
कांड १४
जरासंध और रणछोड़
वे मैदान छोड़कर भागे, और उसी भागने पर उनका एक नाम पड़ गया
फिर वही सेना
कंस मगध के राजा जरासंध का दामाद था — उसकी दो बेटियाँ कंस को ब्याही थीं। कंस मरा, तो दोनों विधवा बेटियाँ रोती हुई पिता के पास पहुँचीं, और जरासंध ने मथुरा को मिटा देने की क़सम खा ली।
वह विशाल सेना लेकर आया। हारा, लौट गया।
फिर आया। फिर हारा, फिर लौटा। यह एक बार की लड़ाई नहीं थी — यह बार-बार का घेरा था। सेना आती, यादव किले के भीतर से लड़ते, सेना पीछे हटती, और कुछ महीनों बाद फिर धूल के बादल क्षितिज पर उठते। यह बार-बार हुआ, और हर बार शहर थोड़ा और टूटता गया।
दूसरी तरफ़ से आया एक और
इसी बीच पश्चिम से एक और ख़तरा चला आया — कालयवन, म्लेच्छ राजा, अपनी बड़ी सेना के साथ। नारद ने उसे बता दिया था कि उसके योग्य टक्कर मथुरा में है।
अब मथुरा दो तरफ़ से घिर गया — पूरब में जरासंध की एक और चढ़ाई की तैयारी, पश्चिम में कालयवन।
और किले के भीतर बूढ़े थे, बच्चे थे, स्त्रियाँ थीं। हर बार की लड़ाई की क़ीमत वही लोग चुका रहे थे जो ख़ुद कभी तलवार लेकर बाहर नहीं जाते थे।
भागता हुआ राजा
कालयवन कृष्ण को ढूँढ़ता हुआ किले तक आया, अकेला, ललकारता हुआ — "सामने आ, यादव।"
और कृष्ण, बिना हथियार उठाए, मुड़े और भाग निकले — किले से बाहर, खुले मैदान में, फिर पहाड़ों की ओर।
कालयवन पीछे दौड़ा। कृष्ण बस इतनी दूरी पर रहते कि वह हाथ भर से चूकता रहे — कभी क़रीब, कभी थोड़ा दूर। दौड़ते-दौड़ते वे एक पहाड़ी गुफ़ा में घुस गए, और कालयवन पीछे-पीछे भीतर। उसे यक़ीन था कि वह जीत रहा है, कि यादव थककर छिपने की जगह ढूँढ़ रहा है।
गुफ़ा में सोया हुआ आदमी
गुफ़ा के भीतर घना अँधेरा था। ज़मीन पर कोई आदमी सो रहा था, चादर सिर तक ओढ़े। कृष्ण उसके पास से आगे बढ़ गए, अँधेरे में ओझल।
कालयवन ने उस सोते हुए आदमी को कृष्ण समझा — थका हुआ, चादर में मुँह छिपाए। "उठ! अब कहाँ भागेगा?" उसने लात मारकर उसे जगाया।
वह मुचुकुंद था — एक बहुत पुराना राजा, जिसने देवताओं की ओर से दानवों से लड़ाई लड़ी थी, और थककर यह वरदान माँगा था कि उसे लंबी, गहरी नींद मिले, और जो कोई उसे जगाए, वह उसकी पहली नज़र से जलकर राख हो जाए।
मुचुकुंद की आँखें खुलीं। उन्होंने कालयवन की ओर देखा। और कालयवन वहीं, खड़े-खड़े, राख हो गया।
टिप्पणी: कालयवन का प्रसंग विष्णु पुराण और हरिवंश दोनों में मिलता है, और भागवत पुराण में भी वह उसी हिस्से में आता है जहाँ आगे द्वारका बसाने की बात है। मुचुकुंद वाला ढंग — सोए हुए राजा का वरदान, और जगाने वाले का भस्म हो जाना — परंपरा में एक जैसा बताया जाता है। दो बातें साफ़ रखनी ज़रूरी हैं। पहली: जरासंध की चढ़ाइयों की गिनती अलग-अलग जगह अलग बताई जाती है (सत्रह, या अठारहवीं के साथ कालयवन), और इस जाँच में उसे किसी मूल पाठ से पक्का नहीं किया जा सका। दूसरी: "रणछोड़" नाम इस जाँच में किसी प्राचीन ग्रंथ में नहीं मिला — वह द्वारकाधीश और डाकोर जैसी मंदिर-परंपराओं से जुड़ा नाम लगता है, यानी पुरानी कथा पर बाद की टिप्पणी, जो भागने को समझदारी बताकर पढ़ती है।
स्रोत: कई ग्रंथों से, जरासंध और रणछोड़