
अध्याय ३
समुद्र
सौ योजन पानी, और तीन बार किसी ने रास्ता रोका — हर बार वजह अलग थी
महेंद्र पर्वत नीचे धँस गया
हनुमान महेंद्र पर्वत पर चढ़े और पैर जमाए। पर्वत उनके नीचे दबने लगा — पेड़ों से फूल झड़े, हिरन भागे, गुफ़ाओं में सोए जानवर हड़बड़ाकर बाहर निकले, और चट्टानों से पानी के सोते फूट पड़े।
उन्होंने साँस भरी, हाथ ऊपर किए, और आकाश की तरफ़ देखा।
"मैं वहाँ पहुँचूँगा," उन्होंने कहा, "और अगर सीता वहाँ नहीं मिलीं, तो लंका उखाड़कर साथ ले आऊँगा।"
फिर उन्होंने छलाँग लगाई। पीछे पूरा पर्वत काँप गया, और पेड़ जड़ों समेत उखड़कर उनके साथ हवा में कुछ दूर तक उड़ते चले गए।
सोने का पर्वत, जो आराम देने उठा
बीच समुद्र में पानी हिला और एक सुनहरा पर्वत ऊपर उठ आया — मैनाक।
हनुमान ने उसे रास्ता रोकने वाली चीज़ समझा। पर पर्वत से आवाज़ आई:
"मैं तुम्हें रोकने नहीं आया। बहुत पहले जब इंद्र ने पर्वतों के पंख काटे थे, तब तुम्हारे पिता वायु ने मुझे उठाकर इसी समुद्र में छिपा दिया था। वह क़र्ज़ आज तक मुझ पर है। बैठो, थोड़ा सुस्ता लो।"
हनुमान ने पर्वत को हाथ से छुआ — यही उनका धन्यवाद था।
"काम बाक़ी है," उन्होंने कहा। "जब तक वह पूरा न हो, विश्राम का हक़ नहीं बनता।"
और वे आगे बढ़ गए।
सुरसा का मुँह
फिर पानी से एक विशाल आकृति उठी — सुरसा, नागों की माता। देवताओं ने उन्हें भेजा था, रोकने के लिए नहीं, परखने के लिए।
"मुझे वरदान है कि जो इस रास्ते से गुज़रे, वह मेरा भोजन बने," वे बोलीं। "मेरे मुँह में आओ।"
हनुमान ने पहले विनती की। फिर, जब बात नहीं बनी, उन्होंने अपना आकार बढ़ाना शुरू किया — दस योजन, बीस, तीस। सुरसा का मुँह भी उतना ही बढ़ता गया।
तब हनुमान रुके। और अचानक सिकुड़कर अँगूठे जितने हो गए, बिजली की तेज़ी से उस मुँह में घुसे, और दूसरी तरफ़ से निकल आए।
"वचन पूरा हुआ," उन्होंने कहा। "मैं आपके मुँह में गया, और निकल भी आया।"
सुरसा हँस पड़ीं और अपने असली रूप में लौट आईं। "जाओ। जो काम तुम्हें मिला है, वह पूरा होगा।"
परछाईं पकड़ने वाली
आगे कुछ अजीब होने लगा। हनुमान उड़ रहे थे, पर बीच-बीच में जैसे कोई उन्हें पीछे खींच रहा हो — गति टूटती, शरीर लड़खड़ाता।
उन्होंने नीचे देखा। समुद्र में सिंहिका थी, जो उड़ने वाले की परछाईं पकड़कर उसे नीचे खींच लेती थी और फिर खा जाती थी।
हनुमान ने ठीक वही किया जो कोई और नहीं करता — उन्होंने ख़ुद को खिंच जाने दिया, उसके मुँह में गए, और भीतर से उसे चीरकर बाहर निकल आए।
फिर बिना रुके आगे उड़ चले।
दूर, एक जलता हुआ शहर
आख़िर में क्षितिज पर कुछ चमका। त्रिकूट पर्वत, और उसकी चोटी पर लंका — सोने की दीवारें, जलते दीये, और नीचे तक फैली हुई रोशनी।
हनुमान एक पेड़ पर उतरे और साँस थामकर देखते रहे। यह वह जगह नहीं थी जहाँ कोई चुपचाप घुस सके।
रात होने में अभी देर थी।
टिप्पणी: मैनाक, सुरसा और सिंहिका — तीनों प्रसंग वाल्मीकि रामायण के सुंदरकांड में हैं, और तीनों का मक़सद अलग है: मैनाक आभार में आराम देने उठता है, सुरसा को देवता परीक्षा लेने भेजते हैं, और सिंहिका अकेली असली शिकारी है। "पर्वतों के पंख काटे जाने" वाली कथा इसी प्रसंग की पृष्ठभूमि है, जो पुरानी कथा-परंपरा से आती है। रामायण में यह पूरा रास्ता एक दूत की यात्रा की तरह आता है; यहाँ यह उस आदमी की यात्रा है जिसे कुछ घंटे पहले तक अपनी ताक़त का पता ही नहीं था।
स्रोत: कई ग्रंथों से, समुद्र