ़िए — जैन कला में गणेश

प्रारंभिक मध्यकाल के प्रमाणों में — कई लगभग नौवीं सदी के — पश्चिमी भारत की जैन कला और पूजा में गणेश एक शुभ, रक्षक देवता के रूप में जगह बना लेते हैं।

हेमचंद्र जैसे जैन आचार्यों के कोशों में उनके नाम गिनाए गए हैं।

पर वहाँ उनका दर्जा हिंदू गणपत्य परंपरा जैसा नहीं — वे परब्रह्म नहीं, एक सहायक देवता हैं।

ऐसा क्यों?

गणेश इतनी दूर तक — जापान तक — कैसे पहुँचे?

  • एक अकेले व्यापारी मार्ग से
  • सिर्फ़ बौद्ध भिक्षुओं के ज़रिए
  • वे कभी पहुँचे ही नहीं, यह एक अलग देवता है
  • व्यापार, राजकीय संरक्षण, और शैव तथा बौद्ध संजाल
पूरी कथा पढ़िए — कई रास्ते, एक देवता

गणेश का एशिया-भर में फैलाव किसी एक चीज़ से नहीं समझाया जा सकता।

व्यापारी उन्हें साथ ले गए; राजा उन्हें अपने मंदिरों में लाए; शैव और बौद्ध, दोनों परंपराओं ने उन्हें अपनाया।

इसीलिए आज गणेश की मूर्ति भारत से लेकर जावा, तिब्बत और जापान तक मिलती है — हर जगह थोड़ी अलग, पर पहचान में वही।