
अध्याय २
राम से भेंट, और जांबवान
जासूसी के लिए भेजा गया आदमी लौटा तो किसी और का हो चुका था
ऋष्यमूक पर्वत से दो अजनबी
सुग्रीव ऋष्यमूक पर छिपे बैठे थे, क्योंकि बालि वहाँ नहीं आ सकता था। नीचे जंगल में दो आदमी दिखे — लंबे, धनुष लिए, वल्कल पहने हुए।
सुग्रीव का हाथ काँपने लगा। "बालि ने भेजे हैं। मुझे मारने आए हैं।"
"या नहीं भी," हनुमान बोले।
"तो जाकर पता करो। पर ऐसे मत जाना कि वे समझ जाएँ कि तुम मेरे आदमी हो।"
हनुमान नीचे उतरने लगे। अगर वे दोनों सचमुच बालि के भेजे हुए निकले, तो लौटने वाला कोई नहीं था।
ब्राह्मण, जो बहुत अच्छा बोलता था
वे भिक्षु का वेश धरकर उनके सामने पहुँचे और बात शुरू की — नरम, विनम्र, बिना एक भी शब्द बहकाए।
राम कुछ देर सुनते रहे। फिर उन्होंने लक्ष्मण की तरफ़ देखा और धीमे से कहा:
"जो ऐसा बोलता है, उसने ऋग्वेद पढ़ा होगा, यजुर्वेद जाना होगा, सामवेद कंठ किया होगा। इतनी देर बोला, और व्याकरण की एक भूल नहीं। और देखो — न इसके मुँह पर कुछ है, न आँखों में, न भौंह पर। कहीं कुछ छुपा हुआ नहीं दिखता।"
वेश काम नहीं आया था। पर जिस वजह से नहीं आया, वह अपमान नहीं था।
राम ने एक ही बातचीत में उस आदमी को पहचान लिया था।
कंधों पर दो आदमी
हनुमान ने वेश उतार दिया और सच बता दिया — कौन हैं, किसने भेजा, और क्यों।
फिर उन्होंने दोनों भाइयों को अपने कंधों पर बिठाया और ऋष्यमूक की चोटी तक ले गए। ऊपर सुग्रीव खड़े इंतज़ार कर रहे थे। उसी दिन अग्नि साक्षी रखकर राम और सुग्रीव की मित्रता हुई।
जो आदमी सुबह जासूसी के लिए भेजा गया था, वह शाम तक किसी और का हो चुका था।
फिर बहुत सारा समय बीत गया
बालि मारा गया। सुग्रीव राजा बने। बरसात आई और बीत गई, और उसके साथ सुग्रीव का वचन भी लगभग बीत गया — जब तक लक्ष्मण ने आकर याद न दिलाया।
फिर वानर चारों दिशाओं में भेजे गए। दक्षिण वाला दल हनुमान, अंगद और जांबवान का था।
महीना बीत गया। कुछ नहीं मिला। लौटकर जाना भी मौत थी — सुग्रीव ने समय पर न लौटने वालों के लिए यही तय किया था। फिर संपाति मिले, और उन्होंने बताया कि सीता लंका में हैं, समुद्र के उस पार।
किनारे पर सब चुप हो गए
वे समुद्र के किनारे आ खड़े हुए। सौ योजन पानी, और उस पार लंका।
अंगद ने पूछा, "कौन जाएगा?"
एक-एक कर वानर बोले। किसी ने कहा दस योजन, किसी ने बीस, किसी ने तीस। सबसे ऊँचा आँकड़ा भी उस पार तक नहीं पहुँचता था।
अंगद ने कहा, "मैं शायद पहुँच जाऊँ। पर लौट नहीं पाऊँगा।"
जांबवान ने सिर हिलाया। "युवराज को नहीं भेजा जाता। और मैं बूढ़ा हूँ — कभी मैं भी लाँघ सकता था, अब नहीं।"
फिर सन्नाटा। हनुमान थोड़ा अलग बैठे थे, चुप, जैसे बात उनकी हो ही नहीं।
जांबवान उनकी तरफ़ मुड़े
"तुम चुप क्यों हो?" जांबवान बोले।
हनुमान ने कंधे उचकाए।
तब जांबवान उनके पास आकर बैठ गए और उन्हें उन्हीं की कथा सुनानी शुरू की — अंजना कौन थीं, वायु ने क्या वचन दिया था, वह बालक सूरज तक कैसे पहुँचा था, इंद्र का वज्र कहाँ लगा था, और ब्रह्मा ने क्या कहा था।
हनुमान वह कथा ऐसे सुनते रहे जैसे किसी और की हो।
"यह तुम हो," जांबवान ने कहा। "तुम्हें बस याद नहीं।"
और तब कुछ हिला। हनुमान खड़े हुए, और खड़े होते-होते बढ़ने लगे — वानरों ने पीछे हटकर जगह बनाई, पत्थर खिसके, और किनारे की रेत उनके पैरों के नीचे दब गई।
शाप की शर्त पूरी हो चुकी थी। किसी ने याद दिला दिया था।
टिप्पणी: राम का हनुमान की भाषा पर वह अनुमान — ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, और व्याकरण में कोई भूल नहीं — वाल्मीकि रामायण के किष्किंधाकांड, सर्ग ३ में है। समुद्र के किनारे जांबवान का हनुमान को उनकी अपनी कथा सुनाना उसी कांड के सर्ग ६६ में है। पर "भूलने का शाप" वाली व्याख्या वहाँ नहीं — वह उत्तरकांड और बाद की परंपरा से आती है, और उत्तरकांड को कई आधुनिक विद्वान बाद का जोड़ा हुआ हिस्सा मानते हैं। यानी याद दिलाया जाना वाल्मीकि का है, भूलने की वजह परंपरा की।
स्रोत: कई ग्रंथों से, राम से भेंट, और जांबवान