
अध्याय ९
जो रह गया
सबसे बड़ा वरदान यह था कि वे रुक गए, जबकि बाक़ी सब चले गए
उन्होंने क्या माँगा
राज्याभिषेक के बाद राम ने हनुमान से कहा कि वे कुछ माँगें।
सोने का न्योता था, राज्य का न्योता था, जो चाहिए वह मिल सकता था।
हनुमान ने कहा:
"मुझे बस इतना चाहिए कि जब तक इस धरती पर आपकी कथा कही जाती रहे, तब तक मैं यहीं रहूँ। मैं उसे सुनना चाहता हूँ।"
राम कुछ देर चुप रहे। यह वरदान देने में आसान था, और उठाने में सबसे भारी — क्योंकि इसका मतलब था कि हनुमान सबको जाते हुए देखेंगे।
फिर उन्होंने हाँ कह दी।
फिर सब चले गए
समय बीता।
सीता धरती में समा गईं। राम सरयू की तरफ़ चले गए, और लक्ष्मण उनसे पहले ही जा चुके थे। भरत, शत्रुघ्न, सुग्रीव, अंगद, जांबवान — एक-एक कर सब चले गए।
अयोध्या में नए राजा आए। फिर उनके बेटे। फिर उनके बेटे।
और एक वानर जंगलों में रह गया, जो उन सबको जानता था।
बहुत बाद, एक जंगल में
बहुत-बहुत बाद की बात है। इतनी बाद कि अब एक दूसरा युग चल रहा था, और एक दूसरा युद्ध होने वाला था।
एक जंगल के रास्ते में एक बूढ़ा बंदर पड़ा हुआ था। कमज़ोर, दुबला, और उसकी पूँछ ठीक रास्ते के बीच में फैली हुई थी।
एक बहुत ताक़तवर आदमी उधर से गुज़रा और बोला, "पूँछ हटाओ।"
"मैं बूढ़ा हूँ," बंदर ने कहा। "तुम ख़ुद हटा दो।"
उस आदमी ने पूँछ पकड़ी और खींची। हिली नहीं। उसने पूरी ताक़त लगाई — वह ताक़त जिससे उसने हज़ारों को हराया था।
पूँछ टस से मस नहीं हुई।
और तब उसे समझ आया कि वह किसके सामने खड़ा है।
दो भाई, दो युग
वह आदमी भीम था — वायु का पुत्र। यानी वे दोनों भाई थे, बस अलग-अलग युगों में जन्मे।
हनुमान ने उन्हें आशीर्वाद दिया, और वचन भी: आने वाले युद्ध में वे अर्जुन के रथ की ध्वजा पर बैठेंगे।
फिर भीम आगे बढ़ गए।
और हनुमान वहीं बैठे रहे — उस दुनिया में जहाँ अब वे ख़ुद एक कथा थे। जिस राम को उन्होंने अपने कंधों पर उठाया था, अब उन्हीं की कथा लोग सुनाते थे, और सुनाने वालों में से किसी ने उन्हें देखा नहीं था।
जो उन्होंने लिखा, और मिटा दिया
कहते हैं कि एक बार उन्होंने ख़ुद भी वह कथा लिखी।
अपने नाख़ूनों से चट्टानों पर, या केले के पत्तों पर — कथा दो तरह से बताई जाती है।
और कहते हैं कि जब उसे पढ़ा गया, तो वह वाल्मीकि की रचना से भी ऊपर ठहरी — क्योंकि हनुमान ने वह सब देखा था जो वाल्मीकि ने सिर्फ़ सुना था।
फिर हनुमान ने उसे नष्ट कर दिया — समुद्र में फेंककर, या निगलकर।
वजह पूछी गई, तो जवाब यही मिला कि वे नहीं चाहते थे कि उनकी रचना वाल्मीकि की कथा को ढँक दे।
उन्होंने देखा था। पर उसे अपने नाम से बड़ा नहीं होने दिया।
और अब भी
कहा जाता है कि वे गए नहीं।
वरदान की शर्त यही थी — जब तक राम की कथा कही जाती रहे।
इसलिए परंपरा मानती है कि जहाँ भी वह कथा कही जा रही होती है, वहाँ एक श्रोता ऐसा भी होता है जिसे कोई गिनता नहीं।
कोई उसके लिए आसन नहीं रखता।
कोई उसे पुकारता नहीं।
पर वह सुन रहा होता है — उसी कथा को, जिसमें वह ख़ुद था।
टिप्पणी: भीम और हनुमान की भेंट महाभारत के वन पर्व में है — यह इस गाथा का इकलौता प्रसंग है जो रामायण से नहीं, महाभारत से आता है। राम से माँगा गया वरदान — कि जब तक राम की कथा कही जाती रहे तब तक वे रहें — परंपरा में बहुत मज़बूती से दर्ज है, और चिरंजीवियों की सूची इससे अलग एक बाद के स्तोत्र से आती है; दोनों को एक मान लेना ठीक नहीं। हनुमद् रामायण, यानी वह रामायण जो उन्होंने ख़ुद लिखकर नष्ट कर दी, पूरी तरह बाद की परंपरा है — इसका कोई मूल ग्रंथ पहचाना नहीं जा सका, और नष्ट करने के तरीक़े पर भी परंपराएँ आपस में सहमत नहीं हैं।
स्रोत: कई ग्रंथों से, जो रह गया