
अध्याय ८
अहिरावण
विभीषण भीतर आए, सबको सुला गए — और वे विभीषण थे ही नहीं
रात में एक जाना-पहचाना चेहरा
युद्ध के बीच की एक रात थी। राम और लक्ष्मण सो रहे थे, और चारों तरफ़ वानरों का पहरा था।
तभी विभीषण भीतर आए।
पहरेदारों ने उन्हें रोका नहीं — क्यों रोकते? वे अपने थे।
पर जो भीतर गया, वह विभीषण नहीं था। वह अहिरावण था, रावण का भाई, जो पाताल का राजा था और माया जानता था।
उसने एक मंत्र पढ़ा, और पूरी वानर सेना पर नींद उतर आई — गहरी, बेहोशी जैसी। पहरेदार वहीं गिर पड़े जहाँ खड़े थे।
फिर उसने सोते हुए राम और लक्ष्मण को उठाया, और धरती के भीतर उतर गया।
सुबह, दो ख़ाली जगहें
सुबह हनुमान की आँख खुली।
सब जगह वानर पड़े हुए थे, धीरे-धीरे जागते हुए। और बीच में दो जगहें ख़ाली थीं।
विभीषण दौड़ते हुए आए — असली विभीषण।
"यह मैं नहीं था," उन्होंने कहा। "यह मेरा भाई अहिरावण है। वह उन्हें पाताल ले गया है, और वहाँ वह उनकी बलि देगा — अपनी देवी के सामने।"
हनुमान ने कुछ पूछा नहीं। बस एक बात पूछी: "रास्ता किधर है?"
पाताल के द्वार पर, एक पहरेदार
पाताल के द्वार पर एक वानर खड़ा था — आधा वानर, आधा मछली।
"आगे नहीं जा सकते," उसने कहा।
"हट जाओ," हनुमान बोले।
"नहीं हट सकता। मैं यहाँ का पहरेदार हूँ। मेरा नाम मकरध्वज है।"
वे भिड़ गए। और लड़ते-लड़ते हनुमान को कुछ अजीब लगा — लड़का हार नहीं रहा था।
"तुम्हारा पिता कौन है?"
"मेरे पिता का नाम हनुमान है," वह बोला। "मैंने उन्हें कभी देखा नहीं। कहते हैं, लंका जलाकर जब वे समुद्र में पसीना बुझा रहे थे, तब उनके पसीने की एक बूँद एक मछली ने निगल ली — और मैं उससे हुआ।"
हनुमान चुप रह गए।
पाँच दीये, पाँच दिशाएँ
भीतर, अहिरावण ने राम और लक्ष्मण को देवी के सामने बिठा रखा था। बलि की तैयारी हो चुकी थी।
हनुमान ने चारों तरफ़ देखा और समझ गए कि असली ताला कहाँ है।
पाँच दीये जल रहे थे — पाँच अलग-अलग दिशाओं में। और अहिरावण की जान उन्हीं में थी। एक साथ पाँचों बुझें, तभी वह मरेगा। एक भी बचा, तो वह फिर खड़ा हो जाएगा।
पाँच दीये, पाँच दिशाएँ, और एक शरीर।
पाँच मुँह
तब हनुमान ने वह रूप धरा जो उन्होंने न पहले धरा था, न बाद में।
पाँच मुँह — एक अपना, और चार और: नरसिंह, गरुड़, वराह और हयग्रीव। हर मुँह एक दिशा की तरफ़।
और पाँचों ने एक ही पल में, एक साथ, पाँचों दीये बुझा दिए।
अहिरावण गिर पड़ा।
दो कंधे, दो सवारियाँ
हनुमान ने बंधन खोले। राम एक कंधे पर बैठे, लक्ष्मण दूसरे पर।
बाहर निकलते हुए उन्होंने मकरध्वज को वहीं खड़ा देखा।
राम ने कहा, "यह अब पाताल का राजा रहेगा।"
और हनुमान ने पहली और आख़िरी बार अपने बेटे की तरफ़ देखा, कुछ कहा नहीं, और ऊपर की तरफ़ चल दिए।
टिप्पणी: यह पूरा अध्याय वाल्मीकि रामायण से बाहर का है। अहिरावण — या महिरावण — पाताल, मकरध्वज और पंचमुखी रूप, इनमें से कुछ भी वाल्मीकि में नहीं मिलता। यह कथा पंद्रहवीं सदी की बंगाली कृत्तिवास रामायण में मिलती है, और आनंद रामायण, भावार्थ रामायण तथा पराशर संहिता जैसे बाद के ग्रंथों में भी बताई जाती है। नाम को लेकर परंपराएँ आपस में सहमत नहीं हैं, और यहाँ दोनों नाम दर्ज हैं। पंचमुखी हनुमान की जो मूर्तियाँ और चित्र आज सबसे आम हैं, उनकी जड़ इसी कथा में है — यानी हनुमान का सबसे असाधारण दिखने वाला रूप मूल रामायण से नहीं आता।
स्रोत: कई ग्रंथों से, अहिरावण