अध्याय १०

तमिल कडवुळ

उत्तर में कार्तिकेय की स्वतंत्र पूजा बहुत छोटी हो गई; दक्षिण में मुरुगन आज भी सबसे बड़े जीवित देवताओं में हैं

छह धाम

तिरुमुरुकाट्रुप्पडै मुरुगन के छह पवित्र स्थानों का गुणगान करती है। बाद की परंपरा ने इन्हें आज के अरुपडै वीडु — मुरुगन के छह धाम — के रूप में स्थिर किया:

थिरुपरंकुंड्रम (मदुरै के पास — जहाँ देइवानै से विवाह हुआ), तिरुचेंदूर (समुद्र-तट — जहाँ सूरपद्मन मारा गया), पलनी (पहाड़ी — जहाँ वह दंडायुधपाणि, बैरागी है), स्वामिमलै (जहाँ बालक मुरुगन ने अपने ही पिता शिव को "ॐ" का अर्थ समझाया, और स्वामिनाथ कहलाया), थिरुत्तणि, और पऴमुदिर्चोलै।

थैपुसम

थैपुसम — तमिल थै मास में, पूसम नक्षत्र पर — तमिल परंपरा में उस अवसर के रूप में मनाया जाता है जब पार्वती ने स्कंद को वेल दिया।

भक्त कावडि उठाते हैं — इडुंबन वाली वही बहँगी — और कई अपने शरीर में भाले और हुक भी बिंधवाते हैं, गाल और जीभ के आर-पार, एक व्रत के रूप में।

यह पलनी में और मलेशिया के बटु केव्स में बहुत बड़ा है — जहाँ मुरुगन की लगभग ४२.७ मीटर ऊँची सुनहरे रंग की प्रतिमा है और भीड़ दस लाख से ऊपर जा सकती है — और सिंगापुर, मॉरीशस, रीयूनियन, दक्षिण अफ़्रीका, फ़िजी में भी, जहाँ-जहाँ तमिल मज़दूर गए।

कतरगम

श्रीलंका के कतरगम में एक बहुत पुराना स्कंद/मुरुगन मंदिर है — जिसे हिंदू, बौद्ध और वेद्दा लोग साथ पूजते हैं। वल्ली वहाँ एक स्थानीय आकृति है।

"तमिल का देवता"

मुरुगन को "तमिऴ कडवुळ" — तमिल का देवता — कहा जाता है। यह नाम पुराना भी है और आधुनिक भी।

वह वह देवता है जो तमिल भाषा और भूमि से सबसे ज़्यादा जुड़ा है, और उसकी तमिल पूजा भारत की सबसे पुरानी अटूट भक्ति-परंपराओं में है।

और उत्तर

उत्तर भारत के बड़े हिस्से में प्रारंभिक मध्यकाल के बाद उसकी स्वतंत्र पूजा घट गई, पर मिटी नहीं। हरियाणा का पेहोवा आज भी एक महत्त्वपूर्ण उत्तरी तीर्थ है।

बंगाल में कार्तिक की पूजा जीवित है — दुर्गा-परिवार में भी और स्वतंत्र कार्तिक पूजा के रूप में भी — और हिमालय के कुछ क्षेत्रों तथा नेपाल में भी कार्तिकेय-कुमार की परंपराएँ मिलती हैं।

