
अध्याय ७
मोती की माला
उन्होंने एक-एक मोती तोड़कर फेंक दिया, और भरी सभा उन पर हँस पड़ी
एक माला, जो तीन हाथों से गुज़री
युद्ध ख़त्म हो चुका था। रावण मारा जा चुका था। अयोध्या लौटकर राज्याभिषेक हो चुका था।
अब वह दिन था जब जिसने जो किया, उसे उसका मान मिलना था। सभा भरी हुई थी — वानर, राक्षस, मंत्री, नगर के लोग। बाहर तक भीड़ खड़ी थी।
विभीषण ने राम के सामने एक माला रखी — लंका के ख़ज़ाने की, मोतियों की। बड़े, सफ़ेद, एक-से, बिना एक भी दाग़ के। ऐसे मोती जिन्हें बनने में समुद्र को बरसों लगते हैं।
राम ने उसे छुआ और सीता की तरफ़ बढ़ा दिया।
सीता ने उसे अपने गले में डाला।
और फिर उन्होंने उसे उतार दिया
सभा में हर किसी को कुछ न कुछ मिला — किसी को स्वर्ण, किसी को भूमि, किसी को पद।
फिर सीता ने अपने गले से वही माला उतारी।
पूरी सभा देख रही थी कि यह किसे जाएगी।
उन्होंने वह हनुमान की तरफ़ बढ़ा दी।
हनुमान ने दोनों हाथों से उसे लिया, सिर झुकाया, और एक तरफ़ हटकर बैठ गए।
एक-एक मोती
वे माला को देखते रहे। बहुत देर तक — इतनी देर कि आसपास बैठे लोग उन्हें देखने लगे।
फिर उन्होंने एक मोती उँगलियों में लिया, उसे दाँतों से तोड़ा, भीतर झाँका — और उसे नीचे गिरा दिया।
मोती पत्थर के फ़र्श पर गिरा और लुढ़कता हुआ चला गया। सभा में वह आवाज़ साफ़ सुनाई दी।
फिर दूसरा। फिर तीसरा।
अब सब चुप होकर देख रहे थे। हनुमान का चेहरा वैसा ही था — न जल्दी, न ग़ुस्सा, बस एक आदमी जो कुछ ढूँढ़ रहा हो और उसे मिल न रहा हो।
वे तोड़ते रहे, जब तक फ़र्श पर टूटे मोती बिखर नहीं गए।
सभा हँस पड़ी
पहले किसी एक की हँसी छूटी। फिर दो-चार और।
"बंदर को मोती की क़ीमत क्या पता," किसी ने पीछे से कहा, और उस पर और हँसी उठी।
"तुम यह क्या कर रहे हो?" आख़िर किसी ने पूछ ही लिया। "माता ने अपने गले की माला दी है, और तुम उसे तोड़कर फेंक रहे हो?"
हनुमान ने सिर उठाया। उनके चेहरे पर शर्मिंदगी का नाम नहीं था।
"मैं हर मोती में देख रहा हूँ कि उसके भीतर राम हैं या नहीं," उन्होंने कहा। "नहीं हैं। तो यह मेरे किस काम का? जिस चीज़ में राम न हों, वह मेरे लिए पत्थर है।"
एक पल को सन्नाटा रहा। फिर सभा पहले से ज़्यादा ज़ोर से हँसी।
"तो क्या तुम्हारे भीतर हैं?" किसी ने ताना मारा।
छाती
हनुमान खड़े हुए।
उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया, कोई सफ़ाई नहीं दी, किसी की तरफ़ देखा तक नहीं।
बस अपने दोनों हाथ अपनी छाती पर रखे और उसे चीर दिया।
हँसी एक झटके में बंद हो गई।
भीतर, उनके हृदय में, राम और सीता बैठे हुए दिखे।
उसके बाद किसी ने कुछ नहीं कहा
सभा में कोई नहीं बोला। जो अभी हँस रहे थे, उन्होंने नज़रें नीची कर लीं।
सीता की आँखें भर आईं।
राम सिंहासन से उठे और नीचे उतरकर हनुमान के पास आ खड़े हुए।
और हनुमान वहीं खड़े रहे — असहज, क्योंकि अब सब उन्हीं को देख रहे थे।
उन्होंने यह दिखाने के लिए नहीं किया था। उनसे एक सवाल पूछा गया था, और उनके पास उसका सिर्फ़ यही जवाब था।
टिप्पणी: यह अध्याय पूरी तरह बाद की परंपरा का है — वाल्मीकि रामायण में मोती की माला, टूटे मोती और छाती चीरने का प्रसंग नहीं मिलता। और यहाँ एक बात खुली रह जाती है जिसे इस गाथा ने छिपाया नहीं: इस कथा का स्रोत भी तय नहीं है। कुछ स्रोत इसे पंद्रहवीं सदी की बंगाली कृत्तिवास रामायण से जोड़ते हैं, कुछ तुलसीदास की परंपरा से — पर रामचरितमानस के भीतर या किसी प्राचीन संस्कृत पाठ में इसका पक्का ठिकाना नहीं मिला। इसलिए यहाँ किसी एक दावे को सही नहीं ठहराया गया। कथा असली है, उसका पता अनिश्चित।
स्रोत: कई ग्रंथों से, मोती की माला