
अध्याय ६
संजीवनी
जड़ी पहचान में नहीं आई, इसलिए वे पूरा पहाड़ उठा लाए
रात, और एक वैद्य का नाम लेना
लक्ष्मण ज़मीन पर पड़े थे। साँस चल रही थी, पर बहुत धीमी।
राम उनके पास बैठे थे और किसी की बात नहीं सुन रहे थे।
तब सुषेण आगे आए — वानरों के वैद्य।
"चार जड़ी-बूटियाँ हैं," उन्होंने कहा। "मृतसंजीवनी, विशल्यकरणी, सुवर्णकरणी और संधानी। ये हिमालय के एक पर्वत पर उगती हैं।"
फिर उन्होंने ऊपर आकाश की तरफ़ देखा।
"और सूरज निकलने से पहले वे यहाँ होनी चाहिए। उसके बाद कुछ नहीं हो सकेगा।"
सब चुप हो गए। हिमालय बहुत दूर था। रात बहुत थोड़ी थी।
उत्तर की तरफ़
हनुमान उठे।
उन्हें कुछ कहना नहीं पड़ा, और किसी ने उन्हें रोका भी नहीं। वे आकाश में उठे और उत्तर की तरफ़ मुड़ गए।
नीचे युद्धभूमि पीछे छूटती गई — जलते हुए तंबू, घायल सैनिक, और वह मैदान जहाँ उनका छोटा-सा राजकुमार बेहोश पड़ा था।
फिर मैदान ख़त्म हुए, नदियाँ आईं, और फिर बर्फ़।
जड़ी, जो पहचान में नहीं आई
पर्वत पर पहुँचकर वे उतरे।
और वहीं वह हुआ जिसकी किसी ने चेतावनी नहीं दी थी।
पूरा ढलान जड़ी-बूटियों से भरा था — हज़ारों पौधे, एक जैसे दिखते हुए। कौन-सी मृतसंजीवनी है, कौन-सी विशल्यकरणी, कौन-सी कुछ और — कुछ पता नहीं चल रहा था।
उन्होंने झुककर देखा, एक पौधा उठाया, फिर दूसरा, फिर तीसरा।
पूर्व की तरफ़ आसमान का रंग बदलने लगा था।
*समय नहीं है। और ग़लत जड़ी ले जाने का मतलब है कि लक्ष्मण नहीं बचेंगे।*
तो पूरा पर्वत ही
उन्होंने पौधे छोड़ दिए और सीधे खड़े हो गए।
फिर वे बढ़ने लगे — जब तक पर्वत उनके सामने छोटा न पड़ गया।
उन्होंने शिखर को दोनों हाथों से पकड़ा, ज़ोर लगाया, और उसे जड़ों समेत उखाड़ लिया — मिट्टी, बर्फ़, पेड़, और वे सारी जड़ी-बूटियाँ, सब साथ।
फिर उसी शिखर को उठाए हुए उन्होंने दक्षिण की तरफ़ छलाँग लगाई।
लौटना
नीचे लंका की युद्धभूमि इंतज़ार कर रही थी।
हनुमान उतरे और शिखर सुषेण के सामने रख दिया।
"मैं जड़ी पहचान नहीं पाया," उन्होंने कहा। "इसलिए पूरा शिखर ले आया। आप ख़ुद देख लीजिए।"
सुषेण ने पौधों में से जो चाहिए था वह चुना, उसे पीसा, और लक्ष्मण की नाक के पास ले गए।
लक्ष्मण ने साँस ली। फिर आँखें खोलीं। फिर उठ बैठे — शल्य निकल चुका था, दर्द जा चुका था।
राम ने कुछ कहा नहीं। वे बस हनुमान को देखते रहे।
और पहाड़ वापस
काम पूरा हो गया था, पर हनुमान बैठे नहीं।
वे वही शिखर दोबारा उठाकर उत्तर की तरफ़ उड़े, और उसे ठीक वहीं रख आए जहाँ से उखाड़ा था।
किसी ने उनसे यह करने को नहीं कहा था।
टिप्पणी: सुषेण का चार जड़ी-बूटियों — मृतसंजीवनी, विशल्यकरणी, सुवर्णकरणी और संधानी — के नाम लेना, हनुमान का उन्हें पहचान न पाना और इसीलिए पूरा शिखर उठा लाना, और सुषेण का जड़ी पीसकर लक्ष्मण को सुँघाना — यह सब वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड में है। हनुमान ख़ुद कहते हैं कि वे जड़ी पहचान नहीं पाए, इसलिए पूरा शिखर ले आए। कालनेमि वाला प्रसंग, जिसमें एक राक्षस साधु बनकर रास्ता रोकता है, वाल्मीकि के इस हिस्से में नहीं मिलता — वह बाद के ग्रंथों और परंपरा से आता है।
स्रोत: कई ग्रंथों से, संजीवनी