
कांड ९
अक्रूर का रथ
न्योता भेजने वाला जानता था कि यह न्योता नहीं है
धनुष-यज्ञ के नाम पर
मथुरा में कंस ने ढिंढोरा पिटवाया — एक बड़ा धनुष-यज्ञ होगा, मल्लयुद्ध होंगे, आस-पास के गाँवों से लोग बुलाए जाएँगे, और वह विशाल यज्ञ-धनुष जनता के सामने रखा जाएगा जिसके नाम पर पूरा उत्सव था।
व्रज तक ख़बर इसी सजे-धजे रूप में पहुँची: एक उत्सव है, राजा ने बुलाया है, चलो।
पर असली योजना अखाड़े में तैयार खड़ी थी। चाणूर और मुष्टिक जैसे नामी पहलवान बुला लिए गए थे। और अखाड़े के फाटक पर कुवलयापीड़ नाम का एक मस्त हाथी बाँध दिया गया था, इस हिदायत के साथ कि जो दो लड़के भीतर आएँ, उन्हें कुचल देना।
जिसे भेजा गया
कंस ने अपने दरबार के सबसे भले आदमी को बुलाया — अक्रूर, जो यादव भी था और कृष्ण का भक्त भी।
"वृंदावन जाओ," कंस ने कहा। "उन दोनों भाइयों को पूरे आदर के साथ रथ पर बिठाकर ले आओ। उन्हें लगना चाहिए कि यह सम्मान का बुलावा है।"
अक्रूर ने मना नहीं किया — मना करने का मतलब ख़ुद कारागार होता। पर रथ की रास हाथ में लेते ही उसे पता था कि वह किसे, किसके जाल में पहुँचा रहा है। पूरे रास्ते यह बात उसके भीतर काँटे की तरह चुभती रही।
यमुना के पानी में
आधे रास्ते वे संध्या-स्नान के लिए यमुना में उतरे। शायद पानी में सिर डुबोकर मन का बोझ थोड़ा हल्का करना चाहते थे।
भागवत की कथा कहती है कि पानी के भीतर उन्होंने वही दो देखे जिन्हें वे कुछ ही देर पहले रथ पर छोड़कर आए थे — कृष्ण और बलराम। पर वहाँ, पानी के नीचे, कृष्ण चार भुजाओं वाले थे, शेषनाग पर लेटे, और देवता उनकी पूजा कर रहे थे।
अक्रूर घबराकर पानी से बाहर निकले। रथ पर मुड़कर देखा — दोनों वैसे ही बैठे थे, हँसते हुए, जैसे कुछ हुआ ही न हो। उस पल अक्रूर के मन से यह शक जाता रहा कि वे किसे ले जा रहे हैं। जिसे कंस मरवाना चाहता था, उसे मारा नहीं जा सकता था।
वृंदावन पीछे छूट गया
रथ जब चला, तो पूरा गाँव उसके पीछे-पीछे आया। बाँसुरी की याद में, बचपन की याद में।
कोई पहिए के पास तक दौड़ी चली आई। किसी ने रथ के आगे आकर रास्ता रोक लिया। किसी ने कुछ नहीं कहा, बस वहीं खड़ी रह गई, आँखों से रथ को दूर तक जाते देखती।
रथ नहीं रुका। कृष्ण ने पीछे मुड़कर देखा, हाथ उठाया — लौटने का वादा नहीं, बस विदा। वृंदावन का हिस्सा कथा में यहीं ख़त्म हो जाता है। इसके आगे की कहानी मथुरा की है, और मथुरा में कृष्ण फिर कभी बच्चे नहीं रहे।
टिप्पणी: धनुष-यज्ञ का बहाना और अक्रूर का भेजा जाना — यह हरिवंश के प्रचलित पाठ में अध्यायों के शीर्षकों तक से पुष्ट होता है। यमुना में अक्रूर को हुआ अनुभव भागवत पुराण के दसवें स्कंध, उनतालीसवें अध्याय में मिलता है; हरिवंश की इसी यात्रा वाले अध्यायों की सूची में ऐसा कोई दृश्य नहीं दिखता, इसलिए यह भागवत का अपना जोड़ा हुआ हिस्सा लगता है। ध्यान रहे कि यह निष्कर्ष अध्याय-शीर्षकों पर टिका है, पूरे पाठ पर नहीं। वृंदावन छूटने के भावुक ब्योरे परंपरा और लोकगीतों में बहुत विस्तृत हैं, पर उन्हें किसी नामित अध्याय से जोड़कर यहाँ पुष्ट नहीं किया गया।
स्रोत: कई ग्रंथों से, अक्रूर का रथ