
अध्याय ५
जान-बूझकर
वे पकड़े नहीं गए थे। उन्होंने पकड़े जाना चुना था
बाग़ उजाड़ना, सोच-समझकर
सीता मिल चुकी थीं। चूड़ामणि मिल चुकी थी। काम पूरा था — अब सीधे लौटा जा सकता था।
हनुमान लौटे नहीं।
उन्होंने अशोक वाटिका के पेड़ उखाड़ने शुरू कर दिए — एक, फिर दूसरा, फिर पूरा बाग़। तालाब तोड़े, दीवारें गिराईं, और इतना शोर मचाया कि सोता हुआ नगर जाग गया।
यह ग़ुस्सा नहीं था। यह हिसाब था।
*अगर मैं चुपचाप लौट गया, तो हम इतना ही जान पाएँगे कि सीता कहाँ हैं। पर हमें यह भी जानना है कि रावण की सेना कितनी है, वह ख़ुद कैसा है, और उसके दरबार में कौन उसके ख़िलाफ़ बोल सकता है। यह सब मुझे भीतर से देखना होगा।*
*और भीतर जाने का एक ही रास्ता है — पकड़ा जाना।*
एक-एक कर, फिर इंद्रजित
रावण ने पहले पहरेदार भेजे। फिर सेनापति। फिर अपना बेटा अक्षयकुमार।
कोई नहीं लौटा।
तब इंद्रजित आया — वही जो बादलों में छिपकर लड़ता था। और उसने वह चलाया जिसका कोई जवाब नहीं था: ब्रह्मास्त्र।
हनुमान बँध गए और ज़मीन पर गिर पड़े।
एक बंधन, जो अपने आप खुल गया
फिर एक अजीब बात हुई।
ब्रह्मास्त्र का असर अपने आप ढीला पड़ने लगा — क्योंकि ब्रह्मा का वरदान हनुमान के पास पहले से था, और यह अस्त्र उन्हें ज़्यादा देर बाँधकर रख ही नहीं सकता था।
हनुमान को यह महसूस हो गया।
और उन्होंने हिलना बंद कर दिया।
*अगर मैं अभी छूट गया, तो दरबार कौन देखेगा? रावण को किसने कहा है कि राम क्या कहते हैं?*
राक्षसों ने उन्हें रस्सियों से बाँधा और घसीटते हुए दरबार की तरफ़ ले चले। उन्हें लगा वे एक बंदी ले जा रहे हैं। वे असल में एक दूत को वहाँ पहुँचा रहे थे जहाँ वह ख़ुद जाना चाहता था।
दरबार
रावण सिंहासन पर था — दस सिर, बीस भुजाएँ, और वह ठसक जो किसी से हारा न हो।
हनुमान ने सिर नहीं झुकाया।
"मैं राम का दूत हूँ," उन्होंने कहा। "सीता को लौटा दो। जो हुआ उसे भूल जाया जाएगा। और अगर नहीं लौटाया — तो यह नगर, यह सेना, और तुम, कुछ नहीं बचेगा।"
दरबार में सन्नाटा छा गया। रावण की आँखें लाल हो गईं।
"इसे मार डालो।"
तभी एक आवाज़ उठी — विभीषण की।
"नहीं। दूत को नहीं मारा जाता। यह नियम है, और इसे तोड़ने वाला राजा नहीं कहलाता। सज़ा दो, चाहे जो दो — पर मारो मत।"
रावण रुका। फिर हँसा।
"ठीक है। बंदर को अपनी पूँछ बहुत प्यारी होती है। उसी में आग लगा दो — और इसे पूरे नगर में घुमाओ, ताकि सब देखें।"
पूँछ, और वह आग जो जली नहीं
उन्होंने पूँछ में कपड़े लपेटे, तेल डाला, और आग लगा दी।
आग जली — पर हनुमान को नहीं जलाया। दूर अशोक वाटिका में बैठी सीता ने अग्नि से प्रार्थना की थी, और आग उनके लिए ठंडी हो गई।
हनुमान ने अपना आकार छोटा किया, बंधन ढीले पड़े, और वे छूट गए।
फिर वे छत-दर-छत कूदने लगे — और जलती पूँछ हर छत पर आग छोड़ती गई। सोने की लंका धू-धू करके जलने लगी।
और फिर एक डर
समुद्र के किनारे पहुँचकर उन्होंने पूँछ बुझाई और पीछे मुड़कर देखा।
पूरा नगर जल रहा था।
और तभी उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
*अशोक वाटिका भी तो उसी नगर में है। मैंने क्या कर दिया? जिसे बचाने आया था, कहीं उसी को...*
वे वहीं खड़े काँपते रहे, जब तक आकाश से आवाज़ नहीं आई और उन्हें बताया नहीं गया कि सीता सुरक्षित हैं।
तब जाकर उन्होंने साँस ली, और लौटने के लिए मुँह उत्तर की तरफ़ किया।
टिप्पणी: दरबार वाला दृश्य, विभीषण का दूत-वध रोकना, पूँछ में आग, और लंका दहन — सब वाल्मीकि रामायण के सुंदरकांड में हैं। ब्रह्मास्त्र से बँधने के बाद बंधन का अपने आप ढीला पड़ना और फिर भी हनुमान का बँधे रहना भी वहीं दर्ज है। पर पूँछ का आसन बनाकर रावण के सिंहासन से ऊँचा बैठ जाना वाल्मीकि में नहीं मिलता — वह बाद की परंपरा और लोक-कथाओं से आता है, भले ही आज वह सबसे ज़्यादा दोहराया जाने वाला दृश्य हो।
स्रोत: कई ग्रंथों से, जान-बूझकर