
कांड १५
द्वारका
समुद्र ने ज़मीन दी थी, और एक दिन उसने वापस भी ले ली
शहर छोड़ने का फ़ैसला
कालयवन ख़त्म हो गया था, पर जरासंध ख़त्म नहीं हुआ था। वह हर बार लौट आता था, और हर बार मथुरा पिसता था।
एक दिन कृष्ण ने अपने लोगों के सामने वह कहा जो कोई राजा आसानी से नहीं कहता — "यह शहर सुरक्षित नहीं है। हमें इसे छोड़ना होगा।"
बड़े यादवों ने विरोध किया — मथुरा उनकी जड़ थी, उनके पुरखों का शहर। पर कृष्ण का तर्क सीधा था: "हम हर लड़ाई जीत रहे हैं, और हर जीत की क़ीमत वे लोग चुका रहे हैं जो लड़ने नहीं जाते। यह जीत नहीं है।"
समुद्र से माँगी गई ज़मीन
वे पश्चिम की ओर चले, जहाँ ज़मीन समुद्र में जाकर ख़त्म हो जाती थी। वहाँ, किनारे के पास, एक द्वीप जैसी जगह थी — पर बसने लायक़ ज़मीन कम थी।
कथा कहती है कि कृष्ण ने समुद्र-देव से ज़मीन माँगी। "मुझे बारह योजन चाहिए, अपने लोगों को बसाने के लिए।"
और समुद्र पीछे हट गया। जितनी जगह चाहिए थी, उतनी उभर आई — गीली, चमकती, नई।
विश्वकर्मा का शहर
उस ज़मीन पर शहर देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा ने बनाया।
सोने के महल, नापी हुई चौड़ी सड़कें, बाग़-बग़ीचे, सभा-भवन, और चारों ओर समुद्र का पानी — एक ऐसा शहर जिस तक पहुँचने के लिए पहले समुद्र पार करना पड़े। नाम पड़ा द्वारका, "द्वारों वाली"।
मथुरा से पूरी यादव आबादी वहाँ ले जाई गई — बूढ़े, बच्चे, स्त्रियाँ, गायें, घर का सामान। और अगली बार जब जरासंध सेना लेकर मथुरा पहुँचा, तो उसे एक ख़ाली शहर मिला। लड़ने को कोई नहीं था।
और फिर समुद्र लौट आया
यह कथा का अंत नहीं है — बहुत कुछ आगे होना बाक़ी था — पर उसे यहीं कह देना ठीक है, क्योंकि यह शुरुआत का आईना है।
बरसों बाद, जब कृष्ण अपना शरीर छोड़ चुके थे और यादव कुल आपस में लड़कर ख़त्म हो चुका था, समुद्र फिर आगे बढ़ा। लहरें द्वारका की सड़कों पर चढ़ीं, सोने के महलों में भरीं, और पूरा शहर धीरे-धीरे पानी के नीचे चला गया।
जो ज़मीन समुद्र ने दी थी, वही उसने वापस ले ली।
टिप्पणी: द्वारका का विश्वकर्मा द्वारा बनाया जाना, समुद्र से ज़मीन मिलना और बारह योजन का नाप — यह ढाँचा महाभारत, हरिवंश और विष्णु पुराण में मिलता है, और स्कंद पुराण में भी। विष्णु पुराण उसे सोने के महलों वाला शहर बताता है। शहर के अंत — कृष्ण के शरीर छोड़ने के बाद समुद्र में समा जाने — का वर्णन भागवत पुराण में मिलता है। इस जाँच में इन प्रसंगों के ठीक अध्याय-क्रमांक हर ग्रंथ के लिए पक्के नहीं किए जा सके, इसलिए ऊपर ग्रंथों के नाम दिए गए हैं, अध्याय नहीं।
स्रोत: कई ग्रंथों से, द्वारका