टिप्पणी: तिरुमुरुकाट्रुप्पडै मुरुगन के छह पवित्र स्थानों का गुणगान करती है; बाद की परंपरा ने आधुनिक अरुपडै वीडु क्रम को थिरुपरंकुंड्रम, तिरुचेंदूर, पलनी, स्वामिमलै, थिरुत्तणि और पऴमुदिर्चोलै के रूप में स्थिर किया। कविता के हर प्राचीन स्थान-नाम की आधुनिक मंदिर से पहचान समान रूप से निश्चित नहीं है। स्वामिमलै की "बालक ने पिता को ॐ समझाया" वाली कथा से नाम स्वामिनाथ। जीवित तमिल त्योहार-परंपरा में थैपुसम (थै मास, पूसम/पुष्य नक्षत्र) पार्वती द्वारा मुरुगन को वेल देने की स्मृति है; ऐप्पसि की स्कंद षष्ठी वह पर्व-चक्र है जो सूरपद्मन-युद्ध और सूर संहारम् पर समाप्त होता है। कावडि इडुंबन-कथा से है; शरीर-भेदन एक व्रत-रूप है। बटु केव्स (मलेशिया) में ४२ मीटर की स्वर्ण-मूर्ति और दस लाख+ की भीड़; तमिल प्रवास के साथ यह पर्व मॉरीशस, सिंगापुर, रीयूनियन, दक्षिण अफ़्रीका, फ़िजी तक फैला। कतरगम (श्रीलंका) एक साझा तीर्थ है — हिंदू, बौद्ध और वेद्दा। प्रारंभिक मध्यकाल के बाद उत्तर भारत के बड़े हिस्से में कार्तिकेय की स्वतंत्र पूजा बहुत कम हो गई, पर समाप्त नहीं हुई। हरियाणा का पेहोवा एक महत्त्वपूर्ण जीवित उत्तरी तीर्थ है; बंगाल में दुर्गा-परिवार के कार्तिक के साथ स्वतंत्र कार्तिक पूजा भी जीवित है; और हिमालयी क्षेत्रों तथा नेपाल के कुछ भागों में भी कार्तिकेय/कुमार परंपराएँ बनी हुई हैं।

स्रोत: कई ग्रंथों और परंपराओं से, तमिल कडवुळ

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

मुरुगन के छह धामों को सामूहिक रूप से क्या कहते हैं?

  • द्वादश ज्योतिर्लिंग
  • चार धाम
  • अष्टविनायक
  • अरुपडै वीडु
पूरी कथा पढ़िए — छह धाम

"अरुपडै वीडु" का अर्थ है "छह पड़ाव/शिविर"।

तिरुमुरुकाट्रुप्पडै इन्हीं छह पवित्र स्थानों का गुणगान करती है।

आज की छह-मंदिर वाली यात्रा बाद की परंपरा ने स्थिर की।

तथ्य

छह धामों में से किसमें बालक मुरुगन ने अपने पिता शिव को "ॐ" का अर्थ समझाया?

  • पलनी
  • स्वामिमलै
  • तिरुचेंदूर
  • थिरुत्तणि
पूरी कथा पढ़िए — बेटे ने पिता को पढ़ाया

स्वामिमलै की कथा है कि बालक मुरुगन ने शिव को "ॐ" का अर्थ समझाया।

इसी से उसका नाम स्वामिनाथ पड़ा — "स्वामी का भी स्वामी"।

यह तमिल कंद पुराणम् / स्वामिमलै मंदिर की परंपरा है।

तथ्य

थैपुसम पर भक्त क्या उठाते हैं?

  • एक कलश
  • एक दीप
  • कावडि
  • एक ध्वज
पूरी कथा पढ़िए — इडुंबन की बहँगी

कावडि की कथा इडुंबन से है, जिसने दो पहाड़ियाँ पलनी पहुँचाईं।

थैपुसम पर बहुत-से भक्त व्रत की पूर्ति के लिए कावडि उठाते हैं।

कई अपने शरीर में भाले और हुक भी बिंधवाते हैं, एक व्रत के रूप में।

क्या हुआ?

कई थैपुसम भक्त एक व्रत के रूप में अपने शरीर के साथ क्या करते हैं?

  • गाल और जीभ के आर-पार भाले और पीठ में हुक बिंधवाते हैं
  • व्रत के रूप में शरीर को नीला रंगना अनिवार्य है
  • सिर मुँडवाते हैं
  • नंगे पैर सौ किलोमीटर चलते हैं
पूरी कथा पढ़िए — देह का व्रत

थैपुसम पर कावडि उठाना एक कठोर व्रत है।

कई भक्त गाल, जीभ या पीठ में धातु बिंधवाते हैं।

यह एक मन्नत या प्रायश्चित का रूप है।

तथ्य

मलेशिया के बटु केव्स की मुरुगन-प्रतिमा कैसी है?

