
अध्याय १
अंजना का बेटा
एक श्राप से जो बच्चा जन्मा, उसी को इंद्र ने पहले दिन घायल कर दिया
शाप में एक शर्त छुपी थी
अंजना पहले वानर नहीं थीं। वे स्वर्ग की अप्सरा पुंजिकस्थला थीं, और एक ऋषि की तपस्या भंग करने की भूल कर बैठी थीं। ऋषि ने शाप दिया — वानरी बनकर जन्म लो।
पर हर शाप की तरह इसमें भी एक रास्ता छोड़ा गया था: "जब तुम्हारे गर्भ से ऐसा पुत्र जन्मेगा जो स्वयं शिव का अंश हो, तभी यह रूप छूटेगा।"
अंजना वानरी बनीं, वानर केसरी से ब्याहीं, और फिर पर्वत की चोटी पर जाकर तपस्या में बैठ गईं — शाप की शर्त पूरी करने के लिए नहीं, बल्कि उस पुत्र के लिए जो उन्हें चाहिए था।
"मुझे पुत्र चाहिए," वे वायुदेव से बोलीं, जो उसी पर्वत पर बहा करते थे, "ऐसा जो कभी हारे नहीं।"
वायु ने वचन दिया
वायुदेव रुक गए। "तुम्हारा तप व्यर्थ नहीं जाएगा। जो पुत्र तुम्हें मिलेगा, वह मेरा भी होगा — बल में मुझसे कम नहीं।"
उसी समय दूर अयोध्या में दशरथ पुत्रेष्टि यज्ञ कर रहे थे, और यज्ञ से निकली पायस की एक बूँद हवा के सहारे अंजना तक पहुँचाई गई। अंजना ने वह ग्रहण किया।
गर्भ ठहरा।
जन्म, और सूरज की तरफ़ एक छलाँग
पुत्र जन्मा — लाल मुँह, ताँबे-जैसी देह, और एक बल जो अभी उसे ख़ुद भी नहीं पता था। सुबह हुई, सूरज उगा, और शिशु ने वह चमकता गोला देखा।
फल समझा।
बिना सोचे उसने छलाँग लगाई — आकाश की तरफ़, सीधे सूरज की ओर। पेड़ों की चोटियाँ पीछे छूटती गईं, बादल पीछे छूटे, और वह बालक हवा में उड़ता हुआ सूरज के पास तक जा पहुँचा।
देवता आकाश से देख रहे थे। किसी को समझ नहीं आया कि यह शिशु आख़िर रुकेगा कैसे।
इंद्र का वज्र
राहु उसी दिन सूरज को ग्रसने निकला था, और उसने इस उड़ते बालक को अपना प्रतिद्वंद्वी समझ लिया। राहु की पुकार पर इंद्र आ पहुँचे।
"रुक जा!" इंद्र गरजे। बालक नहीं रुका — सूरज अभी भी उसकी पकड़ से बाहर था, पास पहुँच पाना बाक़ी था।
इंद्र ने वज्र उठाया और फेंका। वज्र बालक की बाईं ठुड्डी पर लगा। बालक आकाश से गिरने लगा — और उसी गिरावट के साथ शुरू हुआ वह सब जो आगे हुआ।
वायु का क्रोध, और संसार की साँस रुक गई
वायुदेव ने अपने पुत्र को गिरते देखा। उन्होंने उसे थाम लिया, एक गुफ़ा में ले गए — और फिर क्रोध में सारे संसार से हवा खींच ली।
कहीं कोई साँस नहीं चल रही थी। पेड़ स्थिर, नदियाँ स्थिर, हर जीव हाँफता हुआ। देवता समझ गए कि यह क्रोध किसी वरदान के बिना नहीं थमेगा।
"हम अपराधी हैं," उन्होंने वायु से कहा, "अपना पुत्र लौटा दो। हम इसे ऐसा बना देंगे कि फिर कभी कोई इसे चोट न पहुँचा सके।"
दो वरदान
देवता एक-एक कर आगे आए। ब्रह्मा ने पहला वरदान दिया — "कोई भी अस्त्र इसे मार नहीं पाएगा।" इंद्र ने दूसरा — "इसकी मृत्यु सिर्फ़ इसकी अपनी इच्छा से होगी, किसी और के हाथ नहीं।"
बालक की ठुड्डी (हनु) उस वज्र से टूटी थी, और उसी टूटन से उसका नाम पड़ा — हनुमान।
वायु शांत हुए। हवा लौट आई। संसार फिर से साँस लेने लगा — और एक बालक अब ऐसा जी रहा था जिसे कोई अस्त्र छू नहीं सकता था, और जो सिर्फ़ अपनी मर्ज़ी से मर सकता था।
जो शरारत बहुत आगे तक गई
वरदान मिलने के बाद बालक हनुमान निडर हो गए — इतने कि कोई अस्त्र उन्हें छू ही नहीं सकता था। उन्होंने आश्रमों में हवन-सामग्री बिखेरनी शुरू कर दी, ऋषियों के कमंडल उलट दिए, यज्ञ की अग्नि में कूदकर देख लिया कि वह भी उन्हें जला नहीं पाती।
एक दिन एक ऋषि का धैर्य टूट गया। उन्होंने बालक को रोकने की बहुत कोशिश की — डाँटा, समझाया — पर निडर बालक टलता नहीं था।
"तुम्हें अपनी ताक़त पर इतना घमंड है," ऋषि बोले, "तो सुनो — तुम इसे भूल जाओगे। जब तक कोई तुम्हें याद न दिलाए, तब तक तुम्हें ख़ुद नहीं पता चलेगा कि तुम क्या कर सकते हो।"
शाप लग गया।
अब शक्ति वही थी, पर उसकी स्मृति नहीं थी।
बालक हनुमान बड़े हुए — निडर से शांत, शरारती से चुप — और अपनी ही ताक़त से अनजान।
टिप्पणी: जन्म, सूरज की छलाँग, वज्र, वरदान — यह पूरा प्रसंग वाल्मीकि रामायण के किष्किंधाकांड, सर्ग ६६ में जांबवान की ज़ुबानी आता है, न कि उत्तरकांड में जैसा पहले माना गया था। भूलने का शाप उत्तरकांड में है, और रामायण की अपनी कथा में यह सिर्फ़ एक पंक्ति में सिमटा है — वहाँ यह समुद्र लाँघने की पृष्ठभूमि भर है। यहाँ यही घटना हनुमान की अपनी कथा का केंद्र है।
स्रोत: कई ग्रंथों से, अंजना का बेटा