
अध्याय ४
रात की लंका
पूरा शहर छान मारा, और सीता माँ कहीं नहीं मिलीं — यही इस रात का सबसे बड़ा पल है
द्वार पर एक औरत खड़ी थी
रात हुई। हनुमान बिल्ली जितने छोटे होकर दीवार की तरफ़ बढ़े।
तभी कोई सामने आ खड़ा हुआ — लंका की अधिष्ठात्री, नगर की रखवाली करती हुई एक स्त्री।
"चोर," वह बोली। "यह नगर मेरा है।"
उसने गदा चलाई। चोट लगी। हनुमान लड़खड़ाए, फिर उन्होंने बाएँ हाथ से — मुट्ठी बाँधकर, पूरी ताक़त लगाए बिना — एक बार उसे मारा।
वह गिर पड़ी। और गिरते-गिरते हँसने लगी।
"ब्रह्मा ने मुझसे कहा था," वह बोली, "जिस दिन कोई वानर तुझे हरा दे, समझ लेना कि राक्षसों का समय पूरा हुआ। जाओ। आज वह दिन आ गया।"
सोया हुआ शहर
भीतर लंका सोई हुई थी।
सोने की दीवारें, गलियों में बुझते दीये, कहीं दूर बजते-बजते रुका हुआ संगीत, शराब और फूलों की मिली-जुली गंध, और छतों पर बेख़बर सोए हुए लोग।
हनुमान एक छत से दूसरी छत पर उतरते रहे — इतने छोटे कि किसी की नींद न टूटे।
यह दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह लग रही थी। और कहीं इसी के भीतर एक औरत क़ैद थी।
महलों के भीतर, और एक शक
वे महल-दर-महल गए।
और यहीं उनकी सबसे बड़ी अड़चन सामने आई: वे सीता को पहचानते ही नहीं थे। उन्होंने उन्हें कभी देखा नहीं था। उनके पास सिर्फ़ दो चीज़ें थीं — राम का बताया हुआ हुलिया, और वे गहने जो आकाश से गिरे थे, जब रावण उन्हें ले जा रहा था।
इसलिए उन्हें हर जगह देखना पड़ रहा था — हर कक्ष, हर आँगन, हर वह जगह जहाँ कोई हो सकता था।
और तभी एक ख़याल आया, जो उन्हें भीतर तक हिला गया।
*मैं दूसरों के घरों में, बिना पूछे, भीतर तक जा रहा हूँ। क्या मुझसे पाप हो रहा है?*
वे रुक गए। फिर उन्होंने ख़ुद ही अपने आप से बहस की: *जिसे खोया हुआ ढूँढ़ना है, उसे वहीं देखना पड़ेगा जहाँ लोग हैं। मेरा मन कहीं डोला नहीं, और मेरी नीयत में खोट नहीं। तो पाप कहाँ हुआ।*
वे आगे बढ़े।
जब सब जगह देख ली गई
रात ढलने लगी।
महल देख लिए, बाग़ देख लिए, तहख़ाने, रथशालाएँ, यज्ञशालाएँ — सब देख लिया।
सीता कहीं नहीं थीं।
हनुमान एक दीवार पर बैठ गए, और पहली बार उनके भीतर वह चीज़ उठी जो अब तक नहीं उठी थी।
*अगर वे मर चुकी हों? अगर रास्ते में समुद्र में गिरा दी गई हों? अगर मैं ख़ाली हाथ लौटा, तो राम जीवित नहीं बचेंगे। और लक्ष्मण, और भरत, और पूरी सेना...*
*तो फिर लौटूँ ही नहीं। यहीं बैठ जाऊँ, जंगल में चला जाऊँ, या प्राण त्याग दूँ।*
और फिर, उसी अँधेरे में बैठे-बैठे, उन्होंने ख़ुद को जवाब दिया:
*नहीं। निराशा से बड़ा कोई दुश्मन नहीं होता। जो निराश हो जाता है, उसका किया हुआ काम भी बेकार हो जाता है। जब तक एक जगह बची है, तब तक हार नहीं।*
एक जगह जो बची थी
उन्होंने ऊपर से पूरे नगर पर फिर नज़र दौड़ाई।
एक हिस्सा ऐसा था जहाँ वे अब तक नहीं गए थे — दीवार के उस पार फैला हुआ एक बाग़, पेड़ों से भरा, महलों से अलग।
अशोक वाटिका।
हनुमान उठे और उसी तरफ़ चल दिए।
टिप्पणी: यह पूरा अध्याय वाल्मीकि रामायण के सुंदरकांड से है। नगर के द्वार पर लंका की रखवाली करने वाली से भिड़ंत, बाएँ हाथ का वार, और ब्रह्मा की वह शर्त कि वानर से हार ही राक्षसों के अंत का संकेत है — सब वहीं दर्ज है। महल में पराई स्त्रियों को देखने पर हनुमान का अपने आप से धर्म-संकट, और खोज नाकाम होने पर उनकी निराशा और उससे उबरना भी वाल्मीकि का अपना है, किसी बाद की परंपरा का जोड़ा हुआ नहीं। रामायण में यह हिस्सा तेज़ी से गुज़र जाता है क्योंकि वहाँ सवाल यह है कि लंका में हुआ क्या; यहाँ सवाल यह है कि उस रात अकेले आदमी पर गुज़री क्या।
स्रोत: कई ग्रंथों से, रात की लंका