  • ठोस सोने की, दस मीटर ऊँची
  • पत्थर की, बिना रंग की
  • काँसे की, बीस मीटर की
  • लगभग ४२.७ मीटर ऊँची, सुनहरे रंग की (ठोस सोना नहीं)
पूरी कथा पढ़िए — सुनहरी, सोने की नहीं

बटु केव्स की मूर्ति लगभग ४२.७ मीटर ऊँची है।

वह सुनहरे रंग से रंगी है, ठोस सोने की नहीं।

थैपुसम पर वहाँ दस लाख से ज़्यादा लोग जुट सकते हैं।

बाद की परंपरा

श्रीलंका का कौन-सा मंदिर हिंदू, बौद्ध और वेद्दा लोग साथ पूजते हैं?

  • अनुराधापुर
  • कतरगम
  • केलनिया
  • दंबुला
पूरी कथा पढ़िए — साझा तीर्थ

कतरगम में एक प्राचीन स्कंद/मुरुगन मंदिर है।

इसे हिंदू, बौद्ध और वेद्दा — सब पूजते हैं।

वल्ली वहाँ एक स्थानीय आकृति है।

तथ्य

"तमिऴ कडवुळ" का क्या अर्थ है?

  • "तमिल का देवता"
  • "पहाड़ों का देवता"
  • "युद्ध का देवता"
  • "छह मुँह वाला"
पूरी कथा पढ़िए — तमिल का देवता

यह नाम पुराना भी है — तमिल परंपरा ख़ुद उसे यों बुलाती है।

और आधुनिक भी — यह भाषा-पहचान की राजनीति में एक नारा रहा है।

वह तमिल भाषा और भूमि से सबसे ज़्यादा जुड़ा देवता है।

ग्रंथ असहमत

क्या "तिरुमुरुकाट्रुप्पडै" ठीक आज वाली छह-मंदिर यात्रा गिनाती है?

  • हाँ, बिलकुल वही छह
  • वह सात मंदिर गिनाती है
  • नहीं
  • वह कोई स्थान नहीं गिनाती
पूरी कथा पढ़िए — छह स्थान, बाद में तय

नक्कीरर की कविता छह पवित्र मुरुगन-स्थानों को महत्त्व देती है।

पर आज का अरुपडै वीडु क्रम बाद की परंपरा ने जोड़ा।

जैसे "कुन्रुतोराडल" — "हर पहाड़ी" — बाद में तिरुत्तणि से जोड़ा गया।

क्या हुआ?

उत्तर और पूर्वी दक्षिण एशिया में कार्तिकेय की पूजा के कौन-से रूप आज भी जीवित हैं?

  • कुछ नहीं; वह पूरी तरह मिट गई
  • हरियाणा का पेहोवा एक जीवित तीर्थ है; बंगाल में कार्तिक की पूजा (दुर्गा-परिवार में और स्वतंत्र भी) जीवित है; हिमालय और नेपाल में भी परंपराएँ हैं
  • सिर्फ़ काशी में
  • सिर्फ़ राजस्थान में
पूरी कथा पढ़िए — घटी, मिटी नहीं

प्रारंभिक मध्यकाल के बाद उत्तर में कार्तिकेय की स्वतंत्र पूजा बहुत घट गई।

पर पेहोवा (हरियाणा), बंगाल की कार्तिक पूजा, और हिमालय-नेपाल की परंपराएँ बनी हुई हैं।

"सिर्फ़ हरियाणा में बचा" कहना अतिशयोक्ति है।

पहेली

उत्तर के बड़े हिस्से में मेरा कभी प्रमुख रहा स्वतंत्र पंथ बहुत घट गया; तमिल दक्षिण में मैं आज भी सबसे बड़े जीवित देवताओं में हूँ। मैं कौन हूँ?

  • गणेश
  • हनुमान
  • अय्यप्पन
  • मुरुगन / कार्तिकेय
पूरी कथा पढ़िए — दो दिशाओं का एक देवता

गुप्तकाल में कार्तिकेय उत्तर का एक राजकीय देवता था।

मध्यकाल के बाद उत्तर में उसकी स्वतंत्र पूजा घटती गई।

पर तमिल दक्षिण में मुरुगन आज भी सबसे बड़े जीवित देवताओं में हैं।