
अध्याय ७
तारक-युद्ध
वह असंभव बेटा अब था, और ठीक उतने दिन का जितना वरदान में तय था
आमना-सामना
स्कंद ने देवताओं की सेना लेकर तारकासुर पर चढ़ाई की।
युद्ध हुआ — बड़ा, लंबा। और अंत में स्कंद ने वेल से तारक को मार दिया।
वह छह (या सात) दिन का था। वरदान अपनी ही चतुराई से टूटा — "असंभव" बेटा मौजूद था, और ठीक उसी उम्र का।
स्वर्ग लौटा
देवता स्वर्ग लौट आए।
स्कंद महासेन कहलाया — महान सेनापति। इंद्र अपने सिंहासन पर बना रहा।
उत्तर यहीं ख़त्म होता है, दक्षिण आगे बढ़ता है
यहाँ जिस उत्तरी तारक-कथा का अनुसरण किया गया है, उसमें मुख्य शत्रु तारक है और उसकी मृत्यु पर यह कथा पूरी होती है।
दक्षिणी स्कंद-पुराण परंपरा (शंकर संहिता) तीन असुर भाइयों — सूरपद्मन, सिंहमुख और तारक — के विरुद्ध एक बड़ा युद्ध बताती है, जिसमें अंतिम शत्रु सूरपद्मन है; तमिल "कंद पुराणम्" उसी कथा को विस्तार देता है। वह अगले अध्याय में है।
टिप्पणी: संस्कृत परंपरा में तारक-युद्ध मुख्यतः तारकासुर तक सीमित है और स्कंद उसे वेल/शक्ति से छह या सात दिन की उम्र में मारता है — वरदान अपनी ही शर्त से टूटता है। दक्षिणी स्कंद-पुराण/शंकर-संहिता परंपरा सूरपद्मन, सिंहमुख और तारक के विरुद्ध बड़ा युद्ध बताती है; तमिल कंद पुराणम् उसी कथा को विस्तार देता है और अंतिम शत्रु सूरपद्मन है (अध्याय ८)।
स्रोत: कई ग्रंथों और परंपराओं से, तारक-युद्ध