
कांड ७
गोवर्धन
एक किशोर ने पूरे गाँव से कहा — इंद्र की पूजा बंद करो। फिर आसमान फट पड़ा
"यह पूजा किसलिए?"
बरसात से ठीक पहले हर साल गोकुल में एक ही हलचल मचती — इंद्र की पूजा की तैयारी। हांडियाँ माँजी जातीं, अन्न इकट्ठा होता, दूध और घी अलग रखा जाता।
कृष्ण ने नंद से बीच में ही पूछ लिया — "बाबा, यह सब किसके लिए?"
"इंद्र के लिए, कान्हा। वही बादल भेजते हैं, वही वर्षा कराते हैं। नाराज़ हो गए तो अकाल पड़ जाएगा।"
"बादल तो अपने स्वभाव से बरसते हैं," कृष्ण ने कहा। "और हमारी रोज़ी तो इन गायों से चलती है, और उस पहाड़ से — गोवर्धन से — जो घास देता है, पानी के सोते देता है, लकड़ी देता है। इंद्र से हमें क्या मिला जो हम हर साल उसे भेंट चढ़ाएँ?" कुछ गोप हँसे, कुछ ठिठके। कृष्ण ने बात टलने नहीं दी — "पूजा उसकी होनी चाहिए जो सचमुच पालता है। इस बार गोवर्धन को पूजो।"
पर्वत के सामने, आकाश की ओर पीठ
अजीब बात यह हुई कि गाँव मान गया। जो सामग्री बरसों से इंद्र के लिए बनती थी, वह गोवर्धन के चरणों में जा पहुँची — छप्पन तरह के पकवान, दूध की नदियाँ, फूलों के ढेर।
और तभी एक दृश्य दिखा जो किसी की समझ में नहीं आया। पर्वत ख़ुद एक विशाल रूप में प्रकट हुआ, और उसने वह सारा भोग अपने हाथों से उठाकर खा लिया — "अन्नं वै अहम्," मैं ही यह अन्न हूँ।
और उसी पर्वत के सामने कृष्ण साधारण ग्वाले के रूप में खड़े थे, हाथ जोड़े, सिर झुकाए। गोकुल ने बिना जाने, अपने ही सामने खड़े भगवान की पूजा कर दी थी।
आकाश का जवाब
ऊपर, स्वर्ग में, इंद्र का चेहरा तमतमा उठा। एक ग्वाले-बालक ने उसकी सदियों पुरानी पूजा एक बात में रुकवा दी थी। यह अपमान बर्दाश्त के बाहर था।
उसने सांवर्तक बादलों को खोल दिया — वे बादल जो प्रलय के समय के लिए बने थे, जब सृष्टि को डुबाना हो।
बिजली ऐसी कड़की कि दिन में रात हो गई। हवा चीख़ने लगी। और फिर पानी बरसा — बूँदें नहीं, धाराएँ, जैसे आकाश ख़ुद टूटकर गिर रहा हो। गायें रँभाती हुई इधर-उधर भागीं, बछड़े बह चले, झोपड़ियों की छतें उड़ गईं।
"कान्हा!" एक बूढ़े ने काँपती आवाज़ में पुकारा, बारिश के शोर के ऊपर। "अब क्या होगा?"
उँगली पर टिका आसमान
कृष्ण चुपचाप गोवर्धन के पास गए। नीचे झुके, बाएँ हाथ की सबसे छोटी उँगली पहाड़ के नीचे लगाई, और पूरा पर्वत उठा लिया — जैसे कोई छाता उठाता है।
"सब नीचे आ जाओ," उन्होंने बस इतना कहा। "गायों को भी लाओ, गाड़ियों को भी।"
पूरा गोकुल उस छतरी के नीचे सिमट आया — आदमी, औरतें, बच्चे, गायें, बछड़े, बैलगाड़ियाँ, सामान। ऊपर बारिश गरजती रही, नीचे सब सूखे खड़े रहे, कृष्ण की उँगली की ओर देखते हुए, जो हिली तक नहीं।
सात दिन, सात रातें यही चला। सातवें दिन इंद्र ने हार मान ली। बारिश थमी, बादल छँटे, और इंद्र ख़ुद ऐरावत पर बैठकर नीचे उतरा — उस बालक के आगे सिर झुकाने, जिसकी वजह से उसकी पूजा रुकी थी — और जो वास्तव में स्वयं पूजा के योग्य था।
टिप्पणी: गोवर्धन-प्रसंग भागवत पुराण (दसवाँ स्कंध, अध्याय २४-२५) में पक्की तरह अध्याय-स्तर पर मिलता है, और हरिवंश के आलोचनात्मक संस्करण में भी नामित रूप से मौजूद है। दोनों में मूल कथा एक है, पर हरिवंश इंद्र के अपमान को भागवत जितना कठोर करके नहीं दिखाता — यह समय के साथ कथाओं के और नाटकीय होते जाने का एक असली उदाहरण है।
स्रोत: कई ग्रंथों से, गोवर्धन