
अध्याय ३
काम और विवाह
देवताओं को एक बेटा चाहिए था, तो उन्होंने काम को शिव की समाधि तोड़ने भेजा — और काम राख हो गया
जो फूल के बाण से जगाने आया
पार्वती हिमालय के राजा हिमवान और मेना की बेटी के रूप में जन्मीं — सती का पुनर्जन्म — और शिव की सेवा में लगा दी गईं, जहाँ वे तप में बैठे थे।
देवताओं ने काम को भेजा — कामदेव, रति और वसंत के साथ — कि वह शिव के मन में इच्छा जगा दे।
काम ने अपने फूलों का बाण चढ़ाया।
शिव ने आँख खोली — तीसरी आँख — और उसमें से निकली आग ने काम को वहीं भस्म कर दिया।
रति विलाप करती रही। बाद में शिव ने काम को जीवित तो किया, पर बिना देह के — "अनंग", जिसका कोई शरीर नहीं। इच्छा देह के बिना बची रह गई।
अपर्णा
पार्वती को लगा कि सुंदरता हार गई।
तो उन्होंने ख़ुद तप शुरू किया — इतना कठोर कि अन्न छोड़ दिया, फिर पत्ते तक। इसी से नाम पड़ा अपर्णा — "पत्तों के बिना"।
एक दिन एक बूढ़ा ब्राह्मण आया और शिव की निंदा करने लगा — उसे परखने के लिए। पार्वती ने शिव का पक्ष लिया। तब ब्राह्मण ने अपना असली रूप दिखाया। वह शिव ही थे।
विवाह
विवाह में तीनों लोक आए।
कालिदास ने इसी कथा पर "कुमारसंभव" — "युद्ध-देवता का जन्म" — रचा। पर एक अजीब बात: कविता का असली हिस्सा आठ सर्गों का है और शिव-पार्वती के मिलन पर ख़त्म हो जाता है। कुमार का जन्म उसमें आता ही नहीं, नाम के बावजूद।
टिप्पणी: यह अध्याय शिव-महिमा के अध्याय ५ (काम का दहन) और ६ (पार्वती की तपस्या) से जुड़ता है; इस साइट की नीति है कि ऐसा प्रसंग हर महाकाव्य में स्वतंत्र रूप से, बिना हिचक, कहा जाए। काम का बिना देह के "अनंग" बनना पुराणों में है; कुछ परंपराएँ उसे कृष्ण-काल में प्रद्युम्न के रूप में पूर्ण पुनर्जन्म देती हैं (कृष्ण-लीला से जुड़ाव)। कालिदास की "कुमारसंभव" का प्रामाणिक अंश आठ सर्गों का माना जाता है (शिव-पार्वती के मिलन पर समाप्त); आगे के सर्ग — कुछ पांडुलिपियों में सत्रह तक — बाद के किसी अनुकरणकर्ता के जोड़ माने जाते हैं। इसे एक काव्य के रूप में पढ़ें, इतिहास के रूप में नहीं।
स्रोत: कई ग्रंथों और परंपराओं से, काम और विवाह