
कांड १
कंस और आकाशवाणी
एक आदमी को उसकी मौत की तारीख़ नहीं, शर्त बता दी गई थी
रथ हाँकता हुआ भाई
उस दिन मथुरा फूलों में डूबी हुई थी। देवकी का विवाह वसुदेव से हुआ था, और ससुराल जाती बहन का रथ ख़ुद कंस हाँक रहा था — घोड़ों की रास अपने हाथ में लिए, बहन के प्यार में। छतों से लोग झुक-झुककर देख रहे थे। रथ के पहियों के नीचे फूल कुचले जा रहे थे और उनकी सुगंध हवा में भरी थी।
देवकी हँस रही थी। कंस बीच-बीच में मुड़कर उसे कुछ कहता, और वह और हँस पड़ती।
तभी आकाश से एक आवाज़ आई — भारी, बिना शरीर की — और भीड़ का पूरा शोर एक झटके में बंद हो गया।
"मूर्ख! जिस लड़की का रथ तू इतने चाव से हाँक रहा है, उसी का आठवाँ बेटा तेरा अंत करेगा।"
रास कंस के हाथ से छूट गई। घोड़े अपने आप रुक गए।
तलवार, और एक सौदा
अगले ही क्षण वह रथ से कूदा। बहन के बाल मुट्ठी में पकड़े, और दूसरे हाथ से तलवार खींच ली। उसका हिसाब सीधा था — जड़ ही न रहे, तो आठवाँ बेटा कहाँ से आएगा।
देवकी की चीख़ गले में ही अटकी रह गई। बाराती जड़ हो गए; किसी की हिम्मत आगे बढ़ने की नहीं हुई।
वसुदेव बीच में आ खड़े हुए। उन्होंने हाथ नहीं जोड़े, गिड़गिड़ाए नहीं। उन्होंने सौदा किया।
"तुझे देवकी से ख़तरा नहीं है, कंस — उसके बेटों से है। तो बेटे ही तुझे सौंप दूँगा। हर बच्चा, जन्म लेते ही, अपने हाथ से तेरे हाथ में रख जाऊँगा। यह मेरा वचन है।"
कंस रुक गया। एक हत्यारे के लिए इससे सुविधाजनक बात और क्या होती — काम भी हो जाए, और बहन की हत्या का दाग़ भी न लगे। उसने तलवार नीची कर ली।
कुछ ही समय में वसुदेव और देवकी कारागार में डाल दिए गए, और हर संतान वसुदेव को वहीं से कंस के हाथ में सौंपनी पड़ी।
छह बार वही दरवाज़ा
पहला बेटा हुआ। वसुदेव ने वचन निभाया — नवजात को गोद में उठाया, कारागार के गलियारे से चलकर कंस के कक्ष तक गए, और उसके हाथ में रख दिया। कंस ने उसे वहीं मार डाला।
फिर दूसरा। फिर तीसरा।
हर बार वही होता। वही दरवाज़ा खुलता, वही थके क़दम गलियारे में गूँजते, और लौटते वसुदेव के पीछे वही सन्नाटा रह जाता। देवकी दीवार की ओर मुँह करके पड़ी रहती।
इस तरह छह बेटे गए। कंस हर बार थोड़ा और निश्चिंत होता गया।
सातवाँ, जो कहीं और चला गया
सातवीं बार गर्भ ठहरा — और फिर कारागार से ख़बर निकली कि गर्भ गिर गया।
कंस ने राहत की साँस ली। पर सच कुछ और था। वह गर्भ रातोंरात गोकुल पहुँचा दिया गया था, वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के पास, जो वहीं नंद के गाँव में रहती थीं। वही बच्चा आगे बलराम कहलाया — कृष्ण का बड़ा भाई।
अब सिर्फ़ आठवीं बार बची थी। कंस ने पहरा दोगुना करवाया, देवकी की बेड़ियाँ और कसवाईं, और गिनती ख़ुद अपने पास रखने लगा — जैसे संख्या पर पकड़ बनाए रखने से मौत टलती हो।
टिप्पणी: आकाशवाणी वाला दृश्य विष्णु पुराण (पाँचवाँ अंश) और भागवत पुराण (दसवाँ स्कंध) में मिलता है — जहाँ कंस ख़ुद विदाई का रथ हाँक रहा होता है। हरिवंश के प्रचलित पाठ में शुरुआत अलग है: वहाँ नारद आकर कंस को उसके मुँह पर बताते हैं, और उस अध्याय में आकाशवाणी का ज़िक्र नहीं है। मारे गए बच्चों की गिनती पर भी फ़र्क़ है — भागवत और विष्णु पुराण छह कहते हैं, हरिवंश का वल्गेट पाठ सात। यहाँ दोनों बातें दर्ज हैं, किसी एक को "सही" नहीं ठहराया गया। (हरिवंश का जो पाठ आसानी से मिलता है वह वल्गेट है; बोरी के आलोचनात्मक संस्करण से यह अलग हो सकता है।)
स्रोत: कई ग्रंथों से, कंस और आकाशवाणी