
कांड ११
कंस-वध
मामा ने भतीजों को कुश्ती देखने बुलाया — यह जानते हुए कि यही बुलावा उसकी मौत बनेगा
निमंत्रण जो जाल था
कंस को बरसों से पता था। जिस बालक ने पूतना को, कालिया को, इंद्र के प्रलय को झेल लिया, वही उसका अंत लिखने वाला था। ज्योतिषी यही कहते थे, उसका डर यही कहता था।
फिर भी उसने पीछे हटने के बजाय एक चाल चली।
"धनुष-यज्ञ का बहाना बनाओ," उसने अक्रूर से कहा। "उन्हें मथुरा बुला लो। भीतर आते ही फाटक का हाथी काम कर देगा। बच गए तो अखाड़े में चाणूर और मुष्टिक हैं। और सब चूक गए, तो मैं ख़ुद हूँ।" अक्रूर ने सिर झुकाकर हामी भर दी, पर उसका मन कहीं और था।
रास्ते में जो दिखा, उसने मन बदल दिया
यमुना पार करते हुए अक्रूर ने पानी में झाँका, और उन्हें शेषनाग पर लेटे एक अनंत रूप की झलक मिली — वही लड़का, और साथ ही कुछ जो लड़का नहीं था।
उनके हाथ काँप गए। जो योजना वे लेकर चले थे, उस पर से भरोसा उठ गया — ऐसे किसी को जाल में कैसे फँसाया जाए?
मथुरा की गली में घुसते ही एक कुबड़ी दासी सामने आ गई, चंदन का कटोरा लिए। "स्वामी, यह लगा लीजिए।" कृष्ण ने उसकी ठुड्डी हल्के से ऊपर की, और वह सीधी तनकर खड़ी हो गई, जैसे बरसों का बोझ पीठ से उतर गया हो। अक्रूर देखते रह गए।
धनुष जो टूटा, चुनौती जो बज उठी
यज्ञशाला में वह धनुष कड़े पहरे में रखा था। कंस का दावा था कि कोई साधारण हाथ उसे छू भी नहीं सकता।
कृष्ण ने उसे एक हाथ से उठाया, प्रत्यंचा चढ़ाने को झुकाया — और वह बीच से टूट गया। आवाज़ इतनी तेज़ थी कि पूरी नगरी सुन गई, और कंस अपने महल में सुनकर उछल पड़ा।
अगली सुबह अखाड़ा भर चुका था — ढोल, चीख़ती भीड़, धूल, और मंच पर कंस, तनी हुई मुट्ठियाँ। जब दोनों भाई भीतर आए, उसने चिल्लाकर कहा — "चाणूर! मुष्टिक! शुरू करो।"
मंच पर आख़िरी चाल
चाणूर कृष्ण से भिड़ा, मुष्टिक बलराम से। धूल उड़ी, भीड़ साँस रोककर देखती रही। कुछ ही पलों में दोनों पहलवान ज़मीन पर पड़े थे, हिलते नहीं।
कंस उठ खड़ा हुआ। उसने और मल्ल भेजने का आदेश दिया, फिर हाथियों का, फिर सिपाहियों का — और जब कुछ काम नहीं आया, तो ख़ुद तलवार खींचकर मंच पर से चीख़ा कि दोनों को पकड़ लिया जाए।
बहुत देर हो चुकी थी। कृष्ण एक छलाँग में मंच पर चढ़े, कंस का मुकुट गिरा, बाल मुट्ठी में आए — और एक झटके में वह अत्याचारी नीचे अखाड़े की रेत में आ गिरा। जहाँ उसने अपनी मौत का तमाशा रचा था, ठीक वहीं वह पूरा हुआ। फिर कृष्ण ने उसके बूढ़े पिता उग्रसेन को कारागार से निकालकर वापस सिंहासन पर बिठाया।
टिप्पणी: भागवत पुराण (दसवाँ स्कंध, अध्याय ४३-४४) में कंस-वध अध्याय-स्तर पर पक्की तरह मिलता है, और हरिवंश (वल्गेट संस्करण) में भी अक्रूर-आगमन से कंस-वध तक की पूरी शृंखला नामित अध्यायों में मिलती है। पर पी.एल. वैद्य के आलोचनात्मक संस्करण की सटीक अध्याय-संख्या, और दोनों ग्रंथों के मंचन में बारीक़ भेद, इस सत्र में ठोस तरीक़े से जाँचे नहीं जा सके — इसलिए यहाँ सिर्फ़ इतना कहा गया है कि प्रसंग दोनों बड़े ग्रंथों में मौजूद है।
स्रोत: कई ग्रंथों से, कंस-वध