
अध्याय २
तारक का वरदान
एक असुर ने ऐसी मौत माँगी जो आ ही नहीं सकती थी — शिव के सात दिन के बेटे के हाथों, जब शिव के न पत्नी थी न बेटा
जो कभी नहीं होगा
तारकासुर ने घोर तप किया, और ब्रह्मा प्रकट हुए।
उसने अमरता नहीं माँगी — उसने एक चतुर शर्त माँगी।
"अगर मुझे मरना ही है," उसने कहा, "तो सिर्फ़ शिव के बेटे के हाथों — और तब, जब वह बेटा सात दिन का हो। इससे ज़्यादा उम्र का कोई मुझे न मार सके।" (कुछ पाठ छह दिन कहते हैं।)
उसे लगा यह असंभव है। उस समय शिव की न कोई पत्नी थी, न बेटा। सती दक्ष के यज्ञ में चली गई थीं, और शिव शोक में, ध्यान में, संसार से हटे हुए थे।
ब्रह्मा ने वरदान दे दिया।
तीन लोकों का स्वामी
वरदान के बल पर तारक ने तीनों लोक जीत लिए।
देवताओं को स्वर्ग से खदेड़ दिया। सूरज, चाँद और हवा को अपना नौकर बना लिया। ऋषियों के यज्ञ बंद हो गए।
देवता ब्रह्मा के पास गए।
एकमात्र रास्ता
ब्रह्मा ने कहा — इसका एक ही उत्तर है। शिव का एक बेटा।
पर वह बेटा तभी होगा जब शिव फिर से संसार में लौटें और विवाह करें।
तो असली काम तारक को मारना नहीं था। असली काम था शिव को ध्यान से बाहर लाना।
टिप्पणी: तारकासुर वज्रांग नामक असुर और वरांगी का पुत्र है। मूल विचार — कि तारक को केवल शिव का पुत्र मार सकता है — कई संस्कृत परंपराओं में मिलता है। "कुछ दिन के बालक" वाली स्पष्ट शर्त, जिसमें यहाँ लिया गया सात दिन का रूप भी है, विशेष रूप से मत्स्य पुराण जैसी बाद की पुराणिक कथाओं में मिलती है। शिव पुराण अलग शर्त देता है: शिव का पुत्र सेनापति बनकर तारक को पराजित करेगा, पर वहाँ छह या सात दिन तय नहीं हैं। महाभारत के वन-पर्व का स्कंद-जन्म प्रसंग अलग जन्म-कथा है और इस निश्चित दिन-गिनती का स्रोत नहीं माना जाना चाहिए। सती की मृत्यु और शिव का शोक इस साइट के शिव-महिमा अध्याय २ में विस्तार से है।
स्रोत: कई ग्रंथों और परंपराओं से, तारक का वरदान